यह जीवन ही लंका कांड है। देह ही लंका है। मोह ही रावण है, जिसने हमारे जीवन की शांति रूपी सीता को हर लिया है।

भगवान लंका में प्रविष्ट हो चुके, अब युद्ध होगा।

यह जीवन ही लंका कांड है। देह ही लंका है। मोह ही रावण है, जिसने हमारे जीवन की शांति रूपी सीता को हर लिया है।अब शांति की प्राप्ति के लिए, हमें भी उन्हीं सब से युद्ध करना है, जिन से रामजी का युद्ध होगा।

तुलसीदासजी विनय पत्रिका में लिखते हैं-

"मोह दसमौली तद्भ्रात अहंकार पाकारजित काम विश्रामहारी"

यह मोह ही रावण है, मोह से उत्पन्न अहंभाव ही कुंभकर्ण है, और अहं की भूमि पर पैदा हुई कामना ही मेघनाद है। जहाँ मोह होगा, वहाँ देहाभिमान और कामनाएँ आ ही जाती हैं।रावण रूप बदल कर आया, मोह भी रूप बदलता है, कभी इसको तो कभी उसको अपना कहता है। मोह ऐसा भेष बदलता है कि सुख का आभास होने लगता है।

हम जगत में सुख पाने का प्रयास करते हैं, पर पाते नहीं। सुख जहाँ होता ही नहीं, वहाँ मिले भी कैसे? समय नष्ट हो जाता है, श्वास व्यर्थ जाती है, इसी से फिर दुख होता है और जीवन बर्बाद हो जाता है। यही संसार का सत्य है।लक्ष्मणजी का युद्ध मेघनाद से होता है। लक्ष्य पर टिका मन लक्ष्मण है। भगवान से जुड़ा मन, कामनाओं से लड़ता है। पर काम मिटता नहीं। क्योंकि अभी मैं नहीं मिटा, कुंभकर्ण नहीं मरा। नियम की बात है, पहले “मैं” मिटे तब “काम” मिटे।

राजेश्वरानंदजी कहते हैं, जाग्रत और स्वप्न में सुख-दुख हैं, सुषुप्ति में सुख-दुख नहीं हैं। क्योंकि जाग्रत और स्वप्न में कामनाएँ हैं, सुषुप्ति में कामना नहीं है। हो भी कैसे? कामना की झाड़ी मैं की भूमि में ही पनपती है। सुषुप्ति में वह मैं का भाव ही नहीं रहता, कामना कैसे हो?

हम मैं को तो रखना चाहते हैं, कामना को मिटाना चाहते हैं, यही साधक के जीवन की मूल समस्या है। इसी सत्य को समझाने के लिए यहाँ लीला चल रही है।ध्यान दें, मेघनाद को देखकर लक्ष्मणजी को क्रोध आ गया। बुराई को देखकर क्रोध आना स्वाभाविक ही है, पर बुराई क्रोध से नहीं मिटती, बोध से मिटती है।

लोकेशानन्द कहता है कि काम में द्वैत है, क्रोध में भी द्वैत है, द्वैत से द्वैत कैसे मिटे? द्वैत तो अद्वैत से मिटता है। और अद्वैत तो बोध में है। हम बोध से भर जाएँ तो काम अभी मिट जाए।

लोकेशानन्द


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