किस हद तक ज़िन्दगी बदल सकते या सब कुछ परमात्मा के हाथ में है?

किस हद तक ज़िन्दगी बदल सकते या सब कुछ परमात्मा के हाथ में है?
-ATUL VINOD
हमारे जीवन में हम जो भी करते हैं उसमें से कितने प्रतिशत पर हमारा नियंत्रण होता है?

हम कहते हैं कि हम सांस ले रहे हैं, लेकिन क्या वाकई सांस लेने में हमारा कोई योगदान है? सांस तो स्वयं आती जाती है|  ना तो हम सांस लेते हैं ना ही छोड़ते हैं| हम सिर्फ अपनी श्वास की गति को नियंत्रित कर सकते हैं|

हमें प्यास लगती है, लेकिन प्यास लगने में हमारा कोई योगदान नहीं| प्यास भी एक स्वचालित प्रक्रिया है|  हमारा शरीर प्यास निर्मित करता है और उस प्यास की जरूरत को पूरा हम करते हैं| इसी तरह से हमारे अंदर भूख की जरूरत निर्मित होती है और उस जरूरत को पूरी करने की जिम्मेदारी हमारी होती है| भोजन करने के बाद हमारी भूमिका खत्म हो जाती है हमारे शरीर का यह स्वचालित तंत्र उस भोजन को पचाने में खुद  ही जुट जाता है|

क्या एक बालक अपनी अवस्था में इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसकी आने वाले समय में किस व्यक्ति से शादी होगी? क्या एक बच्चा इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि उसके जीवन में कब और कितनी संपन्नता आएगी? क्या एक बालक इस बात की भविष्यवाणी कर सकता है कि वह जीवन भर रोग मुक्त रहेगा? जीवन में कब क्या हो जाए कुछ भी कहा नहीं जा सकता! 

हम पैदा होते हैं उसमें हमारा कोई योगदान नहीं होता, हम मां के गर्भ से इस धरती पर आते हैं उसमें भी हमारा कोई योगदान नहीं होता, इसके बाद हमारा जीवन बचपन से किशोरावस्था, किशोरावस्था  से युवावस्था, युवावस्था से प्रौढ़ावस्था, प्रौढ़ अवस्था से वृद्धावस्था, तक स्वयम ही आगे बढ़ता रहता है|

जीवन का विज्ञान बहुत जटिल है, खास बात यह है कि हम पूरे जीवन भर इस भ्रम में रहते हैं की जीवन पर हमारा बहुत हद तक नियंत्रण है| लेकिन यदि जीवन को गहराई से देखा जाए तो इसमें होने वाली है 99 फ़ीसदी घटनाओं, क्रिया और प्रतिक्रियाओं में हमारा योगदान नहीं होता, हम कहां पैदा होंगे यह भी हमें पता नहीं होता, हमारे जीवन में आने वाले समय में कौन-कौन सी परिस्थितियां कब-कब सामने आएगी इसके बारे में भी हमें बहुत ज्यादा अंदाजा नहीं होता|

हम सब झूठे अहंकार में जीते हैं, हमें लगता है कि हम इस दुनिया के मालिक बन सकते हैं, लेकिन क्या हम अपने स्वयं के मालिक बन सकते हैं? क्या हमारा अपने भावों पर कोई अधिकार है? क्या हम अपने क्रोध पर नियंत्रण कर सकते हैं? क्या हम अपने लोभ  पर नियंत्रण कर सकते हैं? हम किसके वशीभूत हो जाएंगे क्या हमें मालूम है?

जीवन में हमारी अपनी प्रतिक्रियाएं भी हमारे अधीन नहीं होती| कोई भी ऐसी क्रिया जो हमारे अहंकार को चोट पहुंचाती  है हमारे अंदर क्रोध पैदा कर देती है| हम क्रोध करते नहीं न-ही हम क्रोध करना चाहते हैं. हम तो शांत रहना चाहते हैं. लेकिन क्रोध अपने आप हो जाता है|

जब भी हमारे आस पास ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं, जिनमें हमें लाभ की संभावनाएं नजर आने लगती है ना चाहते हुए भी हम लोभ  के अधीन हो जाते हैं और लोभ कर बैठते हैं|

न चाहते हुए भी हम अपने अपने नज़दीकी लोगों के मोह में पड़ जाते हैं| जो भी चीज में हमें इकट्ठी करते हैं, धीरे-धीरे हम उनके अधीन हो जाते हैं| 

हम मानव मात्र से प्रेम करना चाहते हैं लेकिन कई बार हम ना चाहते हुए भी किसी किसी से घृणा कर बैठते हैं| कई बार हम लालच का शिकार हो जाते हैं, कई बार हम ऐसी गलतियां कर देते हैं, जो नहीं करनी चाहिए थी | एक लम्हा ऐसा आता है जब हमारे पैर फिसल जाते हैं और उसी लम्हे में की गई खता सदियों की सजा बन जाती है|

कितनी अजीब बात है कि हम अपने तात्कालिक भावों के आवेग  को भी रोक नहीं पाते| 

इसके बावजूद भी निराश होने की जरूरत नहीं है, हमारे पास खुद को बदलने की जो 1% शक्ति है वह भी बहुत महत्वपूर्ण है| इस 1%  अधिकार के सहारे ही हम अपने पूरे जीवन को बहुत ज्यादा नहीं तो कुछ हद तक गढ़ सकते हैं| धीरे-धीरे बहुत छोटे छोटे कदमों से हम ऐसे संस्कार निर्मित कर सकते हैं, जो हमारे इस जीवन को थोड़ी बेहतर दिशा दे सकें| और इस 1% में हमारे कर्म भी शामिल है|

भले ही बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं हो, लेकिन हमारे कर्म हमारे हाथ में होते हैं, हमारे कर्म करने का तरीका हमारे हाथ में होता है, अपने आप को प्रशिक्षित करना भी हमारे हाथ में होता है, हम यदि प्रकृति के नियमों के हिसाब से कर्म करें, नेचर को समझ कर उसके मापदंडों के अनुसार अपने जीवन को जीने की कोशिश करें तो यह थोड़ी सी कोशिश बड़े बदलाव का कारण बन जाती है| और हमारा जीवन बिगड़ने की बजाय सवरने लगता है|

अपने कर्म का चुनाव बहुत सोच समझकर कीजिए आपके कर्म ही आपके संस्कार बनेंगे| आपके व्यक्तित्व का हिस्सा बनेंगे| धीरे धीरे धीरे यह आपकी स्वचालित प्रक्रिया का हिस्सा बन जाएंगे और वही स्वचालित प्रक्रिया तब आपकी इच्छाओं के अनुरूप कुछ न कुछ परिणाम जरूर देगी|

इस पूरे विज्ञान को यदि आप समझ लें, अहंकार धीरे-धीरे अपने आप विसर्जित होने लगेगा, क्योंकि जब 99 फ़ीसदी काम ईश्वर ने स्वचालित कर रखा है, तो फिर किस बात का अहंकार? किस बात का घमंड? तब शरणागति आ जाती है| तब ईश्वर के प्रति विश्वास पैदा होता है| तब हमें पता चलता है कि ईश्वर ने हमारे आने से पहले ही हमारे जीवन को चलाने की व्यवस्था कर दी थी, जब हमे इस धरती पर आना था तब उस गर्भ का इंतजाम उसने कर दिया| जब हम इस धरती पर आए तो साँसों के लिए जरूरी ऑक्सीजन की व्यवस्था उसने कर दी| प्रकाश की व्यवस्था उसने कर दी| जीवन भर अनवरत रूप से मिलने वाले पानी की व्यवस्था उसने कर दी| गरीब हो या अमीर,पशु हो या पक्षी, सबको भोजन परमात्मा किसी न किसी तरह से दे ही देता है| अग्नि पर भी सब का अधिकार है| धूप से बचने के लिए छत भी सबको मिल जाती है, सर्दी और बारिश से बचने के इंतजाम भी हो जाते हैं| फिर बहुत ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है|

जो 1% हमारे हाथ में है उस 1% में बेहतर से बेहतर, उच्चतर से उच्चतर  कैसे कर सकते हैं| इस बात की चिंता की जानी चाहिए|
जिंदगी का आखिरी लक्ष्य ज्ञान है ? कर्म करें या धर्म ?
 

ATUL VINOD



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