जनजातिय कथाएं : मिट्टी और सृष्टि, बैगा और धरती

जनजातिय कथाएं : मिट्टी और सृष्टि, बैगा और धरती

लोक गाथा

STORY 1
Folksaga-Newspuran
प्रारम्भ में जल के अतिरिक्त कुछ नहीं था। जल की सतह पर एक विशाल कमल का फूल था और उस पर महादेव बैठे थे। जब उन्होंने देखा कि चारों ओर पानी ही पानी है तब उन्होंने अपनी छाती के मैल से एक कौआ बनाया और उसे मिट्टी लाने के लिए भेजा।

कौआ उड़ चला और आगे चलकर वह महान मकड़े कक्रामल छतरी के पंजे पर बैठ गया। कक्रामल छतरी ने प्रसन्न होकर कहा चलो बहुत दिनों बाद कुछ खाने को मिला। कौए ने उत्तर दिया - काका मेरे पिता ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मकड़े ने पूछा - आखिर काम क्या है? कौआ बोला – मेरे पिताजी ने मुझे मिट्टी लाने के लिए भेजा है, जिससे वे धरती की रचना केंगे।

दोनों सिंगार द्वीप पर पहुँचे। नल राजा और नल रानी के पास मिट्टी थी। मकड़े और कौए ने नल राजा और नल रानी से चाचा-भतीजा का रिश्ता जोड़ा और मिट्टी माँगी। राजा और रानी ने आतिथ्य के नाम पर दोनों भोजन में जहर मिला दिया और मुँह में मिट्टी रखकर भागने लगे।

इतने में मकड़ा जाग गया और अपने पंजे में उन्हें फँसाकर उनके मुँह से मिट्टी उगलवा ली और कौए को दे दी। परमात्मा ने इसी मिट्टी से सृष्टि की रचना की।
STORY - 2

Baiga and earth-Newspuranबैगा और धरती

बहुत पहले चारों ओर जल ही जल था। उस जल के ऊपर एक पुराना पत्ता तैर रहा था। उस पर भगवान बैठे रहते थे। ऐसे कई दिन निकल गये। भगवान दिन-रात सोच में रहने लगे। मन में विचार करने लगे। यहाँ तो जल ही जल है। धरती कहीं है ही नहीं। भगवान ब्रह्मा ने अपनी छाती से मैल निकालकर एक कौआ बनाया। इसके बाद कौए को उन्होंने आदेश दिया कि जा रे कौए! तुम जाकर धरती का पता लगाओ। कौआ उड़ चला। उड़ते-उड़ते कुँवर ककरामल नाम का कछुआ दिखाई दिया। उसके बड़े-बड़े डाढ़ थे। डाढ़ पर कौआ थककर बैठ गया। कौआ बोला - कुँवर ककरामल! | तू झूठ मत बोलना, मुझे ईमानदारी से धरती का पता बता दे। मैं धरती की मिट्टी लेने आया हूँ। यह सुनकर ककरामल कछुए ने कौए को डाढ़ में दबाया और पाताल लोक की ओर ले चला। धरती की मिट्टी या धरती राजा किचकमल ने दबाकर रख ली थी। मांगने पर राजा ने कौए को धरती की मिट्टी दे दी। ककरामल कौए को लेकर पाताल लोक से ऊपर आ गया। कौए ने धरती की मिट्टी भगवान को दी।

भगवान ने एक बरतन बुलवाया, उसमें सर्प की गेरी बनाई और उसी की मथानी बनाई। उस मिट्टी के बर्तन में डाला। मिट्टी डालकर उसे मथने लगे। अच्छी तरह मथकर भगवान ने उस मिट्टी को पूरे पानी में बिखेर दिया। तब पानी के ऊपर धरती बन गई। इसके बाद भगवान ने धरती पर चारों दिशाओं में घूम-फिर देखा। धरती इधर-उधर डोल रही थी। भगवान ने तत्काल लोहे का कार्य करने वाले अगरिया को बनाया। अगरिया ने चार बड़ी-बड़ी लोहे की कीलें बनाई। उसके बाद भगवान ने नागा बैगा बनाया। नागा बैगा ने धरती के चारों कोनों में कीलें ठोक दीं। तबसे पृथ्वी का हिलना-डुलना बन्द हो गया। तबसे बैगा धरती के रक्षक हो गये।

 


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