बूढों के प्रकार -दिनेश मालवीय

बूढों के प्रकार

-दिनेश मालवीय
types of old guyबहुत पुरानी कहावत है कि आप उतने बूढ़े हैं, जितना आप ख़ुद को समझते हैं. हालाकि इसमें कुछ अतिश्योक्ति भी है, क्योंकि बुढ़ापा तो बुढ़ापा होता है. इसके लक्षण शरीर, मन और मस्तिष्क पर दिखे बिना नहीं रहते.

बहरहाल, जब हम अपने आसपास देखते हैं तो पाते हैं कि बहुत से 70-75 साल के बूढ़े बहुत कुशलता से कार ड्राइव कर रहे हैं. स्मार्ट फोन के लगभग सारे फीचर्स का भरपूर उपयोग कर रहे हैं. रेल और प्लेन के टिकट खुद ऑनलाइन बुक कर रहे हैं. बैंक के काम स्वयं निपटा रहे हैं. नेट बैंकिंग बहुत कुशलता से कर रहे हैं. कोई बीमारी होने पर खुद अपने आप डॉक्टर्स के पास जाकर दवाएं भी ले आते हैं. अपने काम खुद करते हैं. वे अपने परिवार में उतना ही हस्तक्षेप करते हैं, जितना ज़रूरी हो. अपने विवाहित बच्चों को अपने ढंग से जीने के लिए स्पेस देते हैं. अपने नाती-पोतों के साथ उनके जैसे बनकर
खेलते हैं.

पढने का शौक रखने वाले बूढ़े अपनी पसंद की पुस्तकें पढने के लिए लाइब्रेरी से किताबें इश्यू कराकर समय पर उन्हें लौटाने भी जाते हैं. न्यूज चैनल्स पर समाचार और मनोरंजन कार्यक्रम भी देखते हैं. वे हर तरह से देश-दुनिया और समाज में होने वाली घटनाओं से अपडेट रहते हैं. ऐसा लगता है कि उम्र उनके लिए सिर्फ संख्या भर है. वे उसे अपने पर हाबी नहीं होने देते. कई बूढ़े तो अपनी सक्रियता से नौजवानों को मात देते लगते हैं.

readingदूसरी तरफ ऐसे बूढ़े हैं, जो वास्तव में बूढ़े होने से बहुत पहले ही खुद को बूढ़ा महसूस करने लगते हैं. बहुत पहले से ही वे खुद को बूढा-बूढ़ा बताने लगते हैं. उनके भीतर बढ़ी उम्र को लेकर बहुत निराशा का भाव रहता है. वे जीवन के हर क्षेत्र में निष्क्रिय होते जाते हैं. अपने शौकों से भी विमुख हो जाते हैं. अधिकतर घरघुस्सू हो जाते हैं. घर में रहकर अपने परिवार की हर छोटी-बड़ी बात में दखल देकर “दखलुद्दीन” बन जाते हैं. शादीशुदा बच्चों की हरएक गतिविधि में मीनमेख निकालते रहते हैं. घर के किसी काम में हाथ बँटाना वे अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. उन्हें हर चीज हाथ पर और बिलकुल घड़ी का काँटा देखकर चाहिए. ज़रा भी कमी रहने पर घर को सिर पर उठा लेते हैं. कुछ काम करने को कहे जाने पर कहते हैं कि ज़िन्दगी भर काम ही तो किया, क्या अब भी काम करते रहेंगे. ऐसे लोगों को लोग खडूस कहने से भी नहीं चूकते. बहरहाल, एक अच्छी बात यह है कि वे अपने नाती-पोतों के साथ ठीक व्यवहार करते हैं, लेकिन वक्त आने पर उनसे भी लड़ने से नहीं चूकते. कुछ बूढ़ों को तो किसी तानाशाह जैसा व्यवहार करते देखा जा सकता है.

टेक्नोलॉजी की बात चलने पर बहुत नि:स्पृह भाव से ऐसे मुंह बनाकर बोलते हैं कि जैसे यह कोई बहुत अनुचित और गलत काम है. टेक्नोसेवी नहीं होने को वे अपनी बहुत बड़ी विशेषता मानकर चलते हैं. पूछने पर बताते हैं कि अरे ये फेसबुक-वेसबुक, WhatsApp बगेरह सब फालतू की चीजें हैं. इनमें वक्त बहुत बर्वाद होता है. इतना ही नहीं, टेक्नोसेवी लोगों को वे बहुत हेय दृष्टि से देखकर खुद को बहुत महान बताने की कोशिश करते हैं. यात्रा करना हो तो टिकट बुक करवाने और दूसरी व्यवस्थाएं करने के लिए वे पूरी तरह अपने बच्चों पर निर्भर करते हैं. पढ़ने-लिखने में उनकी कोई बहुत रुचि नहीं होती.

newspuranयह बात सही है कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते और सभी पर आचार संहिता जैसी कोई चीज़ नहीं थोपी जा सकती. बुढ़ापा अपना असर दिखाएगा ही. लेकिन जो लोग शरीर से बुजुर्ग हो गये हैं, उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे मन से अपने को बुजुर्ग न मानकर अधिक से अधिक सक्रिय रहने की कोशिश करें. अपना काम यथासंभव खुद ही करने का प्रयत्न करें. घर-परिवार में अवांछित हस्तक्षेप नहीं करें.

इस तरह हम बुढ़ापे की अनेक समस्याओं से बच सकते हैं. साथ ही, हमारे ऐसे आचरण के कारण परिवार पर बोझ बनने से बच जाएंगे. आप जिस समय युवा थे, वह दौर अलग था. उस समय आपके माता-पिता आपके आचरण को अनुचित मानते रहे होंगे. उस समय आप उन्हें आउटडेटेड कहते होंगे. बदलते समय के तक़ाजे अलग हैं, जिन्हें युवा पीढी को बेहतर समझती है. उन्हें उपयुक्त स्वतंत्रता दें.

अगर हम बदली परिस्थितियों में अपनी भूमिका ठीक से समझकर उसे निभा सकें तो हमारा बुढ़ापा आसान हो सकेगा. बाहर समाज में भी हमें अधिक आदर-सम्मान मिलेगा और हम अपने जीवन के अनुभवों से समाज को भी कुछ लाभ दे सकेंगे. लिहाजा पहले तरह के बूढ़े बनिए, दूसरे तरह के नहीं.

dinesh


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