योग के प्रकार-ज्ञान योग

योग के प्रकार-Types of Yoga | ज्ञान योग क्या है | ज्ञान योग  की  साधना | ज्ञान योग
प्राचीन  काल  से  ही  भारतीय  मनीषियों  के  अन्तःकरण  में  योग  की  विमल  मन्दाकिनी परम्परागत  रूप  से  पवित्र  धारा  के  रूप  में  अविरल  अनवरत  प्रवाहित  होती  आ  रही  है।  यह

योग विद्या ब्रहम विद्या ब्रहमा द्वारा निर्दिष्ट तथा हमारे ऋषियों तपस्वियों तथा दार्शनिकों के

द्वारा अपनायी गयी श्रेष्ठ साधना पद्धति है।

महर्षि पतंजलि कृत योग सूत्र का प्रथम सूत्र ’अथयोगानुशासनम्’। - पा0 यो0 सू0 1/1 जिसका  अर्थ  है,  कि  आपके  जीवन  का  वह  मंगल  वाचक  क्षण  आ  गया  है।  जिसमें कि  शारीरिक  एवं  मानसिक  स्वास्थ्य  के  साथ  -  साथ  मोक्ष  का  मार्ग  प्रशस्त  होता  है।  याइसको  इस  तरह  से  समझ  सकते  है,  कि  अब  आपको  एक  निश्चित  कार्य  व्यवस्था  का अनुसरण  करना  होगा  और  वह  निश्चित  कार्य  व्यवस्था  योग  है,  और  इस  योग  पद्धति  को अपनाने  के  लिए  हमे  सबसे  पहले  अनुशासित  जीवन  की  आवश्यकता  होती  है।  अनुशासन स्वयं  पर  शासन  स्वयं  के  प्रति  कठोरता।  यही  कठोरता  हमें  स्थिरता  देती  है।  योग  के  द्वारा चित्त की शुद्धि, इन्द्रिय संयम तथा स्थिरता, लधुता, शारीरिक व मानसिक शान्ति की प्राप्ति होती है।

योग के मार्ग में साधन प्र णालियां भिन्न है। भिन्न - भिन्न होने पर सभी  का  लक्ष्य  या  ध्येय  है  मोक्ष  की  प्राप्ति।  या  कह  सकते  है  कि  सभी  के  द्वारा  समग्र स्वास्थ्य  की  प्राप्ति  के  साथ  -  साथ  मोक्ष  प्रदायी  है।  इसको  इस  प्रकार समझा  जा सकता  है। जैसे  एक  पर्वत  के  शिखर  पर  चढ़ने  के  कई  मार्ग  होते  है। सभी  का लक्ष्य  है  पर्वत  का  शिखर।  हम  जिस  भी  मार्ग  से  जाऐगे  वह  चोटी  पर  अवश्य  पहुऊंच  जाता है।

जो  जिस  मार्ग  को  अपनाता  है।  वही  मार्ग  से  उसका  नाम  जुड़  जाता  है।  ठीक  उसी प्रकार  जिस  साधना मार्ग  को  अपनाते  है,  उसी के  अनुसार  भक्तिमार्ग,  ज्ञानमार्ग  या कर्मयोग साधनाए निर्धारित होती है। परन्तु लक्ष्य सभी का एक ही है। योग साधना के इन्ही विभिन्न मार्गो  के  नाम  है  -  ज्ञानयोग,  भक्तियोग,  कर्मयोग,  हठयोग,  लययोग,  मन्त्रयोग,  राजयोग आदि। इनमें से प्रमुख का वर्णन  इस  प्रकार  है। आइये हम ज्ञानयोग, भक्तियोग व कर्मयोग का विस्तृत अध्ययन करे।

ज्ञानयोग क्या है

हम इससे पूर्व में भी वर्णन कर चुके है। कि योग के क्षेत्र में साधक का जो भी मार्ग  होता है। अर्थात्  वह जिस  प्रकार के साधनो को अपनाता  है। उनका प्रयोग करता है। उन्ही के अनुरूप उसकी साधना का नाम होता है। यदि ज्ञान साधना के साधनो का प्रयोग किया जाए तो वह मार्ग ज्ञानयोग कहलायेगा। ज्ञानयोग वह साधना है जिसमें सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति  ज्ञान  मार्ग  द्वारा होती है। वह सभी साधनाए जिसमें ज्ञान को माध्यम बनाकर लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, उन्हे ज्ञानयोग कहते है।

श्रीमद्भगवद्  गीता  में  ज्ञानयोग  को  ही  सांख्ययोग  कहा  गया  है।  गीता  में  मोक्ष  की प्राप्ति के लिए ज्ञान की महत्ता का वर्णन किया गया है।

ज्ञानयोग  द्वारा  ब्रहम  से  साक्षात्कार  हो  जाता  है।  यह  ज्ञान  की  अन्तिम  व  उच्चतम अवस्था है। जिससे साधक में ’अहं ब्रहमास्मि’ का भाव जाग्रत होने लगता है।

ज्ञानयोग  के  अनुसार  -  ब्रहम  ही  सत्य  है।  ब्रहम  के  अतिरिक्त  अन्य  किसी  की महत्ता  इस  संसार  में  नहीं  है।  ज्ञानयोग  के  अनुसार  आत्मा  का  वास्तविक  स्वरूप  ब्रहम  है। और  एक  ब्रहम  ही  सत्य  स्वरूप  है।  ज्ञानयोग  के  सिद्धान्तो  के  अनुसार  आत्मा  शुद्ध,  बुद्ध, सत्य, नित्य, आनन्दस्वरूप तथा ज्ञानस्वरूप है।

-  ज्ञानयोग  का  उद्धेश्य  -  ज्ञानयोग  की  साधना  का  उद्धेश्य  है  ब्रहमभाव  की  स्थिति को प्राप्त करना तथा यह ब्रहम भाव की स्थिति ही मोक्ष है। ज्ञानयोग के अनुसार जीव तथा ब्रहम  की  एकता  का  ज्ञान  होना  ही  मोक्ष  है।  ज्ञानयोग  विवेक  ज्ञान  की  प्राप्ति  है।  जिसके द्वारा  सही  -  गलत  का  ज्ञान  होता  है।  नित्य  -  अनित्य  का  ज्ञान  प्राप्त  कर  मनुष्य  जीवन के  उद्धेश्य  को  प्राप्त  करना  ही  ज्ञानयोग  का  उद्धेश्य  है।

ज्ञान  द्वारा  ही  मनुष्य  देह  देवालय बन जाती है। मनुष्य जन्म सफल हो जाता है। क्योकि   मनुष्य जन्म साधना के लिए मिला है।  साधना  मनुष्य  योनि  में  ही  की  जा  सकती  है।  अन्य  योनियों  में  नही,  ज्ञानयोग  द्वारा मनुष्य  जन्म  सार्थक  बनाया  जा  सकता  है।  नित्य  -  अनित्य,  पाप  -  पु य,  सुख  -  दुख, खाद्य  -  अखाद्य  पर  विचार  कर  शारीरिक,  मानसिक  व  आध्यात्मिक  स्वास्थ्य  की  प्राप्ति  की जा  सकती  है।  अतः  ज्ञानयोग  का  उद्धेश्य  है,  समग्र  स्वास्थ्य  के  साथ  -  साथ  मोक्ष  की प्राप्ति।  अतः  आइये  हम  ज्ञानयोग  साधना  है  क्या है  ?  यह  कितने  प्रकार  की  है।  इनके  दोनों बर्हिरंग व अन्तरंग साधना का विस्तृत अध्ययन करें।

-  ज्ञानयोग  की  साधना  -  ज्ञानयोग  की  साधना  ज्ञान  मार्ग  के  द्वारा  सर्वोच्च  अवस्था की  प्राप्ति  है।  ज्ञानयोग  का  वर्णन  उपनिषदो  में  ध्यानात्मक  अवस्था  के  रूप  तथा  अन्र्तज्ञान क्षमता  को  विकसित  करने  वाले  साधनो  के  रूप  में  किया  गया  है।  ज्ञानयोग  एक  विद्या  है,

एक  ऐसा  विवेक  ज्ञान  है।  जिसके  द्वारा  मनुष्य  को  सही  गलत  का  ज्ञान  प्राप्त  होता  है। अन्र्तज्ञान  प्राप्त  होता  है।  अतः  कहा  जा सकता  है  ज्ञानयोग  ध्यान  द्वारा  सजगता की  प्राप्ति है।  ज्ञानयोग  ऐसी  सजगता  की  प्राप्ति  है,  जो  मनुष्य  को  अपने  अन्तर  में  उतार  देती  है। अन्र्तज्ञान  की  ऐसी  प्राप्ति  है,  जो  उस  अवस्था  तक  पहुऊंचा  देती  हैं।  जहाँ  यह  भाव  जाग्रत होता  है।  ’अहं  ब्रहमास्मि’  इस  अवस्था  में  साधक  स्वयं  को  ईश्वर  (ब्रहम)  के  रूप  में  जान पाता  है।  और  ईश्वर  (ब्रहम)  का  बोध  होते  ही  वह  उन  सभी  बन्धनो  से  मुक्त  हो  जाता  है। ज्ञानयोग हमे अपनी अन्र्तज्ञान, विशिष्टता के प्रति सजग होने की योग्यता है। इस अन्र्तज्ञान के पाते ही मन  के बन्धन  टूट  जाते है। और  अपने स्त्रोत  के निकट  आते है। ज्ञानयोग का

यौगिक  दृष्टिकोण  अनुभव  द्वारा  ज्ञान  प्राप्त  करना  है।  तथा  इस  प्रक्रिया  का  आरम्भ  शरीर तथा  मन  की  आवश्यकताओं  से  होकर  आध्यात्मिक  में  परिवर्तित  हो  जाता  है।  ज्ञानयोग  की साधना  में  अभीष्ट  लक्ष्य  को  प्राप्त  करने  के  लिए  मुख्यतः  दो  साधनो  का  वर्णन  किया  गया है। स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती ने इसे इस प्रकार बताया है -

--      बर्हिरंग साधना

--      अन्तरंग साधना

बर्हिरंग  साधना  -ज्ञानयोग  की  साधना  में  कुछ  बातो  का  पालन  आवश्यक  बताया  गया  है। प्रारम्भिक  अवस्था में जिन  बातो का पालन आवश्यक  है। उसे बर्हिरंग साधन कहा गया है।

बर्हिरंग साधनो को साधन चतुष्टय का नाम दिया गया है। बर्हिरंग साधन चार है। ये साधन निम्न लिखित है -

(क) - विवेक

(ख) - वैराग्य

(ग) - षट्सम्पत्ति

(घ) - मुमुक्षुत्व

(क).  विवेक  -    पाठको  ज्ञानयोग  के  बर्हिरंग  साधन  में  पहला  साधन  है  विवेक।  विवेक

एक  दिव्य  शक्ति  है।  उस  मनुष्य  का  कभी  पतन  नही  हो  सकता  है।   जिसने  विवेक  का सहारा  लिया।  विवेक  द्वारा  अपने  कार्य  किये  हो,  यह  एक  ऐसा  दिव्य  शक्ति  है।  जिससे मनुष्य  जीवन  में  सकारात्मक  परिवर्तन  होते  देखे  गये  है।  और  विवेकहीन  मनुष्य  ही  हमेशा दुखी  व  अस्वस्थ  देखे  जाते  है।  लौकिक  दृष्टिकोण  से  सही  -  गलत  का  ज्ञान  होना  ही विवेक  है।  परन्तु  आध्यात्मिक  दृष्टिकोण  से  यदि  देखे  तो  विवेक  का  तात्पर्य  नित्य,  अनित्य का ज्ञान है।

तत्वबोध में वर्णन मिलता है -

‘’नित्यवस्त्वेकं ब्रह्म तद्व्यतिरिक्तं सर्वमनित्यम्। अयमेव नित्यानित्यवस्तु विवेकः।।’’

अर्थात्  एकमात्र  ब्रहम  ही  नित्य  है।  और  समस्त  जगत्  अनित्य  है।  ब्रहम  के  सिवा

यह जगत मिथ्या हैं। कहा भी गया है, कि ’ब्रहम सत्यं जगतमिथ्या’।

पाठको विवेक ज्ञान वह ज्ञान है। कि एक ब्रहम ही सत्य है, अजर है, अमर है, तथा यह संसार  नश्वर  है। अतः  जागतिक  विषयों या इस  संसार के  प्रति राग न  रखते हुए उस ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधना करनी  चाहिए। उस ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधक को विवेक की आवश्यकता होती है, कि इस मार्ग  में चलने  के लिए आहार,  विहार, व्यवहार की  शुद्धि  होना  आवश्यक  है।  शरीर  संशुद्धि  के  लिए  आहार  रूपी  विवेक  ज्ञान  आवश्यक  है, कि  क्या  खाना  चाहिए  क्या  नही।  शास्त्रों  में  कहा  भी  गया  है।  कि  ’जैसा  खाये  मन  वैसा होवे मन’। अर्थात् जैसा हम अन्न खाते है वैसा ही हमारा मन हो जाता है। अतः उन्नति के लिए  सात्विक  आहार  ग्रह ण  करना  चाहिए।  शास्त्रों  में  आहार  संशुद्धि  पर  बल  देते  हुए  कहा गया है  कि  भोजन  किस  प्रकार का है, तामसिक खाद्यपदार्थ तमोगु णी बनाते है।  तथा अच्छे मन  से  या  अच्छी  भावनाओ  से  न  बनाया  गया  भोज्य  पदार्थ  तामसिक  वृत्ति  उत्पन्न  करता है।  खाद्य  -  अखाद्य  का  ज्ञान  साधक  को  रखना  चाहिए।  इस  प्रकार  संसारी  वृत्तियो  में आसक्ति  न  रखते  हुए  खाद्य  -  अखाद्य  तथा  सत्य  -  असत्य  के  सही  गलत  का  ज्ञान,  को रखकर, ईश्वर को प्राप्त करना विवेक ज्ञान है।

(ख).  वैराग्य  -  वैराग्य  शब्द  का  सामान्य  अर्थ  है,  बिना  राग  के।  अर्थात  जिस  मनुष्य  को राग नहीं है, वह वैराग्य है। वैराग्य वह अवस्था है, जिसमे मनुष्य को विवेक ज्ञान की प्राप्ति के  पश्चात्  संसार  के  भोगों  के  प्रति  आसक्ति  नही  रहती  है,  तथा  पारलौकिक  सुख  ऐश्वर्य की  भी  आसक्ति  नही  रहती,  इन  दोनों  इहं  लौकिक  तथा  पारलौकिक  सुख  भोग  की  ईच्छा का  परित्याग  कर  देना  ही  वैराग्य  है।  मनुष्य  देखे  गये  तथा  सुने  गये  दिव्य  सुख  भोगों  से इच्छा  रहित  हो  जाता  हैं।  तथा  इन  लोको  के  भोणगो  के  प्रति  वासना  का  उदय  न  होना  ही वैराग्य है।

(ग).  षट्सम्पत्ति  -  षट्  सम्पत्ति  का  अर्थ  है,  छः  साधन।  ज्ञानयोग  की  साधना  में  ये  छः साधनो  का  साधक  को  अवश्य  पालन  करना  होता  है।  जब  वह  इन्हे  जीवन  में  अपना  लेता हैं, तब इन्हे साधक की षट्सम्पत्ति माना जाता है। ये षट्सम्पत्ति ऐसी है, जिनके सहारे ही

योग साधना में आगे बड़ा जा सकता है। ये षट्सम्पत्तियां है -

1. शम,दम
  1. तितिक्षा
  2. उपरति
  3. श्रृद्धा
  4. समाधान
1.शम  -  इन्द्रिय  निग्रह  कर  आत्मा  को  परमात्मा  में  लगाना  शम  है।  ज्ञान  द्वारा  इन्द्रियो  को संयमित  कर  अपने  चित्त  को  आत्मा  में  लगाना  शम  है।  इन्द्रिय  संयम  ज्ञान  द्वारा  किया  जा सकता  है।  मनुष्य  की  11  (  इग्यारह  )  इन्द्रियां  है।  उसमें  पांच  ज्ञानेन्द्रिया,  पांच  क्रमेन्द्रियां और एक मन है। मन ही एक ऐसी इन्द्रिय है। जो सबसे अधिक चंचल है। वायु से भी तेज गति  वाले  इस  मन  को  नियन्त्रित  करना  बढ़ा  ही  मुस्किल  हैं।  इस  लिए  इस  मन  का  नाम अतेन्द्रिय  है।  जैसा  की  शास्त्रो  में  भी  कहा  गया  है  -  ’समो  नाम  अन्तरिन्द्रिनिग्रहः अन्तरिन्द्रिय नाम मनः तस्य निग्रहः’।।

अर्थात् शम का तात्पर्य यहाँ अन्तरिन्द्रिय निग्रह कहा गया है। और वह अन्तरिन्द्रिय मन है। ओर इस मन के नियन्त्रित होते ही इन्द्रिय निग्रह सम्भव है। अतः इस मन को वश में करने के लिए अन्य शास्त्रो के साथ - साथ गीता में भी साधना बताई गयी है -

‘’असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहंचलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येन च गृहृयते।।’’

अर्थात्  ये  महावाहो  अर्जुन  निश्चय  ही  यह  मन  बड़ा  चंचल  है।  परन्तु  इस  मन  को वश  में  करने  के  दो  साधन  है।  ’अभ्यास’  और  ’वैराग्य’।  अभ्यास  और  वैराग्य  के  द्वारा  मन को  अवश्य  ही  वश  में  किया  जा  सकता  है।  इन्द्रियो  को  इस  प्रकार  से  निग्रह  कर  लेना  ही ’शम’ है।
  1. दम -  दम  का  अर्थ  है,  दमन  करना।  बाहृय  विषयो  से  इन्द्रियो  को  निग्रह  कर  लेना  दम है। मनुस्मृति में कहा गया है -
‘’इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिशु। संयमेयत्वमातिष्ठेद् विद्वान यत्नेश वाजिनाम्।।’’

अर्थात्  विवेकी  पुरूष  अनुचित  कार्यो  तथा  विषयो  में  भागी  जाने  वाली  इन्द्रियो  को बड़े यत्न से नियन्त्रित कर लेता है। जैसे एक दक्ष सारथी पशु  को लगभग खींच कर काबू कर  लेता  है  तथा  अपने  अनुसार  उसे  मार्ग  पर  ले  जाता  है।  ठीक  उसी  प्रकार  दम  रूपी लगाम  से  अनुचित  मार्ग  मे  जाने  वाली  इन्द्रियो  का  निग्रह  करके  ब्रहम  के  चिन्तन  में  लगाये रखने वाली विद्या दम है।
  1. उपरति -  उपरति  का  तात्पर्य  विरति  हो  जाना  है।  अर्थात्  किसी  भी  वस्तु  की  प्राप्ति  ही जाने पर भी उसमे आसक्त न होना उदासीन बने रहना उपरति है। उपरति सभी जागतिय, सासारिक  वस्तुओं  में  अनासक्ति  का  भाव  है।  तथा  कामनाओ  को  समाप्त  कर  इन्द्रियो  के विषयो से हटाना ही अविरति है। आचार्य शंकर के अनुसार -
’जागतिक  विषयो  से  राग  रहित  होकर  तथा  अपने  -  अपने  धर्म  का  पालन  कर अपने चित्त को निर्मल बनाकर अन्तरात्मा में लगाये रखना ही उपरति है।’
  1. तितिक्षा -  अपने  ध्येय  या  लक्ष्य  की  प्राप्ति  के  लिए  किसी  भी  प्रकार  के  द्वन्द्वो  को  सहन कर लेना तथा साधना में तत्पर रहने का नाम तितिक्षा है।
तितिक्षा का शाब्दिक अर्थ है सहनशीलता। अपने साधना के मार्ग में आने वाले द्वन्द जय  पराजय,  लाभ  हानि,  सुख  दुख  तथा  शीत  व  उष् ण  को  सहर्ष  सहन  करना  ही  तितिक्षा है।  तितिक्षा  व तप  करने  के  लिए  सभी द्वन्दो  को  सहन  करने  के  लिए  कहा  गया है।  जैसा कि वर्णन मिलता है -’तपो द्वन्द सहनम्।’

अर्थात्  सभी  प्रकार  के  शारीरिक  व  मानसिक  द्वन्दो  को  सहन  करना  तप  है।  योग सूत्र में महर्षि पतंजलि ने वर्णन किया है - यही तितिक्षा है।

’कायेन्द्रियशिद्धिर शुद्धिक्षयात्तपसः।’

- 2/43 पा0 यो0 सू0

अर्थात् तप के प्रभाव  से अशुद्धि का क्षय  हो जाता  है। शरीर  शुद्ध तथा इन्द्रियां संयमित  हो जाती है।

5.श्रद्धा -  श्रद्धा नाम विश्वास का है। प्राचीन  आर्ष  ग्रन्थों तथा वेद  वाक्यो तथा गुरू  वाक्यों में दृढ़ निष्ठा व विश्वास ही श्रद्धा है। शास्त्रों में कहा भी गया है -

’गुरूवेदान्तवाक्यादिशु विश्वासः श्रद्धा।’

अर्थात्  अपने  गुरू  तथा  वेद, पुराण,  शास्त्रों  के  वाक्यों  में  दृढ़  विश्वास  व  आस्था  ही श्रद्धा  है।      शास्त्रो  में  ही  वर्णन  मिलता  है।  कि  जिस  मनुष्य  को  गुरू  वाक्य, वेद वाक्य में श्रद्धा नही रहती, संशय रहता है। उनका कभी भी उत्थान नही हो  सकता है, पतन  अवश्य  होता  है।  अतः  गुरू  वाक्य  और  वेद  वाक्य,  शास्त्रो  में  श्रद्धा  का  होना  अति आवश्यक है। ब्रहम ज्ञान की प्राप्ति के लिए तथा आत्मोत्थान के लिए।

6.समाधान  -  चित्त  की  एकाग्र  अवस्था  ही  समाधान  है।  चित्त  स्वभाव  से  चंचल  है,  परन्तु साधना  तथा  अपने  ईष्ट  की  उपासना,  जप,  ध्यान  के  द्वारा  चित्त  को  एकाग्र  किया  जा सकता  है।  तथा  एकाग्र  चित्त  के  द्वारा  आत्मानुसन्धान  में  लगे  रहना  ही  समाधान  है।  अपने चित्त को सदा ब्रहम चिन्तन में ही रत रखना ही समाधान है।

(घ). मुमुक्षुत्व - जागातिय विषयों से वैराग्य होने पर उस नित्य सुख की प्राप्ति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति की तीव्र इच्छा मुमुक्षुत्व कहलाता है। तथा मुमुक्ष पुरूष परमात्मा से इस प्रकार के भाव व्यक्त करता है -

’संसार बन्धनिर्मुक्तः कथमेस्यात्कदाविभो।’

अर्थात्  हे  ईश्वर  इस  संसार  चक्र  रूपी  बन्धन  जिसमें  कि  बार  -  बार  जन्म  तथा मृत्यु  होती  है,  से  कब  मुझे  मुक्ति  मिलेगी।  इस  प्रकार  जन्म  -  मरण  के  बन्धन  से  मुक्त होकर परम् पद मोक्ष की प्राप्ति के लिए तीव्र उत्क ठा का होना ही मुमुक्षुत्व है।

अन्तरंग साधना -

ज्ञानयोग साधना में साधक चतुष्टय को बर्हिरंग साधना माना गया है। तथा अन्तरंग साधन  श्रव ण,  मनन  तथा  निदिध्यासन  को  माना  गया  है।  यह  साधन  तीन  हैं  -  1.श्रव ण  2. मनन 3.निदिध्यासन।
  1. श्रव ण -  श्रव ण  का  अर्थ  है  सुनना।  सुनने  से  तात्पर्य  जो  सनने  लायक  हो  उसे  सुनना। अर्थात ब्रहम ज्ञान के विषय में सुनना संशय रहित सुनना। तथा उसे गुरूमुख से संशय की निवृत्ति  के  लिए  सुनना।  इस  प्रकार  गुरूमुख  से  संशय  रहित  ब्रहमज्ञान  के  विषय  में  श्रव ण करना ’श्रवण’ कहलाता है।
  2. मनन -  ब्रहमविषयक  श्रव ण  किया  हुआ  ज्ञान  यथार्थ  रूप  में  अपने  अन्तःकरण  में  उतार लेना  मनन  है,  या  उस  ब्रहम  का  निरन्तर  चिन्तन,  मनन  कहलाता  है।  मनन  से  अस्पष्ट विषयों  को  स्पष्ट  कर  तथा  संशय  से  रहित  चिन्तन  दृढ  निश्चयात्मक  हो  जाता  है।  इस
प्रकार  गुरूमुख  से  सुने  हुए  ज्ञान  निश्चयात्मक  ज्ञान  का  बार  -  बार  चिन्तन  करना  मनन कहलाता है।
  1. निदिध्यासन -  वेदान्त  के  अनुसार  निदिध्यासन  ही  योग  है।  निदिध्यासन  का  अर्थ  है, अनुभव  प्राप्त  ज्ञान  या  आत्मसाक्षात्कार।  ज्ञानयोग  में  योगी  ज्ञान  अर्जित  करने  के  साथ  - साथ उसे अपने जीवन  पर लागू भी करते है। वे ऐसे किसी ज्ञान को व्यर्थ  मानते है  जिन्हें वह अपने जीवन में उपयोग न कर सके। ऐसा ज्ञान जिसे वह अपने जीवन में उपयोग कर अनुभव कर सके ओर ऐसा अनुभवात्मक ज्ञान तथा बोध प्राप्त करना ही आधार है।
स्वामी  विज्ञानानन्द  सरस्वती  ने  निदिध्यासन  के  15  अंगों  का  वर्णन  किया  है। जिनका वर्णन निम्न प्रकार है -
  1. यम - विषयो के वशीभूत इन्द्रियों को अपने वश में करके ब्रहम चिन्तन में लगा देना यम है।
  2. नियम -  वह  वृत्ति  जो  हमे  परमात्मा  से  दूर  करे  उसे  विजातीय  वृत्ति  कहा  जाता  है। विषयों  से  लिप्त  वृत्ति  विजातीय  वृत्ति  है।  तथा  ईश्वरोन्मुख  वृत्ति  सजातीय  वृत्ति  है।  अतः विजातीय वृत्ति का निरोध करना ही नियम है।
  3. त्याग - समस्त  संसार  के  पदार्थ  क्षण  भंगुर  है।  यह  जगत  एक  प्रपंच  है।  एक  मायाजाल है,  अनित्य  है।  तथा  ब्रहम  ही  सत्य  है।  तीनों  कालो  से  परे  है  अविनाशी  है।  इस  प्रकार  के ज्ञान  से  इस  संसार  के  मायाजाल  का,  प्रपंच  का  त्याग  हो  जाता  है।  इसी  को  महापुरूष त्याग कहते हैं।
  4. मौन -  योग  साधना  में  प्रजल्प  (अत्यधिक  वार्तालाप)  को  बाधक  तत्व  के  रूप  में  बताया गया  है।  अतः  अत्यधिक  वार्तालाप  न  कर  मौन  धारण  करना  ही  योगियों  का  मौन  है।  तथा इन्द्रियो को संयमित कर अपनी आन्तरिक    र्जा को ब्रहम चिन्तन में रमण कर देना ही मौन है।
  5. देश - अपने अन्तकरण में किसी एक क्षेत्र (देश) में मन को लगा देना।
  6. काल -  यह  ज्ञान  रखना  कि  वह  ईश्वर  तीनो  कालों  से  परे  है।  तीनो  कालों  में  उनका नाश सम्भव नहीं है। वह अजर, अमर, अविनाशी है। वही कालों में महाकाल है।
  7. आसन - वह अवस्था जिसमे सुखपूर्वक, निरन्तर बैठकर ब्रहम चिन्तन किया जा सके, वह आसन है।  जिन  आसनो  में  ध्यान  के  लिए  सुखपूर्वक  बैठा  जा  सके,  वह  ध्यान  के  आसन निम्न है - सिद्धासन, पद्मासन, स्वस्तिकआसन, सुखासन आदि।
  8. मूलबन्ध - हठयोग के विपरीत यह ईश्वर के साथ चित्त का लगने वाला बन्ध है। क्योकि वह ब्रहम  समस्त  भूतो  का  मूल  है।  अतः  उस  ब्रहम  के  साथ  चित्त  का  बन्ध  ही  यर्थाथ मूलबन्ध है। यह राजयोगियो के द्वारा अपनाया गया बन्ध है।
  9. देहस्थिति - चित्त का ब्रहम में एकाग्र व निश्चल हो जाने पर देह व अंगो की स्थिति भी निश्चल व एकाग्र हो जाती है। यही चित्त व देह की साम्यता की स्थिति है।
  10. दृक्स्थिति -  दृष्टि  को  ज्ञानमय  बनाकर  समस्त  संसार  को  ब्रहममय  देखना।  यह  दृष्टि की उत्तम दृष्टि है। इस प्रकार ‘ब्रहमौवेदं सर्वम वाली दृष्टि ही उत्तम दृष्टि है।
  11. प्राणायाम -  ज्ञानयोगियो  द्वारा  अपनाया  गया  प्रा णायाम  इस  प्रकार  है  -  श्वास  भरते समय  यह  चिन्तन  ‘मैं  ही  ब्रहम  हूऊं’  करना  पूरक  प्राणायाम  है,  उस  वृत्ति  की  निश्चल  स्थिति का  नाम  कुम्भक  प्रा णायाम  है।  तथा  श्वास  का  रेचक  करते  समय  इस  जगत  के  प्रपंच  का अभाव का भाव का नाम रेचक प्राणायाम है।
  12. प्रत्याहार - प्रत्याहार का अर्थ है, इन्द्रिय संयम। इस संसार के विषयो में क्षणभंगुरता का निश्चय करके मन को अन्तर्मुखी बना लेना प्रत्याहार है
  13. धार णा -  किसी  भी  देश  में  चित्त  को  एकाग्र  करना  या  बाधना  धार णा  है।  धार णा  का वर्णन योगसूत्र में इस प्रकार है -
‘देशबन्धश्चित्तश्य धार णा।’

- पा0 यो0 सू0 3/1

अर्थात्  किसी  भी  देश  (बाहय  अथवा  भीतर)  में  चित्त  को  बाध  देना  धार णा  है।  यह

धार णा मध्यम व निम्न कोटि के साधको के लिए बताई गयी है। उत्तम अधिकारियो के लिए किसी भी अनात्म वस्तु में   चित्त को न लगाकर चेतन तत्व में चित्त को लगाना ही धार णा है। वेदान्त सार के अनुसार -

‘उस  अद्वितीय  वस्तु  (ब्रहम)  में  मन,  बुद्धि,  चित्त  आदि  को  बाध  देना  या  लगा  देना ही धारणा है।’
  1. ध्यान -  धार णा  की  परिपक्व  अवस्था  ही  ध्यान  है।  ध्यान  का  वर्णन  करते  हुए  योगी
‘सदानन्द यति’ ने वेदान्त सार में कहा है -

‘तत्राद्वितीयवस्तुनिविच्छद्यान्तरिन्द्रिय वृत्ति प्रवाहोध्यानम्।’

- वेदान्तसार अर्थात्  उस  अद्वितीय  ब्रहमतत्व  का  चित्त  का  विभिन्न  अवस्थाओं  का  होने  पर  भी

लगातार  एकतानता  पूर्वक,  एक  समान  वृत्ति  का  प्रवाहित  होते  रहना  ध्यान  कहा  जाता  है।

अर्थात् ध्येय वस्तु में तेल की धारा के समान वृत्ति का प्रवाह चलते रहना ही ध्यान है।
  1. समाधि -  समाधि  ध्यान  की  परिपक्व  अवस्था  है।  योगदर्शन  में  समाधि  का  वर्णन  करते हुए कहा गया है -
ध्यान में जब ध्येय मात्र की प्रतीति रहती है। तथा चित्त स्वरूप शून्य हो जाता है। वह  अवस्था  समाधि  की  अवस्था  होती  है।  समाधि  की  परिभाषा  करते  हुए  ‘विद्यार य  स्वामी’ जी ने लिखा है -

‘निर्वातद्वीपवच्चितं समाधिरभिधियते।’

अर्थात् वायु रहित स्थान के दीपक की तरह अचंचल चित्त की निश्चल अवस्था का नाम ही समाधि है।


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