मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा की स्थापना को समझिए: हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का राम राज्य 29

 हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का राम राज्य (२९)
मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा की स्थापना को समझिए
 मनोज जोशी         (गतांक से आगे)
श्रृंखला की पिछली दो कङियों में वीर सावरकर और स्वामी श्रृद्धानंद का जिक्र आने के साथ ही यह श्रृंखला इतिहास के एक ऐसे मोङ पर है जिसके बारे में कहा जाता है कि गाँधीजी और उस समय के हिंदू नेताओं के बीच गहरे मतभेद ही नहीं बल्कि मनभेद थे। और आरोप तो गाँधीजी की हत्या के षड्यंत्र तक का लगता है। लेकिन इन सब विषयों पर चर्चा से पहले उस दौर के राजनीतिक सामाजिक माहौल को समझना बहुत जरुरी है। पहले हम समझेंगे कि आखिर मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा की स्थापना कैसे हुई? वही मुस्लिम लीग जिसकी माँग पर पाकिस्तान बना और वही, हिंदू महासभा जिसका नाथूराम गोडसे पदाधिकारी था और हिंदू महासभा इसे आज भी स्वीकार करती है।
२१वीं शताब्दी के तीसरे दशक की शुरुआत में बैठ कर हमें १९ वीं शताब्दी से लेकर २०वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के भारत की सांप्रदायिक स्थिति को समझना होगा। कई लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान का जनक स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था, लेकिन बाद में उनके पिता ने हिंदू जातिवाद से नाराज होकर मुस्लिम धर्म ग्रहण कर लिया और जिन्ना मुस्लिम हो गए। (इस कहानी को मैं पूर्व में फेसबुक पर लिख चुका हूं) लेकिन यहां यह उदाहरण देकर मैं यह कहना चाहता हूं कि उस समय इस तरह से conversion सामान्य बात थी। गाँधीजी के बेटे के conversion और फिर आर्य समाज में शामिल होने की कहानी भी इस सीरिज में आ चुकी है। तो एक तरफ हिंदू समाज जातियों में बंटा हुआ था और दूसरी तरफ conversion हो रहा था। इसके साथ ही छोटी-छोटी बातों पर दोनों समुदायों में संघर्ष के हालात बनते रहते थे।


अब अंग्रेजों ने इसका फायदा उठाया और उन्होंने मुस्लिम लीग का गठन कराया। समझिए मुस्लिम लीग का गठन कैसे हुआ? यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि लॉर्ड मिंटो ने मुस्लिम लीग के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वही मिंटो जिनके नाम पर भोपाल में मिंटो हॉल है और इसी भवन में पांच दशकों तक विधानसभा का संचालन हुआ है, यानी जिस भवन में बैठ कर संविधान की कसम खाकर कानून बनते थे वह भवन एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर है जिसने उस राजनीतिक दल का गठन कराया जो देश विभाजन की वजह बना।

दरअसल हिंदुओं के बीच सरकार विरोधी रुख को देखकर ब्रिटिश अधिकारियों ने मुसलमानों को संरक्षण देने की नीति अपनाई। 19 जुलाई 1905 को भारत के तत्कालीन वाइसराय कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा की। बंग भंग के विरोध में व्यापक आंदोलन चला लेकिन पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के इस विभाजन ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन दिया।लॉर्ड कर्जन ने कई बार पूर्वी बंगाल का दौरा कर यह स्पष्ट कर दिया था कि वे मुस्लिम बहुल क्षेत्र के रूप में पूर्वी बंगाल का निर्माण कर रहे हैं। उनका तर्क था कि वहाँ मुसलमानों को विकास का पर्याप्त अवसर मिलेगा।

लॉर्ड कर्जन के बाद लॉर्ड मिन्टो भारत का वायसराय बना। लॉर्ड मिंटो ने ब्रिटेन में भारत मंत्री लॉर्ड मार्ले के कथित संवैधानिक सुधारों को लागू करने और राष्ट्रवाद की धारा को कमजोर करने के लिए अभिजात्य वर्ग के मुस्लिम व्यक्तियों से संपर्क किया। लॉर्ड मिन्टो ने कहा था कि– “मुस्लिम सम्प्रदाय को इस बात से पूर्णतः निश्चित रहना चाहिए कि मेरे द्वारा प्रशासनिक पुनर्संगठन का जो कार्य होगा उसमें उनके अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे|”
इसके बाद अंग्रेज़ों के सहयोग और संरक्षण में ढाका (अब बांग्लादेश) में मुसलमानों का एक सम्मेलन ३०दिसम्बर, १९०६ को बुलाया गया| सम्मलेन का अध्यक्ष नवाब बकार-उल-मुल्क को बनाया गया| अखिल भारतीय स्तर पर एक मुस्लिम संगठन की नीव इसी सभा में रखी गई। सम्मेलन में ढाका के नवाब सलीम उल्ला खां ने “मुस्लिम ऑल इंडिया कान्फ्रेड्रेसी के निर्माण का सुझाव दिया। लेकिन उनके प्रस्ताव को बहुमत से अस्वीकृत कर संगठन का नाम “ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” रखा गया। अगले साल १९०७ में कराची में हुए मु्स्लिम लीग के दूसरे सम्मेलन में इसका संविधान बनाया गया। इस संविधान में मुस्लिम लीग के जो उद्देश्य तय किए गए जरा उन पर गौर फरमाइए|

ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीय मुसलमानों में निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होने वाली सरकारी कुधाराणाओं को दूर करना| भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक और अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताएँ और उच्च आकांक्षाएँ सयंत भाषा में सरकार के सामने रखना जहाँ तक हो सके, उपर्युक्त उद्देश्यों को यथासंभव बिना हानि पहुँचाये, मुसलमानों और भारत के अन्य सम्प्रदायों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना|

अगली कङी में हिंदू महासभा के गठन पर चर्चा करेंगे, इसके बाद पूर्व में २७ वीं कङी में हुई वीर सावरकर और गाँधीजी के संबंधों पर चर्चा को कुछ और आगे बढ़ाएंगे|

(क्रमशः)
साभार: MANOJ JOSHI - 9977008211

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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