वराह पुराण संक्षेप -दिनेश मालवीय

वराह पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

विष्णु भगवान के दशावतारों में एक अवतार ‘वराह’ का है. यह अवतार उन्होंने पृथ्वी का उद्धार करने के लिए लिया था. ‘वराह पुराण’ में इस अवतार की विस्तार से व्याख्या की गयी है. इसमें 217 अध्याय और करीब दस हजार श्लोक हैं. इन श्लोकों में इस अवतार के धर्मोपदेशों को कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

इस पुराण में मुख्य रूप से तीर्थों का महात्म्य और अधिक से अधिक दान-दक्षिणा देने का उपदेश दिया गया है. कुछ सनातन उपदेश भी हैं, जिन्हें ग्रहण करने से जीवन सुखमय हो सकता है. इस पुराण में भगवान विष्णु की पूजा और अनुष्ठान विधिपूर्वक करने की शिक्षा दी गयी है. इसके अलावा, त्रिशक्ति महात्म्य, शक्ति महिमा, गणपति चरित्र, कार्तिकेय चरित्र, रूद्र क्षेत्रों के वर्णन के साथ ही सूर्य, शिव, ब्रह्मा माहात्म्य भी बताया गया है. इसमें अग्निदेव, अश्विनीकुमार, गौरी, नाग, दुर्गा, कुबेर, धर्म, रूद्र, पितृगण, चन्द्र की उत्पत्ति, मत्स्य और कूर्मावतारों की कथा, व्रतों का महात्म्य, गोदान, श्राद्ध तथा और अनेक संस्कारों तथा अनुष्ठानों को विधिपूर्वक सम्पन्न करने पर बल दिया गया है.

‘वराह पुराण’ में दशावतार की कथा पारंपरिक रूप में न होकर विविध मासों की के महात्म्य के रूप में दी गयी है. इसी पुराण में श्रृष्टि की रचना, युग महात्म्य, पशुपालन, सप्त द्वीप वर्णन, नदियों और पर्वतों के वर्णन, सोम की उत्पत्ति, तरह-तरह के दान-पुण्य की महिमा, सदाचारों और दुराचारों के फलस्वरूप स्वर्ग और नरक का वर्णन, पापों का प्रायश्चित करने की विधि आदि का विस्तार से वर्णन है. इसमें महिषासुर की कथा भी दी गयी है. ‘वराह पुराण’ में श्राद्ध और पिण्डदान की महिमा का भी वर्णन है.

इस पुराण का ‘नचिकेता उपाख्यान’ भी बहुत महत्वपूर्ण है. इसमें पाप समूह और पाप-नाश के उपायों का सुंदर वर्णन किया गया है. कुछ प्रमुख पाप कर्मों का उल्लेख करते हुए, इसमें कहा गया है कि हिंसा, चुगली, चोरी, आग लगाना, जीव हत्या, असत्य कथन, अपशब्द बोलना, दूसरों को अपमानित करना, व्यंग्य करना, झूठी अफवाहें फैलाना, स्त्रियों को बहकाना, मिलावट करना आदि पाप हैं.

नारद और यम के संवाद में मनुष्य पाप कर्म से किस प्रकार बचे, इसका जबाव देते हुए यम कहते हैं कि यह संसार मनुष्य की कर्मभूमि है.जो भी इसमें जन्म लेता है, उसे कर्म करने ही पड़ते हैं. कर्म करने वाला स्वयं ही अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी होता है. आत्मा ही आत्मा का बन्धु, मित्र और सगा होता है. आत्मा ही आत्मा का शत्रु होता है. जिस व्यक्ति का अंत:ककरण शुद्ध है, जिसने अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर ली है और जो सभी प्राणियों में समता का भाव रखता है, वह सत्यज्ञानी मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है.

जो व्यक्ति योग तथा प्राणायाम के द्वारा ‘मन’ और ‘इन्द्रियों’ पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह सभी तरह के पापों से मुक्त हो जाता है. जो व्यक्ति मन-कर्म-वचन से किसी जीव की हिंसा नहीं करता, जो सदा न्याय-नीति पर चलता है और शुभ कर्म करते हुए अशुभ कर्मों से  दूर रहता है, वह किसी पाप का भागीदार नहीं होता.

इस पुराण में चारों वर्णों के लिए सत्य धर्म का पालन और शुद्ध आचरण करने पर बल दिया गया है. ‘ब्राह्मण’ को अहंकार रहित, स्वार्थ रहित, जितेन्द्रिय और अनासक्त योगी की भांति होना चाहिए. ‘क्षत्रिय’ को अहंकार रहित, आदरणीय और छल-कपट से दूर रहना चाहिए. ‘वैश्य’ को धर्मपरायण, दानी, लाभ-हानि की चिंता न करने वाला और कर्तव्य परायण होना चाहिए. ‘शूद्र’ को अपने सभी काम निष्काम भाव और सेवा भाव से भगवान को अर्पित करते हुए करना चाहिए. उसे अतिथि सत्कार करने वाला, शुद्धात्मा, विनयशील, श्रद्धावान और अहंकार हीन होना चाहिए. ऐसा शूद्र ऋषियों से बढ़कर होता है.

‘वराह पुराण’ के अन्य उपाख्यानों में चील, सियार, खंजन आदि पशु-पक्षियों द्वारा यह उपदेश दिया गया है कि सच्चा सुख उसीको प्राप्त होता है, जो स्वार्थ का त्याग कर परोपकार और परमार्थ का जीवन व्यतीत करता है. ईश्वर का सच्चा भक्त वही है जो परनिंदा नहीं करता, हमेशा सच बोलता और परायी स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालता.  धर्म कोई बंधी-बंधाई वस्तु नहीं है. सभी विद्वानों ने धर्म की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की है. देश-काल के अनुसार धर्म के रूप बदलते रहते हैं.

इसमें कहा गया है कि जो लोग धर्म के वास्तविक रूप को ठीक से समझते हैं, वे कभी दूसरे धर्मों का अपमान या निरादर नहीं करते. वे सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते हैं. वाद-विवाद में नहीं पड़ते. इस पुराण का यही उपदेश है.


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