वरूण…नहीं तो जीवन ही नहीं…!रावण की त्रैलोक्य विजय -51

वरूण…नहीं तो जीवन ही नहीं…!

Ravan-Ka-Path-Chap51

रावण की त्रैलोक्य विजय -51

इतिहास ने भी कैसे ,कैसा समय देखा है। लोकपाल वरूण के राज्य पर रावण ने आक्रमण कर दिया।वरूण ,ब्रह्मलोक में संगीत सुन रहे थे।इस कथा के संदर्भ में हम वरुण के संबंध में कुछ और भी जान लेते हैं।सनातन धर्म में हर चीज के दो रूप हैं। आधिदैविक और आधिभौतिक। सरल भाषा में यह कि ग्रह आकाश में भी स्थित हैं और व्यक्तियों के नाम भी। चंद्रमा ग्रह भी है। औषधियों तथा ब्राह्मणों का राजा भी है। आधिदैविक (आकाश) जगत में जो सत्य है। वही आधिभौतिक (पृथ्वी) पर भी।

हम वरुण के दोनों स्वरूपों पर चर्चा करेंगे। वरुण और विष्णु अदिति के पुत्र हैं। दोनों भाई हैं। वरुण बडे़ हैं। विष्णु छोटे हैं। दोनों का संयुक्त नाम मैत्रावरुण है। अदिति और ऋषि कश्यप की संतान के रुप में यह दोनों देवता आधिभौतिक ही हुए। किंतु इनका आधिदैविक स्वरूप बहुत विचित्र है। खगोल शास्त्र में वरूण को रात्रि कहा गया है। हमारा पश्चिम कपाल (कनपटी) रात्रि है।जिसमें असुरों का डेरा है। पूर्व कपाल में विष्णु हैं। अर्थात दिन। प्रकाश। यहां विष्णु देवता का निवास है।देवताओं और असुरों के बीच (मानसिक द्वंद) वैचारिक संघर्ष चलता ही रहता है। असुर शक्तिशाली हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है देवता तो कुल 33 ही हैं। किंतु असुर तो 99 ,तीन गुना अधिक हैं। शैतान पक्ष अपराध, अन्याय और अनाचार के अधीन है। परन्तु दैविक पक्ष ऐसे विचारों को रोकता है। प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में यह संघर्ष चलता ही रहता। सत्य तो यह है कि 33 देवता, संघर्ष के बाद भी पराजित होते रहते हैं।

ऋग्वेद के एक मंत्र में वरुण के और भी सारे काम गिना दिये गये हैं।"वनेशु हि इदं अंतरिक्षं विततं वृक्षाग्रेषु वाजमर्वस्तु पय उस्त्रियासु। ह्रत्सु,क्रतुं वरुणे विश्वाग्निम दिवि सूर्यमदघात्सोमभद्रौ। "इस मंत्र में वरुण के शक्तिशाली और सर्वमान्य स्वरुप का दिग्दर्शन होता है।

कभी कभी हम कहते हैं..! क्यों भाई..! तुम्हारी मुइयां क्यों उतर रही है। मुंह पर पानी तो है ही नहीं। कहां चली गई तुम्हारे मुंह की चमक...? मुंह पर मक्खियां क्यों भिनभिना रहीं हैं। कभी किसी से कोई यह कहते भी सुना जाता है कि...! चमक रहे हो। अरे तुम्हारे तो हाथ पैरों में भी बेजा रंगत है। चमक ...है। यही चमक तो वरुण है। उत्साह, उमंग और साहस का नाम ही वरुण है। वरुण, जलों के देवता हैं। जल से ही चमक है। कहते हैं... चेहरे पर कितना पानी है। पानीदार है, यह आदमी। पानीदार व्यक्ति में संकल्प होता है। वह उत्साह पूर्वक कोई भी काम कर सकता है।

वृक्षों में जो शाखायें फैलतीं हैं। वृक्ष जो अंतरिक्ष को छू लेना चाहते हैं। सभी के पीछे वरुण है। जल है। वृक्ष की शाखाओं द्वारा अंतरिक्ष को छू लेने की तमन्ना उत्साह है। उमंग है। क्योंकि वहां जल है। वृक्षों की जड़ों में भरपूर आर्द्र है। इसी प्रकार वाज (वीर्य) भी तो जल ही है।"वीर्य वै वाजः। पुमांसोऽर्वन्तः। पुस्वेवैवतः वीर्य दधाति। पयः उत्रिस्यासु इति। "यह जो गाय का दूध है, वह भी तो वरुण है। जो गाय जितना अधिक दूध देती है। उसमें उतना ही पानी अधिक है। क्रतु अर्थात् संकल्प या फिर इरादा भी तो वाज के कारण है। वाज (ब्रह्मचर्य) का प्रताप न होता तो हनुमान समुद्र संतरण कर पाते। पैदल श्रीराम ,लंका विजय कर पाते। यह जो नई,नई उमंगें हैं, यही वाज हैं। निराश, हताश और बुझ चुके लोग वीर्य हीन हैं। चित्तोत्साह के अधिष्ठाता वरुण हैं। मेरी "ब्रह्मांड के रहस्य "नामक आने वाली पुस्तक में मैं बताऊंगा कि सूर्य में जो चमक, ताप और आग है, वह आती कहां से हैं। सूर्य की चमक भी तो वरुण के ही कारण है।

हम रावण के आक्रमण के संबंध में आज सिर्फ इतना ही बता देना चाहेंगे कि जहां वरुण का निवास था (ईरान), वह आर्यायण कहलाता था। सामी देशों (अरब) सहित उत्तर ध्रुव तक का क्षेत्र "उत्तर कुरू"के नाम से प्रसिद्ध था। मूलतः तो हमारा यह श्लोक -"जम्बूद्वीपे भरतखंडे....!"ही स्पष्ट कर देता है ऐशिया महाद्वीप की सीमा क्या थी। तब ऐशिया माइनर के अंतर्गत अफ्रीका, यूरोप और सिर्फ अमेरिका ही बचता था।जिनको असुर क्षेत्र कहा जाता था।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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