वरुण संगीत सुन रहे थे और….! रावण की त्रैलोक्य विजय -50 

वरुण संगीत सुन रहे थे और….!
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रावण की त्रैलोक्य विजय -50 
"रोम जल रहा था, और नीरो बंशी बजा रहा था,यह कहावत जलों के देवता वरुण के कारण ही चल पडी़ होगी...? हम आज कुछ महत्वपूर्ण और समझ लेने योग्य तथ्यों की चर्चा करके कथा का प्रारंभ करेंगे। तथ्य भी आश्चर्य जनक। अजूबे। वैज्ञानिक और रोमांचित कर देने वाले।

देवताओं की व्यवस्थाओं के प्रमुख चारों -लोकपालों -इंद्र वरुण,यम और कुबेर को जीतने निकला रावण,अभी,कभी युद्धक्षेत्र से बाहर आया है।स्वयं को यम से विजयी घोषित कर उसने अपने सैन्य शिविर (पुष्पक विमान) में प्रवेश किया। कुबेर को तो पहले ही जीत चुका था। अभी वह रक्त से नहाया हुआ था।वस्त्र सने थे। अंग अंग जर्जर था। रक्त की धारायें, अभी भी फूट पड़ रहीं थीं। उसके मंत्रियों और सैनिकों ने अपने राजा का अभिनंदन किया। अभ्यर्थना की। प्रशंसा के गीत भी गाये। रावण का उत्साह अब और भी बढ़ चुका था। यमराज के सामने युद्ध करना ही मृत्यु को आमंत्रित करना होता। परन्तु जीवित बचना तो...! कहते हैं कि कभी कभी पुण्याई भी रक्षक बन जाती है।

बात सही भी थी। किशोरावस्था में गोवा (गोकर्ण) में उसके द्वारा की गई तपस्या के कारण ही ब्रह्मा ने उसको बचा लिया। यों समझो कि,मृत्यु के मुंह से जबरन ही निकाल लिया।वरना यम का कालदंड चल जाता तो....! तो क्या....? हां,मेरी (रावण) तो राख भी नहीं मिल पाती।और...! अब - यहां से रावण अगले अभियान पर निकल रहा था। वह नागों और दैत्यों से सेवित -भोगवती पुरी और मणिमयीपुरी (जो शायद पश्चिम समुद्र की ओर थीं) में पहुंचना चाहता था। अतः रावण को वरुण के आधिपत्य वाले जलनिधि समुद्र में घुसना पडा़। रावण ने बहुत आराम से नागों पर तो नियंत्रण कर लिया। परन्तु मणीमयीपुरी के दैत्यों से पार न पा सका।

यह दैत्य भी महान योद्धा थे।हिरण्यकश्यपु के एक पुत्र संह्लाद के वंशज। जो निवातकवच नाम से जाने जाते थे।वे अनेक वरदानों से सुरक्षित भी थे। यहां यह भी जान लें कि बहुत बाद में अपने देवलोक अभियान के समय अर्जुन ने इन निवातकवचों पर विजय हासिल कर ली थी। रावण और निवात कवचों में एक वर्ष तक चले इस युद्ध का भी अंततः वही हश्र हुआ जो यमलोक में यम के साथ हुआ था। अचानक एक भव्य विमान रुका। वही चिर परिचित एक दिव्य मूर्ति निकली। अर्थात यहां भी ब्रह्मा जी टपक पडे़।बोले दैत्यो यह रावण तुम सब से अवध्य है। इसको वरदान है।तुम इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। अरे...!तुम सब तो इसका बाल भी बीका नहीं कर सकते... और फिर दैत्यों का मन रखने के उद्देश्य से परमपिता ने उनके सिर पर भी हाथ फेरा..! तुम भी बहुत शक्तिशाली हो। अनेक वरदानों से संरक्षित हो। आशीषों से संबर्धित।

दोनों को पोट पुचकार कर परमपिता ने युद्ध विराम के लिए राजी कर लिया। अप्रत्क्षतः रावण का पक्ष ही मजबूत किया।रावण ने अग्नि प्रज्जवलित कर निवातकवचों के साथ मित्रता की शपथ ली। एक दूसरे के प्राणों के प्यासे दो प्रबल शत्रुओं में गलबहियां हुईं ।वह भी ऐसी कि निवातकवचों ने रावण का एक वर्ष तक आतिथ्य किया। इस एक वर्ष में रावण ने सभी सुखों का उपभोग किया।उसने निवातकवचों से कोई सौ से अधिक मायाओं का ज्ञान प्राप्त किया। अब रावण के मन में वरुण का चित्र घूम रहा था। वह वरुण की तलाश कर पाता, तब तक उसको अश्मक द्वीप मिल गया। घुमा फिरा कर अश्मक द्वीप के युद्ध की वही कहानी और परिणाम है, जिसको हम सूर्पर्णखा और उसके पति विद्युज्जिह्व के संदर्भ में पहले बता ही चुके हैं। रावण ने कालिकेयों के इस सरदार विद्युज्जिह्व का युद्ध में नृशंस वध कर दिया। और फिर सूर्पणखा को दंडकारण्य क्षेत्र में खर, दूषण का सरपरस्त मनोनीत कर सूर्पणखा के कष्ट की क्षतिपूर्ति करने का प्रयास भी किया।

अब हम वरुण की कथा पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं। वरुण के चरित्र की अनेक अर्थों में विवेचना की जा सकती है। वरुण का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। वह जलों के देवता थे। विष्णु के सबसे बड़े भाई। इंद्र , विष्णु और वरूण के सगे भाई होने न होने पर दो राय हैं। एक राय यह कि यह सब अदिति के ही पुत्र थे। दूसरी राय और प्रमाण यह भी हैं कि पहला इंद्र एक कौशिक उपनामधारी किसान की अवैध संतान था। जिसकी माता आदित्य जाति की होने से अदिति कहलाती थी। ऋग्वेद में इस घटना प्रमाण भी मिलता है।यह एक रोचक कथा है।

अब हम कल सिर्फ वरुण के संबंध में ही चर्चा करेंगे। रोचक, उत्तेजक, और आकर्षक ।वरुण के आदिभौतिक और आदिदैविक, दोनों पक्षों की। कैसे...? वरुण ही ऊर्जा है। उत्साह है। उमंग है। बाज (वीर्य) है। दुग्ध है । वृक्षों में हरियाली है। और प्राणों में निःश्वाश(विसर्जन)है।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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