डर के आगे जीत है (dar ke aage jeet hai)

डर के आगे जीत है(dar ke aage jeet hai)

डर के आगे जीत है - Dar Ke Aage Jeet Hai Motivational ...

डर के आगे जीत है यह उक्ति पहले मुझे समझ नहीं आती थी, पर बढ़ते उम्र ने धीरे धीरे-धीरे इस बात का अर्थ और एहसास दोनों समझाना शुरू कर दिया है। आज मैं खुद को बदला सा कमजोर सा पा कर हैरान हूं क्योंकि ये मैं वो मैं नहीं हूं जिसे मैं जानता हूं।

जवानी में लोग अक्सर निडर होते हैं तभी तो बेखौफ फैसले लेते हैं और कई असाधारण कार्य कर जाते हैं। हर तरह के स्पोर्ट्स, तरह-तरह के एडभेन्चर , कठिन परिक्षाओं को पास करना आदि सब कर जाते हैं। उस उम्र में इंसान को स्वयं को साबित करना होता है वह अन्य बेतुकी बातों पर ध्यान भी नहीं देता। जीने मरने तक का भय नहीं होता, कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश होती है बस।

परन्तु जैसे- जैसे आप अपनी दुनिया का विस्तार करते हैं , शादी और बाल बच्चों के साथ अपना परिवार बढ़ाते हैं , अपने और अपनों की कुशलता का परवाह करने लगते हैं। किसी को खोने की कल्पना से भी आप थर्रा उठते हैं। किसी अपने को एक खरोंच भी न आए,जीवन में कोई तकलीफ़ ही न हो, ऐसी सुरक्षा का आप इंतजाम करने लगते हैं।

जबकि आपको पता है कि सब अपने अपने-अपने भाग्य लिखा कर लाए हैं। पर बढ़ते उम्र के बच्चों की नादानी, आपको हमेशा सशंकित कर दिया करती है। अपने जीवनसाथी के साथ जीने मरने की कसम सब खाते हैं। अतः उनके सुरक्षित साथ की कामना, भय बनकर आपको धीरे-धीरे दैविक शक्तियों की आराधना प्रार्थना के लिए आसक्त करने लगती है। आप भय को कम करने के लिए रोज भक्ति भाव, स्मरण व्रत पूजन आदि की ओर प्रेरित होने लगते हैं।

आस्था के नाम पर,मन के विचलन को स्थिर करने की कोशिश करने लगते हैं। पर होता उल्टा है मन और भयभीत रहने लगता है। जब तक अपना प्यारा आ न जाए, जब तक अपनों को सफलता न मिल जाए, मन विचलित ही रहता है। सिर्फ शुभ- शुभ और अच्छा -अच्छा ही मन सुनना चाहता है।

धीरे-धीरे मन आतंकित रहने लगता है।भय याददाश्त को खाने लगता है,आप जो अपने लिए कभी निडर थे आज अपनों के लिए डरे हुए से हो जाते हैं।

पौजिटिव सोचोगे तो पौजिटिव वाइव्स निकलेंगे , और तभी तो सब कार्य पौजिटिव होगा। ऐसा हमेशा से सब लोग सुनते जानते हैं , पर फिर भी व्यक्ति का डरा हुआ मन, सिर्फ अनहोनी का भय करता है और उसकी आशंकाओं से भी डर जाता है। सुरक्षा के नाम पर अपनों पर कड़ाई करने लगता है,अपना भय उसपर थोपने लगता है।

सबकुछ मन की सोच ही तो है। इसी डर के आगे जीत छुपी हुई है। जो हमें देख कर भी नहीं दिखती। अकेले कहीं जाने में डर, नया कुछ करने में डर, ऐडभेन्चर तो सोच भी नहीं सकते।

कहां गया वो बिंदास बेखौफ इंसान, क्यूं वह आज सरल ,सहज नहीं रह गया है। किसी अंजान भय को क्यूं पालने लगा है। कहीं ये बढ़ती उम्र का तो असर नहीं।

मन के हारे हार है मन के जीते जीत। तू भी तो अपने मन को जीत, क्योंकि डर के आगे जीत है
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