विष्णु पुराण संक्षेप -दिनेश मालवीय

विष्णु पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

आकार में यह सभी पुराणों से छोटा भले ही हो, लेकिन इसका महत्त्व बहुत अधिक है. इसकी भाषा, साहित्यिक गुण, काव्यात्मक श्रेष्ठता आदि के कारण इसका महत्त्व और बढ़ गया है. इस पर तो दूरदर्शन ने बहुत सुंदर धारावाहिक भी बनाया है.

विष्णु पुराण में भू-मंडल के स्वरूप, ज्योतिष, राजवंशों के इतिहास, कृष्ण चरित्र आदि विषयों को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है. वर्तमान में इस पुराण के लगभग 7 हज़ार श्लोक उपलब्ध हैं. यह पुराण छह भागों में विभाजित है.

पहले भाग मे सृष्टि की उत्पत्ति, कला का स्वरूप, ध्रुव, पृथु और प्रहलाद की कथाएँ दी गयीं हैं. दूसरे भाग में लोकों के स्वरूप, पृथ्वी के नौ खण्डों, ग्रह-नक्षत्रों, ज्योतिष आदि का विवरण है. तीसरे भाग में मन्वंतर, वेदों की शाखाओं का वर्णन, गृहस्थ धर्म और श्राद्ध विधि आदि का उल्लेख मिलता है. चौथे भाग में सूर्य वंश और चन्द्र वंश के राजाओं और उनकी वंशावलियों का वर्णन है.पांचवें भाग में श्रीकृष्ण चरित्र और उनकी लीलाओं का वर्णन है. छठवें भाग में प्रलय तथा मोक्ष का उल्लेख है.

विष्णु पुराण में सभी विषयों का अनुपात में वर्णन मिलता है. बीच-बीच में अध्यात्म का विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर प्रकाश डाला गया है.

इस पुराण के रचनाकार पराशर ऋषि हैं, जो महर्षि वशिष्ठ के पौत्र थे. इस पुराण में पृथु, ध्रुव और प्रह्लाद के प्रसंग बहुत रोचक और लोकप्रिय हैं. पृथु के वर्णन में धरती को समतल करके कृषि करने की प्रेरणा दी गयी है. साथ ही, घर-परिवार, गाँव, नगर, दुर्ग आदि की स्थापना कर परिवारों को सुरक्षित बनाने की बात बतायी गयी है.पृथु के कारण ही धरती को पृथ्वी नाम दिया गया है. ध्रुव के आख्यान में सांसारिक सुख और धन-सम्पत्ति आदि की नश्वरता का प्रतिपादन है. व्यक्ति को इससे ऊपर उठकर ईश्वर की भक्ति और आत्मोन्नति के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी गयी है.  प्रह्लाद के प्रकरण में परोपकार और संकट के समय भी आदर्शों और उसूलों पर अडिग रहने की शिक्षा दी गयी है.

विष्णु पुराण में मुख्य रूप से श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन है. इसमें श्रीराम कथा का भी संक्षिप्त विवरण दिया गया है. इसमें श्रीकृष्ण के समाजसेवी, प्रजाप्रेमी, लोकरंजक और लोक हित में कार्य करने वाले स्वरूपों का प्रमुख रूप से वर्णन है. उन्हें महामानव निरूपित किया गया है. इसमें प्रजा की संगठित शक्ति का महत्त्व बताते हुए अन्याय से लड़ने की प्रेरणा दी गयी है. महाभारत में कौरवों का विनाश और कालिया दह के मानमर्दन में उनकी इसी छवि को दिखाया गया है.

इस पुराण में भक्ति और वेदांत के उच्च सिद्धांतों का प्रतिपादन है. बताया गया है कि आत्मा जन्म-मृत्यु से रहित,निर्गुण और निराकार है. सभी प्राणियों में उनका निवास है. जिसका चित्त समभाव वाला और पवित्र हो, वही ईश्वर का भक्त हो सकता है. किसी को कष्ट नहीं देना चाहिए और किसी भी बात का अभिमान नहीं करना चाहिए.

विष्णु पुराण में प्राचीन काल के राजवंशों का वृत्तान्त है. राजाओं को सदाचार के साथ प्रजा के मन को जीतने का उपदेश दिया गया है. वही राजा सबसे अच्छा होता है, जो सबके प्रति मैत्री भाव रखता है और उनके सुख-दुःख में सहभागी होता है. जो राजा अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रजा के हितों की उपेक्षा करता है और भोगविलास में डूबा रहता है, उसका समय से पहले ही विनाश हो जाता है.

इस पुराण में स्त्रियों, साधुओं और शूद्रों को श्रेष्ठ माना गया है. जो स्त्री अपने तन-मन से पति की सेवा करती है, उसे किसी अन्य कर्मकाण्ड की ज़रूरत नहीं रह जाती.इसी प्रकार शूद्र भी अपने कर्तव्यों का पालन करता है,उसे वही फल प्राप्त होता है जो ब्राह्मणों को कर्मकाण्ड और जप-तप से मिलता है.

विष्णु पुराण के अंतिम तीन अध्यायों में आध्यात्मिक चर्चा में त्रिविध ताप, परमार्थ और ब्रह्मयोग का ज्ञान कराया गया है. मानव जीवन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जिसके लिए देवता भी तरसते हैं. जो व्यक्ति निष्काम भाव से कर्तव्यों का पालन करता है, उसे इसी जीवन में मुक्ति मिल जाती है. इसमें निष्काम कर्म और ज्ञान मार्ग का उपदेश भी दिया गया है.

भारत को कर्मभूमि कहकर उसकी महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है. इस पुराण के अनुसार देवगण भी इस भूमि का निरंतर गान करते हैं. इसके अनुसार, समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो पवित्र भू-भाग है, उसका नाम भारतवर्ष है.हिमालय के वे इस भूमि पर जन्म लेने वालों को ख़ुद से बेहतर मानते हैं. जो लोग जीवन को ईश्वर की सेवा में लगाते है और जिनका ह्रदय निर्मल है, वे धन्य हैं. इसमें सदाचार पर बहुत बल दिया गया है.


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