क्या रावण की लंका सोने की थी ? क्या सच में रावण के 10 सिर थे क्या सहस्त्रबाहु की हजार भुजाएं थीं ?

हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित कुछ बातों के बारे में लोगों की बड़ी जिज्ञासा है. अनेक लोग यह जिज्ञासा करते हैं कि रावण की लंका क्या सचमुच सोने की थी? यह यह सोने की थी तो जली कैसे? क्योंकि सोना तो जलता ही नहीं है ? और यदि जली तो जलने के बाद उसका क्या हुआ.
आइए इस प्रश्न को समझने का प्रयास करते हैं.

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तार्किक रूप से देखा जाए तो इसका शाब्दिक अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए. रामायण एक काव्य है और काव्य में उपमा, अलंकर तथा अतिरंजना स्वाभाविक गुण होता है. यदि हम किसी बहुत धनवान आदमी के बारे में बात करते हैं तो उसकी धनाड्यटा को अधिक बताने के लिए सहज ही कह देते हैं कि “अरे भैया, उनके यहाँ तो हीरे-मोती के अम्बार लगे हैं”. यह बात को कहने का एक ढंग है.

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इसी तरह जब रावण की लंका की बात आती है तो, वहाँ इतनी समृद्धि थी जिसका वर्णन यह कहकर किया गया कि वह सोने की लंका थी. जैसे मालवा अंचल की पुरानी समृद्धि को बताने के लिए कहा जाता है कि “पग-पग रोटी डग-डग नीर, मालव भूमि गहन गंभीर”. इसका शब्दिक अर्थ नहीं लिया जा सकता.
शब्द के तीन रूप होते हैं-अभिधा, लक्षणा और व्यंजना. यह बात व्यंजना में कही गयी है. सभी मुहावरे और कहावतें लक्षणा और व्यंजना में कही जाते हैं.
रावण के दस  और बीस भुजा वाली बात में भी ऐसा ही है. वह इतना बुद्धिमान था कि उसमें दस व्यक्तियों के बराबर बुद्धि थी. शक्तिशाली इतना था कि उसमें बीस हाथों के बराबर बल था. ये प्रतीक हैं, अन्यथा वह आदमी तो आप-हम सरीखा ही रहा होगा.

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सहस्त्रबाहु के विषय में कहा जाता है कि उसके हजार हाथ थे. यह बिलकुल अतार्किक बात है. दरअसल उसकी जल सेना में एक हजार सशस्त्र नावें थीं, जिसके कारण उसकी जलसेना इतनी अधिक शक्तिशाली थी कि लोग कहते थे कि “भैया, उसके तो एक हज़ार हाथ हैं”. यानी नावों को उन्होंने हाथों की संज्ञा दे दी.

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कविता में हर बात को बढ़ा-चढ़ा कर और उपमाएं देकर बताया जाता है. राक्षस के बारे में बताना हो तो उसे काले रंग का, कुरूप और सींग वाले सिर का ही बताया जाएगा. भीम की शक्ति बताना हो तो यह कहना बहुत स्वाभाविक है कि उसमें हज़ार हाथियों का बल था.


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