उषापान करने के फ़ायदे: उषापान से अनेक रोगों से मुक्ति और बचाव, पानी अनेक रोगों की एक दवा-जल चिकित्सा पद्धति

उषापान करने के फ़ायदे: उषापान से अनेक रोगों से मुक्ति और बचाव, पानी अनेक रोगों की एक दवा-जल चिकित्सा पद्धति

 

रोगों के बचाव

1. उषापान से अनेक रोगों से मुक्ति और बचाव

सांयकाल तांबे के एक बर्तन में पानी भरकर रख लें। प्रातः सूर्योदय से पूर्व उषापान के रूप में उस बासी पानी को आठ अंजलि (250 ग्राम) की मात्रा में नित्य बासी मुंह धीरे-धीरे पीएं और फिर सौ कदम टहलकर शौच जाएं। इससे कब्ज दूर होकर शौच खुलकर आने लगेगा। इस प्रकार उषापान करने वाला व्यक्ति मलशुद्धि के साथ बवासीर, उदर रोग, यकृत-प्लीहा के रोग, मूत्र और वीर्य सम्बन्धी रोग, कुष्ट, सिर दर्द, नेत्र विकार तथा वात पित्त और कफ से होने वाले अनेकानेक रोगों से मुक्त रहता है। बुढ़ापा उसके पास नहीं फटकता और वह शतायु होता है।



विशेष - ( 1 ) यदि वह जल मुख की बजाय नासिका से पिया जाए तो सिरदर्द, जुकाम चाहे नया हो या पुराना, नजला, नक्सीर आदि रोग जड़मूल से दूर हो जाते हैं। नेत्र ज्योति गरुड़ के समान तीव्र हो जाती है। केश असमय सफेद नहीं होते तथा सम्पूर्ण रोगों से मुक्त रहता है। (2) शीत ऋतु में जल अत्यन्त शीतल हो तो उसे थोड़ा गुनगुना करके पीया जा सकता है। (3) सूर्योदय से पूर्व पिया गया पानी मां के दूध के समान गुणकारी माना गया है।

पानी अनेक रोगों की एक दवा-जल चिकित्सा पद्धति

जापान के 'सिकनेस एसोसिएशन' द्वारा प्रकाशित एक लेख में इस बात की पुष्टि की गई है कि यदि सही ढंग से पानी का प्रयोग किया जाए तो कई पुरानी तथा नई बीमारियां दूर हो सकती हैं। जैसे- सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, मोटापा, मधुमेह, खून की कमी, जोड़ों के दर्द (आर्थराइटिस), आमवात, (रियुमेटिज्म), लकवा, दिल की बीमारियां, खांसी, ब्रोंकाइटिस, ब्रोकियल दमा, टी० बी० आदि फेफड़ों की बीमारियां, यकृत रोग, अति अम्लता, ग्रेस्ट्राइटिस, पेचिश, कब्ज आदि पाचन संस्थान की बीमारियां, मूत्र संबंधी बीमारियां, अनियमित मासिक, गर्भाशय और स्तन कैंसर, नाक, गले और कान से सम्बन्धित बीमारियां, नेत्र रोग आदि।



यदि स्वस्थ व्यक्ति यह प्रयोग करें तो अपने स्वास्थ्य को कायम रख सकता है। पानी पीने की विधि-प्रातः उठते ही, बिना मंजन या ब्रश किए, लगभग सवा लीटर (चार गिलास) पानी एक साथ पिएं, एक बाद एक गिलास। इसके बाद एक घंटे तक कुछ भी खाए-पिएं नहीं। पानी पीने के बाद मुंह धो सकते हैं व ब्रश कर सकते हैं।

रोगी और बहुत ही नाजुक प्रकृति के व्यक्ति एक साथ चार गिलास पानी नहीं पी सकें, उन्हें चाहिये कि वे पहले एक या दो गिलास से शुरू करें और बाद में धीरे-धीरे एक-एक गिलास बढ़ाकर चार गिलास पर आ जाएं। प्रथम एक या दो गिलास पानी से उनके स्वास्थ्य पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। हां, प्रारंभ के तीन-चार दिन तक पानी पीने के बाद एक घंटे में तीन-चार बार मूत्र हो सकता है और कुछ व्यक्तियों को पतले दस्त भी आ सकते हैं। लेकिन तीन चार दिनों बाद मूत्र नियमित होकर धीरे-धीरे सभी कुछ सामान्य हो जाएगा।

जो लोग जोड़ों के दर्द एवं वात रोग से पीड़ित हैं, उन्हें यह प्रयोग पहले सप्ताह तक दिन में तीन बार करना चाहिये और फिर एक सप्ताह के बाद दिन में एक बार करना पर्याप्त है। भोजन करने के दो घंटे बाद जल चिकित्सा पद्धति से पानी पिया जा सकता है।

उपरोक्त पानी का प्रयोग रोगी और स्वस्थ दोनों ही लाभ के साथ कर सकते हैं परन्तु इस प्रयोग को करने वालों के लिए कुछ हिदायतों का पालन जरूरी है- (1) ठंडे पेय, मैदे और बेसन की बनी चीजें, तले हुए खाद्य पदार्थ, तेज मिर्च-मसालों और मिठाइयों से परहेज किया जाए और यथासंभव फल और हरी सब्जियों पर जोर दिया जाए। (2) चाय, काफी, चाकलेट, आइसक्रीम आदि की मनाही की गई है। (3) यह वात खासतौर से कही गई है कि इलाज के दौरान सिगरेट, बीड़ी, शराब आदि नशीली चीजों से दूर रहें। (4) चार गिलास पानी सुबह ही पीना है। उसके बाद दिन में जब भी प्यास लगे तभी पानी पियें। (5) रात्रि सोने से पहले कुछ भी नहीं खाना चाहिये, खासकर सेव तो बिल्कुल नहीं। (6) पानी यदि अशुद्ध हो तो उसे रात में उबाल छानकर रख लेना चाहिये और प्रातः निथरा हुआ पानी इस्तेमाल करना चाहिये।

अनुभव और परीक्षणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस प्रयोग से विभिन्न बीमारियां गिनती के दिनों में ही दूर हो सकती हैं। जैसे उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और मधुमेह (डायबीटिज) -एक मास में, पाचन क्रिया और पेट के रोग जैसे गैस, कब्ज आदि दस दिन में कैंसर के रोगियों को छः मास और फेफड़ों की टी० बी० में तीन मास में लाभ हो सकता है। रोग मुक्ति के बाद भी इस प्रयोग को जारी रखा जा सकता है।

'इंडियन हेल्थ एसोसिएशन' के अनुसार यह विज्ञान पर आधारित पद्धति है। इतना पानी एक साथ पीने से आंत स्वच्छ व क्रियाशील बनती है और नया ताजा खून बनाने में सहायता करती है। 24 घंटे का जहर शरीर से निकल जाता है। पेट साफ रहता है। कब्ज से छुटकारा मिल जाता है। पेट साफ होने से कई बीमारियां पैदा ही नहीं होतीं।

(आयुर्वेदिक चिकित्सा)


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