वृत्तियों का सच्चा अर्थ क्या है? हम जिसे जगत कहते हैं वह तो इन वृत्तियों की समष्टि मात्र है।

“संवेदना की नित्य संभाव्यता का नाम जड़ पदार्थ है।”

Meditation-Newspuran

बाहर जो है वह है केवल इस प्रतिक्रिया को उत्पन्न करने वाला संकेत मात्र।

उदाहरणार्थ—मोती की सीप को लो। तुम लोग जानते हो मोती किस तरह पैदा होता है।

कोई पराश्रयी कीटाणु सीप में घुस जाता है और उसमें क्षोभ उत्पन्न करने लगता है। इससे वह सीप उस किटाणु के चारों ओर एनामेल के समान एक प्रकार का लेप-सा डालने लगती है। बस उसी से मोती तैयार होता है।

यह सारा अनुभवात्मक जगत मानो हमारे अपने उस लेप के समान है और यथार्थ जगत मानो केंद्र के रूप में कीटाणु है।

सामान्य मनुष्य उसे कभी समझ ना सकेगा क्योंकि जब कभी वह उसे समझने की कोशिश करता है वैसे ही वह बाहर मानो अपना लेप डालने लगता है और बस अपने उस लेप को ही देखता है।

अब हम समझे कि वृत्ति का सच्चा अर्थ क्या है—मनुष्य का जो असल स्वरूप है वह मन के अतीत हैं। मन तो उसके हाथों का एक यंत्रस्वरूप है। उसी का चैतन्य इस मन के माध्यम से अनुस्त्रवित हो रहा है।

जब तुम इस मन के पीछे दृष्टा रूप से स्थित हो जाते हो तभी वह चैतन्यमय होता है।

जब मनुष्य इस मन को बिल्कुल त्याग देता है,तो उस मन का संपूर्ण नाश हो जाता है। उसका अस्तित्व ही नहीं रह जाता।

अब समझ में आया कि चित्त का क्या तात्पर्य है।

वह मन का उपादान स्वरूप है और वृत्तीयां उस पर उठने वाली लहरें और तरंगे हैं।

जैसे ही बाहर के कुछ कारण उस पर कार्य करने लगते हैं वैसे ही वह तरंग रूप धारण कर लेता है। *हम जिसे जगत कहते हैं वह तो इन वृत्तियों की समष्टि मात्र है।

स्वामी विवेकानंद


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