कुण्डलिनी जागरण के लक्षण क्या हैं? What are the symptoms of Kundalini awakening?

……अतुल विनोद
कुंडलिनी शक्ति जब जागृत या क्रियाशील होती है, तो साधक को किसी के पास यह पूछने जाने की जरूरत नहीं होती कि उसकी कुंडलिनी जागृत है या नहीं है| हालांकि अधिकांश लोग भ्रम पूर्ण लक्षणों को कुंडलिनी जागरण मान लेते हैं| जब कुंडलिनी जागृत होती है वह स्वयं आपको यौगिक क्रियाएं कराने लगती है| कुंडलिनी जागरण में सबसे पहले व्यक्ति की आत्म शक्ति जागृत होती है| यही आत्मशक्ति व्यक्ति को योग कराती है|आमतौर पर जिस तरह से चक्र और चक्रों के जागरण का वर्णन किया गया है, जो वीडियोस और आर्टिकल्स नेट पर उपलब्ध है उनका वास्तविक अनुभवों से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं है| वह लोगों की बुद्धि का काल्पनिक विलास है|
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First stage

कुंडलिनी शक्ति जागृत होने पर मूल आधार क्षेत्र में वाइब्रेशन होने लगता है| अपने आप प्राणायाम होने लगते हैं, शरीर स्वतः ही योग करने लगता है|

जैसे ही साधक शांत होकर बैठता है वैसे ही योगिक क्रियाएं शुरू हो जाती हैं| शरीर कांपने लगता है, अनायास ही रोमांच पैदा हो जाता है, कभी हास्य कभी रुदन, वासना में वृद्धि, बिना किसी बाहरी ज्ञान के बंध और मुद्राएं लगने लगती है| स्वतः ही केवल कुंभक लगने लगता है|

जब आप स्वास लेते हैं तो आपको लगता है कि आपकी श्वास मूल-आधार क्षेत्र तक जा रही है, रीढ़ की हड्डी में कंपन महसूस होने लगता है, कई बार सब कुछ शून्य नजर आता है|

ध्यान में अलग-अलग तरह की आवाज निकलने लगती है, शरीर चक्की की तरह घूमने लगता है, सर अपने आप झुककर जमीन से टिकने लगता है|

शरीर मेंढक की तरह उछलने लगता है|

नाड़ियों में खिंचाव होने लगता है,व्यक्ति जमीन पर लोटपोट हो जाता है|

ध्यान में सांप की तरह हिलता है| ऐसा लगता है जैसे शरीर में कोई प्रवेश कर गया है, जैसे ही आंख बंद करके बैठो शरीर अपने आप अलग-अलग तरह के भाव, अलग-अलग तरह की योग क्रियाओं से चलायमान होने लगता है|

दिन में कभी भी शांत और एकाग्र चित्त होते ही शरीर में कंपन होने लगता है|

कई बार खुशी का ठिकाना नहीं रहता तो कई बार रोना आता है|

अचानक आवेश आता है, व्यक्ति न कर सकने वाला काम भी कर देता है| रूप, रस, शब्द, स्पर्श, गंध अनुभव में आते हैं| और भी ऐसे कई अनुभव है जो बताते हैं कि कुंडलिनी शक्ति जागृत हो चुकी है|

खास बात ये है कि आपके चाहने मात्र से क्रियाएं रुक जाती हैं सामान्य जीवन मे कभी बाधा खड़ी नही करती।

चक्र जागरण, चक्रों का सक्रियकरण, थर्ड-आई यह सब कुंडलिनी साधना में बहुत महत्व नहीं रखते|

जिन्हें कुंडलिनी जागरण का वास्तविक अनुभव है, उनके लिए चक्रों की चर्चा का उतना महत्व नहीं है|

जो अनुभव मैंने बताया वो कुंडलिनी जागरण के आरंभिक अनुभव हैं|

इन्हें जागरण की फर्स्ट स्टेज कहा जाता है|

इस स्टेज में आसनों से शरीर स्थिर होता है।बंध और मुद्राओं से दृढ़ होता है| प्राणायाम से नाड़ियां शुद्ध होती हैं| हठयोग से शरीर पवित्र होता है|

Second stage

सेकंड स्टेज में शरीर शुद्ध और सतोगुण से युक्त होता है, विषय वासना दूर हो जाती है| पवित्रता और प्रसन्नता बढ़ती है| द्रष्टा का भाव बढ़ता है| शरीर के साथ यहां पर मन भी शुद्ध होने लगता है|

Third stage

तीसरी स्टेज में व्यक्ति की आत्म-शक्ति मजबूत होती है| साधक में प्राण को खींचकर किसी एक स्थान में एकत्रित करने की क्षमता आ जाती है|

यहां साधक की प्राण ऊर्जा सुषुम्ना पथ से अलग-अलग शक्ति केंद्रों में जिन्हें चक्र कहते हैं, पहुंचकर उन केंद्रों को मजबूत और विकसित करती है| बुद्धि का विकास होता है| आत्मतेज प्राप्त होता है|

आत्मज्ञान होता है|

ह्रदय ग्रंथि खुल जाती है| संशय खत्म हो जाते हैं| कर्म के इम्प्रेशंस मिटने लगते हैं| पाप खत्म होने लगते हैं|

बाहर से व्यक्ति कैसा ही दिखता हो, कैसा ही उसका आचार व्यवहार दिखाई देता हो, लेकिन अंदर सब कुछ दुरुस्त होने लगता है|

4rth stage

चौथी और आखिरी स्थिति में जिसे सहस्त्रार जागरण कहते हैं, वो दरअसल शिवत्व प्राप्त करना है यानि शिव-भाव, आत्म-भाव जीवन-मुक्त दशा, इसे कुंडलिनी शक्ति का परशिव में योग कहा जाता है|

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