भ्रम से मुक्त होने पर होता है ब्रम्हज्ञान: जब वेद पढ़ने से भी नही मिला ऋषि को तत्वज्ञान

जिस दिन आदमी भ्रमों से मुक्त हो जाता है उस दिन उसका भटकना भी बंद हो जाता है और जिस दिन आदमी का भटकना बंद हुआ नहीं कि भीतर लौ जली नहीं। लौ जलने भर कि देरी है कि उस प्रकाश में अंधकार तिरोहित होने लगता है और ‘वह’ उभरकर प्रकट होने लगता है जो है। इसके लिए जरूरी है कि आदमी इस बात को जाने व समझे कि जहां वह है वह भ्रम में है।

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जब तक वह भ्रम को ही अपना ब्रह्म समझता रहेगा यानी अपना आनंद का स्रोत समझता रहेगा तब तक क्रांति नहीं घटेगी। इसलिए जरूरी है कि दोनों के अर्थ एवं भेद को गहराई से समझा जाए।

भ्रम यानी ऐसा सत्य जो हमें सत्य जैसा लगता है पर सत्य होता नहीं है और ब्रह्म यानी सत्य, एकमात्र सत्य, जिसे मानने न मानने का कोई सवाल नहीं क्योंकि वह है और एक वह ही है।

भ्रम यानी क्षणभंगुरता और ब्रह्म यानी शाश्वतता। भ्रम यानी दृष्टिकोण और ब्रह्म यानी वह देखने वाला। भ्रम यानी सीमित, संकुचित और ब्रह्म यानी असीमित, अनंत। भ्रम यानी जिसे हमने इजाद किया है और ब्रह्म यानी जिसने हमें रचा है, जहां से सब कुछ जन्मा है। भ्रम यानी जो तब तक है जब तक हम है और ब्रह्म यानी जो हमसे पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा।

भ्रम यानी बाहर की यात्रा और ब्रह्म यानी भीतर ही अंतर यात्रा। भ्रम यानी बेहोशी और ब्रह्म यानी होश, बोध। भ्रम यानी मन और ब्रह्म यानी आत्मा। भ्रम यानी श्रृंखला और ब्रह्म यानी शून्यता। भ्रम यानी बंधन और ब्रह्म यानी मुक्ति। भ्रम यानी भटकाव, दुख, संतान और ब्रह्म यानी विराम, शांति और महाआनंद।

भ्रम यानी संसार और ब्रह्म यानी परम आत्मा। भ्रम यानी उलझन और ब्रह्म यानी निवारण। भ्रम यानी इति और ब्रह्म यानी नेति। ब्रह्म अर्थात् जो फैलता चला जाए, विस्तीर्ण होता हुआ, अनंत, जिसकीसी मा न हो।

इसलिए हमने परम सत्य को ‘ब्रह्म’ नाम दिया है और इसके स्वभाव को आनंद कहा है। आनंद विस्तीर्ण होती हुई घटना है, आनंद वही ब्रह्म है। जो बंटने से घटता नहीं बल्कि और बढ़ता है। संसार में जो कुछ, जितना कुछ भी है वह सब बंटने से घटता है उसकी मात्रा कम होती जाती है। परंतु ब्रह्म के साथ यह बात एक विरोधाभासी है। उपनिषदों में ब्रह्म को लेकर बड़ी ही प्यारी बात कही हैं।

ॐ पूर्णगदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णगुदध्थते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

वह ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत भी पूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्म से इस पूर्ण (जगत) की उत्पत्ति हुई, अतः उस पूर्ण ब्रह्म से यदि (जगत) को पृथक भी कर दें तो पूर्ण ही शेष रहता है।

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चारों वेदों से भी ब्रह्म विद्या प्राप्त न होने पर शांडिल्य ने अथर्वा के पास जाकर कहा, ‘भगवन, मेरे कल्याण के लिए मुझे ब्रह्म विद्या का उपदेश दीजिए।’ तब अथर्वा बोले, ‘ब्रह्म सत्य, अनंत और विज्ञान है। जिसमें यह जगत एवं जो इसमें पिरोया गया है और जिसको जानने पर समस्त ज्ञान हो जाता है, वह हाथ, पांव, आंख, कान, जीभ आदि रहित एक अवर्णनीय त्त्व है।

जिससे मन के साथ वाणी आदि सभी इंद्रियां उसे पाए बिना लौट जाती है। जो केवल ज्ञान से प्राप्त होता है। जिससे प्रज्ञा-जन्मी है, जो अद्वितीय है, आकाश के समान सबमें है, अत्यंत सूक्ष्म, निरंजन, निष्क्रिय, संत मात्र आनंदमय रस, शिव, प्रशांत, अमृत और परम ब्रह्म है तुम भी वही हो, उसे ज्ञान से जानो।

एक ही देव आत्मा की प्रधान शक्ति है, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, प्राणियों का अंतरात्मा, सभी प्राणियों में गूढ़ और रहने वाला तथा सबका कारण है। जो विश्व को बनाता है, पालता है तथा उसका उपभोग करता है, वही आत्मा है। उसी में समस्त लोकों को समझो। शोक मत करो।

आत्मज्ञानी शोक का अंत कर देता है।’

ब्रह्म क्या है?

इसे शब्दों से, वाणी द्वारा समझाया नहीं जा सकता। शास्त्रों में ‘शब्द ब्रह्म’ और ‘परम ब्रह्म’ दो ब्रह्म बताए है यहां तक कि दोनों को अक्षर (नाश न होने वाले) भी कहा गया है परंतु फिर भी यह कहा गया है शब्द के नष्ट होने पर जो शेष रहता है महात्मा उसी का ध्यान करें। जिस तरह दूध में घी रहता है वैसे ही प्राणियों में ब्रह्म रहता है अतः उसे मन सेम थकर प्राप्त करना चाहिए।

मंत्र पढ़ने सुनने से, शब्दों के माध्यम से उसे समझा या जाना नहीं जा सकता। ब्रह्म को जानने का माध्यम है दिव्य ज्ञान या ब्रह्मज्ञान की दीक्षा जिसे किसी सद्गुरु द्वारा ही प्राप्त की जा सकता है।

ब्रह्मज्ञान ब्रह्म को जानने में सहायक है। लेकिन ब्रह्म को उपलब्ध इंसान तभी होता है जब वह उस ज्ञान एवं मार्ग को भी छोड़ दे, जिससे वह वहां तक पहुंचा है। शास्त्रों में लिखा है ‘ज्ञान अज्ञान’ दोनों से पार हो जाओ, तभी उसे जान पाओगे।

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यह ठीक है कोई भी ज्ञान या मार्ग ब्रह्म तक पहुंचने में ऐसे ही सहायक है जैसे कांटे के लिए कांटे का  प्रयोग।

मान लो कि तुम्हारे पैर में कांटा चुभा है। तुम्हें उस कांटे को निकालने के लिए और एक कांटे की जरूरत पड़ती है। फिर उस कांटे के निकल जाने पर दोनों कांटों को फेंक दिया जाता है। इसी प्रकार अज्ञानरूपी कांटे को निकालने के लिए पहले ज्ञानरूपी कांटे को लाना पड़ता है। फिर उन्हें पाने के लिए ज्ञान अज्ञान दोनों को फेंक देना पड़ता है, शायद इसीलिए कहा गया है। ब्रह्म-ज्ञान-अज्ञान, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म सब के परे है। वह सब प्रकारके  द्वैत से अतीत है।

ब्रह्म मन-वाणी, ध्यान-धारणा, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, सत्-असत् सब के परे है। तन मन प्रकार की सापेक्षता के परे है।

 


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