भ्रमजाल क्या है?

कहा जाता है कि आदमी भ्रम के बंधनों में उलझा हुआ है| आखिर यह भ्रम का बंधन है क्या? और मनुष्य किस तरह से भ्रम के बंधनों में बंधा हुआ है?
बहुत पहले की बात है एक पहुंचे हुए संत अपने आश्रम में शिष्यों को शिक्षा-दीक्षा दिया करते थे एक बार उन्होंने अंधेरा होने पर एक शिष्य को एक किताब उनके कक्ष में जाकर तख्त पर रखकर आने को कहा| शिष्य किताब लेकर उनके कक्ष में पहुंचा तो डर गया| वह किताब लेकर वापस आ गया और उसने कहा गुरुजी अंदर एक बहुत बड़ा सांप है| संत ने शिष्य से कहा कि जाओ और अंदर जाकर हनुमान जी का नाम लेना वह सांप भाग जाएगा शिष्य अंदर जाता है हनुमान जी का बार बार नाम लेता है, लेकिन वह सांप नहीं भागता| 

वो फिर वापस आ जाता है कहता है कि गुरुजी वह सांप नहीं भागा, संत ने कहा कि जाओ अब भगवान शिव का नाम लेना| वह भाग जाएगा| शिष्य फिर अंदर जाता है और ओम नमः शिवाय का जाप करता है, लेकिन सांप फिर भी नहीं भागता| वो फिर वापस आ जाता है गुरु जी सर्प तो फिर भी नहीं भागा| अब संत कहते हैं कि एक दिया जला लो और उस सांप को दिया दिखा देना वह भाग जाएगा| वो दिया जलाकर अंदर कमरे में पहुंचता है देखता है कि वह सांप नहीं एक काली रस्सी थी| बाहर आकर वह संत को सारी बात बताता है| संत मुस्कुरा कर बोले| जैसे तुम्हे रस्सी में सांप नज़र आया वैसे ही लोग कल्पना के भय रुपी जाल में उलझ जाते हैं|  संसार में हर जगह भ्रम के काल्पनिक जाल मौजूद हैं ज्ञान के प्रकाश से इन भ्रम के जाल को हटाया जा सकता है| जैसे हम रस्सी को सांप समझ लेते हैं वैसे ही हम इस दुनिया के सुख-दुख को ही वास्तविक समझ लेते हैं|
जिस तरह दिन और रात आते हैं उसी तरह से जीवन में सुख और दुख आते हैं लेकिन मनुष्य को सुख और दुख को अपने ऊपर सवार नहीं होने देना चाहिए| अज्ञान रूपी सुख-दुख के अन्धकार को ज्ञान की रोशनी से हमेशा हमेशा के लिए मिटा देना चाहिए| हमे न तो दुःख से पीछा छुड़ाने में समय गवाना न ही सुख की चाह में भटकना, सिर्फ कर्म करते हुए ज्ञान के प्रकाश में अंदर के आत्मानंद की खोज करना है| जब हम सुख दुख से परे हो जाते हैं| उनमें उलझना छोड़ देते हैं तभी हमें जीवन का वास्तविक आत्म-आनंद दिखाई देता है|

 

अतुल विनोद

ATUL VINOD



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