खेचरी मुद्रा (khechari mudra) क्या है? कैसे होता है अमृत सुधा रस पान ?

अतुल विनोद:-

Khechri mudra

खेचरी मुद्रा कुण्डलिनी जागरण के बार होने वाली स्वाभाविक क्रियाओं से प्राप्त एक उच्च अवस्था है| ये स्वयं लगती है तब अमृतपान होता है| बलपूर्वक जीभ काटने से ये अवस्था प्राप्त नहीं होती| योग साधन करने वाले साधकों को कुंडलिनी शक्ति की क्रियाओं के जरिए यह अवस्था प्राप्त होती है| कई बार प्राणायाम के अभ्यास से "केवल कुंभक" अवस्था प्राप्त होने के बाद दिव्य रसपान का अनुभव होता है|

जब प्राण स्थिर हो जाते हैं तो आत्मशक्ति जीभ को तालू में स्थिर कर देती है| तालू में कंठ कूप है| वहां तालु मूर्धा घंटी की तरह लटकती है| जब टंग इस तालु मूर्धा को स्पर्श करती है तब साधक को सुधा रस पान का अनुभव होता है| आत्मा शक्ति जागृत साधक को स्वयं जागृत शक्ति इस अवस्था तक ले जाती है|

अध्यात्म दिव्य रसपान या अमृतपान की बहुत चर्चा है? दिव्य रसपान आध्यात्म की उच्च अवस्था है| तालु मूर्धा सीधे सहस्रार चक्र से जुड़ी हुई होती है| सहस्रार से लगातार सुधा अमृत जिसे चंदरामृत भी कहते हैं का क्षरण होता है| खेचरी मुद्रा के द्वारा इस अमृत के पांच से साधक अमृत्व की प्राप्ति करता है| इस रस का स्वाद पहले थोड़ा नमकीन, फिर छारयुक्त, फिर खट्टा, फिर तीखा और कसैला होता है| इसके बाद मक्खन, घी, दूध दही और मट्ठे जैसा होता है| और आखिर में शहद, अंगूर रस की तरह अमृत के समान होता है|

ये रसपान तभी होता है जब योग साधन करते-करते साधक का मन आज्ञा चक्र में लय हो जाता है| इस समय साधक भ्रुकुटी में आत्म दर्शन करता है| इस समय जिव्हा के मूल में अमृत स्राव होता है| इस अमृत 5 से अनेक तरह सबमिट के रोग नष्ट होते हैं| नमकीन रस से सामान्य रोग, तीखे रस से कुष्ठ रोग, अम्ल/ एसिडिक रस से चर्म रोग नष्ट होते हैं, और मधुर रस से शास्त्र का ज्ञान प्राप्त होता है|
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