माया क्या है?  माया तत्व और धर्म दर्शन

माया क्या है?  माया तत्व और धर्म दर्शन

हिंदू धर्म दर्शन में माया तत्व की चर्चा है|  ब्रह्म को सत्य बताते हुए जगत को मिथ्या और माया कहा गया है| 

माया ब्रह्म की ही एक शक्ति है जो सृष्टि का सृजन करती  है|

माया 2 रूप में मौजूद है एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म| स्थूल माया कनक और कामिनी के स्वरूप में उपस्थित है वही सूक्ष्म माया सांसारिक मनोविकारों मान, इज्जत, मोह, तृष्णा, लोभ, मद, मात्सर्य आदि-आदि को समेटती हुई चलती है। 

धन प्राप्त है, स्वतः मिलता है, स्वतः खर्च होता है। यह मान्यता कम बंधनकारी है लेकिन धन होने पर भी असंतोष! नहीं, मुझे और धन चाहिये। धन का लोभ, तृष्णा, असंतोष अन्तःकरण को विक्षिप्त चंचल बनाते हैं।

चंचल मन से न भजन-पूजन हो सकता है और न सांसारिक काम-काज पूरे ढंग से सम्पादित होते हैं। 

उदाहरण द्वारा समझिये- कोई व्यक्ति बहुत भूखा है। जैसे ही उसको रूखा-सूखा भोजन मिलता है, वह खाने में  जुट जाता है वह बिना इधर-उधर देखे, सुने भोजन करने लग जाता है। इस समय भोजन में उसको जो रस मिलता है, वह अपूर्व होता है क्योंकि इस समय उसकी चित्त-वृत्ति केवल और केवल भोजन में रहती है। 

जैसे-जैसे उसका पेट भरता है, उसको कम या ज्यादा नमक-मिर्च का पता लगने लगता है क्योंकि इस समय उसकी चित्त-वृत्ति में पहले जैसी एकाग्रता नहीं होती। इस ही प्रकार भगवद्भक्ति में जब तक एकाग्रता नहीं होती, वह यंत्रवत् होने से पूरी तरह फलप्रद सिद्ध नहीं होती। इसीलिये संतों ने इन मनोविकारों को विघ्नकर्ता होने से माया के ही रूप माने हैं 

संत परमानन्दजी कहते हैं साँचत जोड़त अथ कुँ, धायौ कदे न कोय।

पूरी किणी न भोगवी, ठगणी माया जोय ।।

एक कनक अर कामिनी, जग बस कीयो जाँह। नारद से मुनियर छल्या, सिंगी ऋषि सा ताँह। 

माया रूपी धन को कमाते-कमाते, जोड़ते-जोड़ते कोई भी कभी भी संतुष्ट नहीं होता। वह संचय करता ही रहता है, फिर भी जितनी संचय करता है, उतनी को किसी ने पूर्णतः भोगी नहीं। मरते समय दुनिया में यहीं छोड़ जाता है। वस्तुतः माया ऐसी मोहिनी, ठगने वाली ठगिनी है कि इसको देख कर हर कोई इसके प्रति आकर्षित हो इसके गिरफ्त में फँस जाता है।

कनक और कामिनी ने सारे जगत् को वश में कर रखा है। कामिनी ने नारद जैसे मुनिवर व शृंगी जैसे ऋषि को मोहित कर लिया। इसलिए धर्म ग्रंथों जहाँ अवसर मिले वहीं श्रीहरि का भजन, स्मरण करने का परामर्श दिया है।


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