साधना में आसन का क्या महत्व है?

योग क्या है?-
3 तथ्य;-
1-योग अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग , कर्मयोग ,हठयोग , लययोग , सांख्ययोग , ब्रह्मयोग , ज्ञानयोग , भक्ति योग ,ध्यान योग , क्रिया योग ,विवेक योग , विभूति योग व प्रकृति पुरुष योग ,मंत्र योग , पुरुषोत्तम योग , मोक्ष योग , राजाधिराजयोग आदि। मगर याज्ञवल्क्यजी ने जीवात्मा और परमात्मा के मेल को ही योग कहा है। वास्तव में योग एक ही प्रकार का होता है , दो या अनेक प्रकारका नहीं। शारीरिक लाभ से कहीं अधिक योग से व्यक्ति को मानसिक व आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
2-याज्ञवल्क्य जी बहुत बड़े,ब्रह्मवेत्ता,परमात्मस्वरूप व महान ऋषि थे। उन्होंने योग को संपूर्ण रूप से पारिभाषित किया था। उनके मुताबिक जिस समय मनुष्य सब चिंताओं का परित्याग कर देता है , उस समय उसके मन की , उसकी उस लय अवस्था को योग कहते हैं।अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है।
3-वासना और कामना से लिप्त चित्त को वृत्ति कहा गया है। यम नियम आदि की साधना से चित्तका मैल छुड़ा कर इस वृत्ति को रोकने का नाम योग है। योग के आठ अंग हैं। उन्हीं की साधनाकरनी होती है। साधना का अर्थ है अभ्यास। ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार यम , नियम , आसन, प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि… योग के ये आठ अंग हैं। पहले यम , नियम के साथ ही साथ आसन का भी अभ्यास करना उचित है।
आसन का महत्व;-
6 तथ्य;-
1- समस्त शरीर को सुस्थिर रखने की व्यवस्था आसन मुद्रा कहलाती है।राजयोग की अष्टांग साधना में ‘यम’ नियम के उपरान्त आसन को स्थान दिया गया है। यहाँ आसन का तात्पर्य मात्र बैठने की विधि से नहीं वरन् उस स्थान एवं वातावरण से है। जहाँ उपासना की जाय। आसन के नाम पर सिद्धासन, सर्वांगासन, पद्मासन आदि पंरो को मोड़ने-तोड़ने के विधि विशेष को शोभित नहीं किया जाना चाहिए, वरन् उस समूचे वातावरण का संकेत सन्निहित समझा जाना चाहिए। जहाँ कि उपासना की जा रहीं है या की जानी है।
2-साधना में मन न लगने, जी ऊबने , चित्त के चंचल रहने की शिकायत साधकों को प्रायः बनी ही रहती है। इसका कारण मन का अनगढ़ होना और निग्रह में संकल्प-शक्ति का प्रयोग न किया जाना भी होता है। किन्तु बहुत करके वातावरण का प्रभाव भी छाया रहता है। उसके कारण भी मन उचटता रहता है। साधना जिस श्रद्धा, अभिरुचि एवं विश्वासपूर्वक की जानी चाहिए, हो नहीं पाती । जिसमें गहरी श्रद्धा का मनोबल युक्त संकल्प का समावेश न होगा वह आत्मोत्कर्ष के लिए किया जाने वाला साधन मात्र छुट-पुट कर्मकाण्डों के सहारे सम्पन्न न हो सकेगा। आसन की वातावरण की उपयोगिता समझी जानी चाहिए और उसके लिए अच्छे स्थान की अच्छे वातावरण की -ही नहीं अच्छे मार्गदर्शन एवं समुचित संरक्षण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
3-किसके लिए कहाँ, क्या, कितना सम्भव है? यह निर्णय करना हर व्यक्ति का अपन काम है। घर में यदि बहुत घिचपिच हो तो समीप में कोई सुविधाजनक सज्जनता के वातावरण वाला शान्त स्थान तलाश किया जा सकता है। घर में एक हवादार कोठरी कोलाहल रहित कोने में मिल सकें तो उत्तम है। खुली छत का भी उपयोग हो सकता है। कुछ भी न बन पड़े तो इतनी व्यवस्था तो बनानी ही चाहिए कि जितने समय तक उपासना की जाती है उतने समय तक लोगों का आवागमन न रहें। उपासना में कई व्यक्ति एक साथ बैठ सकते हैं, पर वे सभी आत्म तल्लीन ही रहने चाहिए। एक की हलचलें दूसरों का ध्यान न उचटावें, तभी साथ बैठने की सार्थकता है।
4-पैरों को किस प्रकार मोड़कर बैठा जाय। इसका भी साधना में महत्त्व है। इस बैठक का भी शरीर पर और मन पर प्रभाव पड़ता है। और उसके सहारे साधना की सफलता में सरलता उत्पन्न होती  है। साधना के लिए बैठने में शरीर को सुविधा की स्थिति में रखे रहने वाली मुद्रा होनी चाहिए। इसके लिए सुखासन सर्व-सुलभ है। साधारण रीति से पालथी मार बैठने का नाम- उसकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए -सुखासन उपयुक्त ही रखा गया है। इसे किसी भी साधना में किसी संकोच के प्रयुक्त किया जा सकता है।
5-चौरासी लक्ष्य योनियों के कारण आविर्भूत चौरासी लक्ष आसनों का विस्तार मनुष्य न समझ सकेंगे । इसलिए शिव जी ने सर्वसाधारण की सुविधा के लिए 84 आसन मात्र योग शास्त्र में कहे हैं।सिद्धासन-पद्मासन ,सिंद्धासन तथा भद्रासन-ये चार साधकों के लिए श्रेष्ठ आसन हैं। इन चारों में भी सिद्धासन जागरण प्रयोगों में मूलबन्ध और सिद्धासन का विशेष महत्त्व बताया गया है।
6-प्राणायाम में शरीर न हिले , न डुले , न दुखे , न चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग हो , ऐसी अवस्था में बैठने को आसन कहते हैं।आसन करने का मतलब यही है कि शरीर स्वस्थ रहे। परंतु आसन का मुख्य उद्देश्य यह है कि मेरूदंड ( पीठ की रीढ़ ) सदा सीधा रहे। इसलिए सिद्ध योगी सिद्धासन तथा मुक्तपद्मासन की ही सलाह देते हैं।सिद्धासन का अभ्यास करने से योग में शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। इसके कारण वायु पथ सरल होता है।पद्मासन लगाने से निद्रा , आलस्य ,जड़ता और देह की ग्लानि निकल जाती है।
सिद्धासन का महत्व;-
7 तथ्य;-
1-सिद्धासन एक संस्कृत भाषा का शब्द है जो दो शब्दों से मिलके बना है जिसमे पहला शब्द “सिद्ध” जिसका अर्थ “परिपूर्ण या कुशल” है और दूसरा शब्द “आसन” जिसका अर्थ “मुद्रा या स्थिति” हैं। इस आसन को अंग्रेजी में Accomplished Pose/Perfect Pose /Adept’s Pose के नाम से जाना जाता हैं ।सिद्धासन आपके दिमाग, शरीर और आत्मा को लाभ प्रदान करता है।
2- हठ योग प्रदीपिका के अनुसार, सिद्धासन सभी योग पदों में सबसे प्रतिष्ठित है और आपके शरीर में 72,000 नाड़ियों और ऊर्जा के प्रवेश द्वार को शुद्ध करता हैं।84 लाख आसनों में सिद्धासन को सबसे सर्वेश्रेष्ट आसन में रखा गया है। ध्यान लगाने के लिए सिद्धासन, पद्मासन के बाद दूसरा सबसे अच्छा आसन है।
3-सिद्धासन आपको मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाता है। इसको सच्चे दिल एवम सही तरीके से करने पर यह आपको अलौकिक सिद्दियाँ प्राप्त की ओर लेकर जाता है। यमों में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है, नियमों में शौच श्रेष्ठ है वैसे आसनों में सिद्धासन श्रेष्ठ है। सिद्धासन प्राणिक ऊर्जा को शांत करके तंत्रिका तंत्र को स्थिर करता है।कुण्डलिनी जागरण प्रयोग में सिद्धासन को प्रमुखता दी जाती है। यह लगातार तो नहीं हो सकता पर जितनी देर शक्तिचालनी मुद्रा एवं सुर्य वेधन प्राणायाम जैसे प्रयोग किये जाते हैं। उतनी देर उसे लगाना लाभदायक है।प्राणवायु को सावधानीपूर्वक संयमित रखकर ‘केवल कुम्भक’ प्राणायाम का अभ्यास करते हुए सिद्धासन में दृढ़ रहकर साधना करने से उन्मनी कला स्वयमेव सिद्ध होती है।”
4-जिस प्रकार केवल कुम्भक के समय कोई कुम्भक नहीं, खेचरी मुद्रा के समान कोई मुद्रा नहीं, नाद के समय कोई लय नहीं; उसी प्रकार सिद्धासन के समान कोई दूसरा आसन नहीं है।
यह सभी आसनों में महत्वपूर्ण तथा सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला एकमात्र आसन है।
5-इस आसन के अभ्यास से साधक का मन विषय वासना से मुक्त हो जाता है और निष्पत्ति अवस्था, समाधि की अवस्था प्राप्त होती है। इसके अभ्यास से स्वत: ही तीनों बंध (जालंधर, मूलबन्ध तथा उड्डीयन बंध) लग जाते हैं। सिद्धासन के अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है। प्राणतत्त्व स्वाभाविकरूप से ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है। फलतः मन एकाग्र होता है। विचार पवित्र बनते हैं। ब्रह्मचर्य-पालन में यह आसन विशेष रूप से सहायक होता है।
6-सिद्धासन-कमर सीधी..ध्यान मुद्रा। बायाँ पैर इस प्रकार मोड़े कि उसकी एड़ी का ऊपरी भाग ‘सीवन’ मलमूत्र छिद्रों के मध्यवर्ती भाग के नीचे आ जाय। स्थिति ऐसी रहनी चाहिए कि सीधे बैठने पर एड़ी का दबाव ‘सीवन’ के भीतर चल रही मूत्र नलिकाओं पर पड़े। दांये पैर को बांये पैर के ऊपर रखकर पालथी जैसी स्थिति बनाई जाय। ऐसा करने से दाहिने पैर की एड़ी नाभि से लगभग चार अंगुल नीचे उसी को सीध में जमी दिखाई देगी। इस प्रकार दोनों एड़ियाँ शरीर की मध्य रेखा पर रहती है। तथा उनके बीच मूलाधार क्षेत्र आ जाता  है।इस प्रकार बैठने से पैरों पर दबाव पड़ता है और अधिक देर इस तरह बैठ सकने में कठिनाई होती है। अतएव आवश्यकतानुसार पैरों को बदलते रहा जा सकता है। जिस प्रकार आरम्भ में बायाँ पैर नीचे और दाहिना ऊपर रखा गया था उसी प्रकार बदलने पर दाहिना नीचे चला जाएगा और बायाँ ऊपर आ जायेगा।
7-सिद्धासन का अभ्यास आरम्भ में पाँच मिनट से करना चाहिए और जितना अभ्यास हो सके। उठने पर पैरों को कष्ट अनुभव न हो उतनी देर चलाया जा सकता है। प्रायः 15 मिनट से आधा घन्टे तक यह अभ्यास आसानी में बढ़ सकता है। इसका प्रयोग सामान्यतः जप में नहीं सूर्यभेदन प्राणायाम जैसी विशेष साधनाओं में ही करना चाहिए। सामान्य जप ध्यान आदि में तो सामान्य पालथी मार कर बैठना ही पर्याप्त होता है। तनाव उत्पन्न करने वाले साधनों से सामान्य साधन में ध्यान बँटता है।
सिद्धासन योग कैसे करें ?-

 

प्रथम विधि;-
1-सबसे पहले आप जमीन पर बैठ जाएं।
2-बाएँ पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को गुदा और उपस्थेन्द्रिय के बीच इस प्रकार से दबाकर रखें कि बाएं पैर का तलुआ दाएँ पैर की जाँघ को स्पर्श करे। इसी प्रकार दाएँ पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को उपस्थेन्द्रिय (शिशन) के ऊपर दबाकर रखें। अब दोनों हाथ ज्ञान मुद्रा में रखें तथा जालन्धर बन्ध लगाएँ और अपनी दृष्टि को भ्रूमध्य टिकाएँ।दोनों पैरों के पंजे जांघों एवं पिंडलियों के बीच होने चाहिए।
3-हाथों को घुटनों के ऊपर रखें।ध्यान रहे इस योगाभ्यास के दौरान आपका पूरा शरीर एकदम सीधा होना चाहिए।
4-अपनी दृष्टि को नाक की नोक पर केंद्रित करें।शुरुवात में आप इसको कुछ समय के लिए प्रैक्टिस करें लेकिन धीरे धीरे इसकी अवधि को बढ़ाएं । सर्वप्रथम दण्डासन में बैठ जाएँ।
दूसरी विधि;- सर्वप्रथम दण्डासन में बैठ जाएँ तत्पश्चात बाएँ पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को शिशन के ऊपर रखें तथा दाएँ पैर को मोड़कर उसकी एड़ी को बाएं पैर की एड़ी के ठीक ऊपर रखें। यह भी सिद्धासन कहलाता है।
तीसरी विधि;- बाएँ पैर की एड़ी पर बैठते हुए तलवे को दायीं जाँघ के भीतर लें। बाँये पैर की एड़ी का दबाव गुदा एवं जननेन्द्रिय के बीच रहे। दाएँ पैर को मोड़कर टखने को बाएँ टखने के ठीक ऊपर या पास में रखें। एड़ियाँ एक दूसरे के ऊपर रखें। दाएँ पैर के तलवे को बायीं जाँघ एवं पिण्डली के बीच फँसायें। हाँथों को घुटनों पर रखें। इसका अभ्यास किसी भी पैर को ऊपर करके किया जा सकता है।
लाभ- प्राण ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन,ब्रह्मचर्य पालन में सहयोग। रक्त चाप सन्तुलित करता है|
सिद्धासन के लाभ;- सिद्धासन को अगर सही विधि के साथ किया जाए तो इसके बहुत सारे फायदे हैं…
1- सिद्धासन यौन ऊर्जा को स्थिर रखने में ;- सिद्धासन करने के लिए अपने नीचे के पैर की एड़ी को अपनी गुदा से सटाकर रखना पड़ता हैं जिससे मूलाधार चक्र पर दबाव पड़ता हैं, यह दबाव सुनिश्चित करता है कि ऊर्जा धाराएं रीढ़ की हड्डी से ऊपर की ओर बहती हैं।ऊपर के पैर को गुदा और अंडकोष के बीच में रखा जाता है जिससे स्वाधिष्ठान चक्र पर दबाव बनता है। इस प्रकार सिद्धासन मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र दोनों के उत्तेजित करता है। इसलिए यह आसन यौन ऊर्जा को स्थिर रखने में फायदेमंद है।
1-(1)- सिद्धासन करने से आपके मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र दोनों पर दबाव पड़ता है यह पुरषों के लिए बहुत ही लाभदायक आसन है। यह प्रोस्टेट या पौरुष ग्रंथि को स्वस्थ रखने में मदद करता हैं, सिद्धासन में पैरों के कारण पड़ने वाला दबाव यौन ऊर्जा को परिशुद्ध करने में मदद करता है।
2- कुंडलिनी जागरण योग:- यह आसन मानसिक ठहराव देते हुए सूक्ष्म्नाड़ी से प्राण का प्रवाह सुनिश्चित करता है तथा कुंडलिनी जागरण में सहायता करता है।
3- नाड़ियों का शुद्धिकरण में:- इस आसन का नियमित अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है और पुरे शरीर में तरोताजगी आ जाती है। इस आसन के अभ्यास से 72 हजार नाड़ियों की अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है।
4- सिद्धासन ध्यान के लिए:- इस आसन ध्यान के लिए अति उत्तम आसन है और साथ ही साथ आपके मन को एकाग्र करने में बड़ी भूमिका निभाता है।
5- दिमाग को तेज करने के लिए: – इस आसन का नियमित अभ्यास करने से दिमाग तेज होता है। इसलिए छात्र एवं छात्राओं के लिए यह एक उम्दा योगाभ्यास है।
6- पाचन के लिए लाभदायक: – यह आपके जठराग्नि को तेज करता है, पाचन क्रिया को नियमित करने में सहायक है।
7- सिद्धासन बवासीर में:- सिद्धासन का नियमित अभ्यास से बवासीर में बहुत हद तक काबू पाया जा सकता है।
8- कुम्भक आसान:- इस आसन के नियमित अभ्यास से कुम्भक आसानी से लगने लगता है। पद्मासन के अभ्यास से जो रोग दूर होते हैं वे सिद्धासन के अभ्यास से भी दूर होते हैं।
NOTE;- आत्मा का ध्यान करने वाला योगी यदि मिताहारी बनकर बारह वर्ष तक सिद्धासन का अभ्यास करे तो सिद्धि को प्राप्त होता है। सिद्धासन सिद्ध होने के बाद अन्य आसनों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। सिद्धासन से केवल या केवली कुम्भक सिद्ध होता है। छ: मास में भी केवली कुम्भक सिद्ध हो सकता है और ऐसे सिद्ध योगी के दर्शन-पूजन से पातक नष्ट होते हैं, मनोकामना पूर्ण होती है। सिद्धासन के प्रताप से निर्बीज समाधि सिद्ध हो जाती है।
सावधानी;-
1-गृहस्थ लोगों को इस आसन का अभ्यास लम्बे समय तक नहीं करना चाहिए। सिद्धासन को बलपूर्वक नहीं करनी चाहिए।
2- गुदा रोगों जैसे बवासीर आदि से पीड़ित रोगी भी इसका अभ्यास न करें। 3-साइटिका, स्लिप डिस्क वाले व्यक्तियों को भी इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। घुटने में दर्द हो, जोड़ो का दर्द हो या कमर दर्द की शिकायत हो, उन्हें भी इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।
सिद्धयोनि आसन;-
स्त्रियों के लिए सिद्धयोनिआसन का निर्देश है,जब कि पुरुषों के लिए सिद्धासन कहा गया है। इन दोनों के भेद में चूक न हो जाये- इसका ध्यान रखना चाहिए।सिद्धासन के कठिन अभ्यास से  शुक्र का स्तम्भन होता है,कामविह्वलता पर भी नियन्त्रण होता है,उर्ध्वगमन होता है।  सिद्धयोनि आसन केवल महिलाओं के लिये है। बायीं एड़ी को योनि के भगोष्ठ के भीतर जमा कर रखें। तलवे को दायीं जाँघ व पिण्डली के बीच फँसा लें। बायीं एड़ी के दबाव को महसूस करें। दायें पैर की एड़ी को बायीं एड़ी पर इस प्रकार रखें कि वह भग- शिश्न को दबाए। तलवे को बायीं जाँघ एवं पिण्डली के बीच फँसा दें। इसका अभ्यास किसी भी पैर को ऊपर करके किया जा सकता है।
लाभ- सिद्धासन के समान।
चित्र — सिद्धासन के समान।
उच्चस्तरीय साधना विधान के अन्तर्गत कुछ अतिरिक्त ध्यानात्मक आसन का उल्लेख किया जा रहा है, जिन्हें साधक आवश्यकतानुसार प्रयोग कर सकते हैं…
1-पद्मासन;-  दोनों पैर विपरीत दिशा में दोनों जाँघों पर रखें। तलवा ऊपर की ओर रहे और एड़ी कूल्हे की हड्डी का स्पर्श करे। सिर, मेरुदण्ड सीधे रहें और कन्धे तनाव मुक्त ।।
लाभ;-  शारीरिक स्थिरता,मन शान्त। प्राण शक्ति का सुषुम्ना में प्रवाह, जठराग्नि तेज।
2- वज्रासन;-  घुटनों के बल जमीन पर बैठें। पैरों के अँगूठे को एक साथ और एड़ियों को अलग- अलग रखें।पंजो के भीतरी भाग के ऊपर बैठें। एड़ियाँ कूल्हों का स्पर्श करें। हाथों को घुटनों पर रखें। हथेलियाँ नीचे की ओर रहें। अन्दर- बाहर, आती- जाती श्वास पर ध्यान केन्द्रित करें।
लाभ;-  पाचन क्रिया तीव्र हो जाती है, फलस्वरूप अम्लता एवं पेप्टिक अल्सर में लाभ होता है। हर्निया, बवासीर, हाइड्रोसिल, मासिकस्राव की गड़बड़ी दूर करता है। साइटिका व मेरुदण्ड के निचले भाग की गड़बड़ी से ग्रस्त व्यक्तियों के लिये ध्यान के लिये सर्वोत्तम आसन है। सुषुम्रा में प्राण का सञ्चार करता है तथा काम ऊर्जा को मस्तिष्क में सम्प्रेषित करता है।
3-स्वस्तिकासन;-  यह सिद्धासन का सरलीकृत रूप है। अन्तर केवल इतना है कि एड़ी का दबाव गुदा एवं जननेन्द्रिय के बीच न होकर बगल में रहता है।
चित्र — सिद्धासन के समान
लाभ;- पेशीय पीड़ा से परेशान लोगों के लिये बैठने हेतु एक स्वस्थ आसन है।
4-सुखासन;-  जिस प्रकार बैठने से शरीर को सुविधा हो, शान्ति में अड़चन न पड़े, वही सुखासन कहलाता है। बाएँ पैर को मोड़कर पंजे को दाएँ जाँघ के नीचे रखें। दाएँ पैर को मोड़कर पंजे को बाईं जाँघ के नीचे रखें। हाथों को घुटनों पर रखें।
लाभ;- बिना तनाव, कष्ट और पीड़ा के शारीरिक व मानसिक सन्तुलन प्रदान करता है। जो लोग ध्यान के कठिन आसनों में नहीं बैठ सकते, उनके लिए सरलतम एवं सर्वाधिक आरामदायक आसन है।
5-भद्रासन क्या है ?
भद्रासन संस्कृत शब्द भद्र से निकला है जिसका मतलब होता है सज्जनता या शालीनता। यह आसन लम्बे समय तक ध्यान में बैठे रहने के लिए अनुकूल है और इससे शरीर निरोग और सुंदर रहने के कारण इसे भद्रासन कहा जाता हैं। भद्रासन योग को अंग्रेजी में ‘Gracias pose ‘ भी कहा जाता हैं। यह आसन बहुत सारे रोगों को नष्ट करने में सहायक है। भद्रासन करने से शरीर सुदृढ़, स्थिर और मजबूत बनता है।भद्रासन का अर्थ होता है मणियों से जड़ा हुआ राजसिंहासन जिस पर राज्याभिषेक होता है। भद्रासन दो-तीन तरीके से किया जाता है।
भद्रासन की विधि:
पहली विधि;-  दरी बिछाकर उस पर सबसे पहले दंडासन की स्थि‍ति में बैठ जाएं। फिर घुटनों को मोड़कर दोनों पैरों की पगथलियों को आपसे में मिलकर एड़ियों को गुदाद्वार या लिंग के नीचे वाली हड्डी पर टिका दें। दोनों हाथों के पंजों को मिलकार पांव के पंजों को पड़कर माथे को भूमि पर लगाएं। अब कुछ देर के लिए नाक के अगले भाग पर दृष्टि जमाएं। यह भद्रासन की पहली स्थिति है। योग के ज्ञाता इसे गोरक्षासन भी कहते हैं।
दूसरी विधि-
दरी पर पहले दंडासन में बैठ जाएं। अब अपने दाएं पैर को घुटने से मोड़कर पीछे की ओर ले जाकर पगथली को नितम्ब के नीचे रखें। फिर बाएं पैर को भी घुटने से मोड़कर पीछे की ओर ले जाकर पगथली को नितम्ब के नीचे रखें। अब दोनों हाथ घुटनों पर रखें और घुटनों को एक-दूसरे से सुविधानुसार जितना हो सके दूर रखें। आखें बंद कर अब कुछ देर के लिए नाक के अगले भाग पर दृष्टि जमाएं। यह दूसरी स्थिति है। संक्षिप्त में कहें तो वज्रासन में बैठकर दोनों घुटनों को दूर से दूर कर दें।
तीसरी विधि-
भद्रासन करने के लिए आप सबसे पहले जमीन पर बैठ जाएं फिर अपने दोनों पैरों को फैला दें। ये करने के बाद आप पैरों को मोड़ें और दोनों एडि़यों को एक दूसरे से जोड़ें दें। अब आप अपने हाथों को अपने एडियों के पास ले आए और टखनों को हाथों से पकड़ लें। नीचे दिखाई गई तस्वीर के माध्यम से आपको समझ आ जाएगा कि भद्रासन करते समय आपके शरीर की पोज क्या होनी चाहिए। इसके अलावा भी भद्रासन की और भी विधियां बताई जाती है। उक्त दोनों ही स्थितियों में जालंधर बंध लगाया जा सकता है।
आसन का लाभ:-  मन की एकाग्रता के लिए यह आसन अधिक लाभकारी है। इसके अलावा भद्रासन के नियमित अभ्यास से रति सुख में धैर्य और एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है। यह आसन पुरुषों और महिलाओं के स्नायु तंत्र और रक्तवह-तन्त्र को मजबूत करता है।
सावधानी :- यदि किसी प्रकार का कोई गंभीर रोग हो, पेट रोग हो या घुटनों का दर्द हो तो यह आसन किसी योग चिकित्सक से पूछकर ही करना चाहिए।
6- वीरासन;-
वज्रासन में बैठें। दाहिने घुटने को ऊपर उठायें और दाहिने पंजे को बाएँ घुटने के भीतरी भाग के पास जमीन पर रखें। दाहिनी कोहिनी को दाहिने घुटने पर और ठुड्डी को दाहिने हाथ की हथेली पर रखें। आँखों को बन्द कर विश्राम करें। बाएँ पंजे को दाहिने घुटने के बगल में रखकर इसकी पुनरावृत्ति करें। सजगता श्वास पर रखें।
लाभ;- एकाग्रता में वृद्धि,शारीरिक एवं मानसिक विश्रान्ति प्रदान करता है। गुर्दे, यकृत,प्रजनन एवं आमाशय अंगों के लिये यह उत्तम आसन है।
7-. ध्यान वीरासन;- दाएँ पैर को बाएँ पैर के ऊपर इस प्रकार रखें कि दाएँ पैर की एड़ी बाएँ नितम्ब को और बाएँ पैर की एड़ी दाएँ नितम्ब को स्पर्श करे। दाएँ घुटने को बाएँ घुटने पर तथा हाथों को घुटने या पैर के दोनों पंजों पर जो भी सुविधाजनक हो, रख लें। इस क्रम को विपरीत अर्थात् दाएँ पैर के ऊपर बायाँ पैर रखकर भी कर सकते हैं।
लाभ;-  श्रोणीय और प्रजनन अङ्गों की मालिश कर उन्हें पुष्ट बनाता है।

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