मानसून और तबादलों में क्या है संबंध, तबादलों में भ्रष्टाचार का परसेप्शन कैसे बनता है.. सरयूसुत

मानसून और तबादलों में क्या है संबंध, तबादलों में भ्रष्टाचार का परसेप्शन कैसे बनता है.. सरयूसुत
मानसून और सरकारी विभागों में तबादले सिस्टम बनने पर होते हैं. मानसून का सिस्टम प्रकृति के नियमों के अंतर्गत और तबादले का सिस्टम हर साल नई तबादला नीति के साथ बनता है. मानसून और तबादले दोनों ही सामान्य प्रक्रिया हैं, लेकिन दोनों एक जैसे ही चलते हैं. मौसम विज्ञानी मानसून की चाल बताते हैं और तबादला विज्ञानी तबादलों में चाल चलते हैं. मानसून सिस्टम कई बार बनते-बनते दूसरी तरफ चला जाता है और बीच का हिस्सा छोड़ कर बादल कहीं और बरसते हैं. बादल भी आजकल एक शहर के अलग-अलग इलाकों में बरसते हैं. ऐसा कम होता है कि पूरे शहर में एक साथ बारिश हो. मानसून और बारिश की चर्चा बहुत हो गई. अब हम तबादला मानसून पर फोकस करते हैं. वैसे दोनों में बादल हैं. मध्य प्रदेश में इस साल चंबल और ग्वालियर अंचल में मानसून ने कुछ ज्यादा ही कृपा की. वहाँ बाढ़ की स्थिति बन गई. मध्य प्रदेश की संवेदनशील सरकार ने मानसून की बेरुखी के कारण तबादला नीति का क्रियान्वयन रोक दिया. जब मानसून की बारिश कम हुई तो तबादलों की बारिश फिर से शुरू हुई, तो लगातार होती ही जा रही है. मानसून के बादल भले ही दो-चार दिन में बरसें, लेकिन तबादलों की बारिश तो रोज हो रही है.


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वैसे तो तबादले सरकार की सामान्य प्रक्रिया है ,लेकिन इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और लेन-देन के बादल उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. जो भी सरकार में होता है, वह तबादले करता है और जो विपक्ष में होता है वह तबादलों में भ्रष्टाचार और लेन-देन का आरोप लगाता है. यह एक कर्मकांड जैसा हो गया है, जिसका कोई अर्थ नहीं रह गया है. लगभग  20 साल पहले तक तो मध्यप्रदेश में ज्यादा समय कांग्रेस की सरकार होती थी. भाजपा बीच-बीच में सत्ता में आती थी. वर्ष 2000 के बाद राजनीति का पहिया ऐसा घूमा कि भाजपा लगातार राज्य में सरकार में रही. विपक्ष में रहते हुए 15 साल तक कांग्रेस तबादलों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रही. एक बार तो कांग्रेस सरकार द्वारा जारी तबादला आदेशों को जोड़कर 2 किलोमीटर की मानव श्रृंखला बनाते हुए तत्कालीन सरकार को घेरने का प्रयास किया था. वर्ष 2018 में भागते-भागते कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस से सत्ता पर कब्जा कर लिया. उन्हें 15 साल बाद सत्ता मिलने पर कांग्रेस ने बदले और दलगत भावना से तबादलों की झड़ी लगा दी. उस समय विपक्ष के रूप में भाजपा ने तबादलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. जो लोग सरकार चला चुके हैं और उस समय उन्होंने भी वही काम किया है जिस पर विपक्ष में आने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं.



राजनीति में पाखंड और दो चेहरे के वीभत्स स्वरूप को जनता अच्छी तरह समझती है. लेकिन राजनेता ऐसा मानते हैं कि वे प्रदेश के तारणहार हैं. तबादलों पर राजनेताओं के आरोपों से जनता में सरकारों और नेताओं के प्रति भ्रष्ट होने का परसेप्शन बनता है. प्रकृति हमेशा न्याय करती है. खुद के गलत साबित होने का परसेप्शन नेता खुद बनाते हैं. यह कितना खतरनाक है. वर्ष 2018 में चुनाव के बाद 5 साल की सरकार बनी. लेकिन कांग्रेस की कमलनाथ सरकार 15 महीने में ही धराशाई हो गई. फिर शिवराज सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन गई. जनता की याददाश्त कमजोर होती है, लेकिन 3 साल में ही दोनों सरकारों के तबादलों को लोगों ने देखा है और तबादलों के आधार पर दोनों सरकारों के तुलना का मौका सामने मिल गया. कमलनाथ ने तबादलों को बदला लेने और पिछली दुश्मनी निकालने के लिए उपयोग किया. एक प्रकरण ऐसा था कि एक अधिकारी का ऐसी जगह ट्रांसफर किया गया, जहां उस स्तर का पद ही नहीं था. उस स्तर के अधिकारी के लिए कार्यालय में कोई व्यवस्था नहीं थी. कमलनाथ ने बदले के कारण पद सहित ट्रांसफर तो कर दिया और अधिकारी तो पहुंच गया, पर पद कभी गया ही नहीं. ऐसी स्थिति में पदस्थापना वाले कार्यालय से वेतन नहीं मिल सकता था. वरिष्ठ अधिकारी संबंधित अधिकारी को राजधानी से वेतन देते रहे.




इस प्रकार के प्रतिशोधमूलक तबादलों में हालात ऐसे बदले कि कांग्रेस की सरकार ही बदल गयी. इसके अलावा ऐसे आउटस्टैंडिंग आईएएस अधिकारियों को कमलनाथ ने लूप लाइन में डाल कर रखा, जो उनकी सरकार बदलने पर प्रशासन के प्रमुख पदों पर और यहाँ तक कि मुख्य सचिव भी बनाए गए. यह कैसी स्थिति है कि तबादले योग्यता, आवश्यकता, उपयोगिता अथवा परफॉर्मेंस के आधार पर नहीं प्रतिशोध के आधार पर किये जा रहे हैं. तबादलों की ऐसी प्रवृत्ति के कारण ही प्रशासन में संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. तबादला व्यापार जैसा हो गया है. जितना पैसा लगाकर पदस्थापना कराएंगे, उससे कई गुना ज्यादा कमाएंगे. ऐसा अधिकारी, जो पैसा देकर पदस्थ हुआ है. उसकी प्राथमिकता जनता का कल्याण और सुशासन नहीं होता, बल्कि उसको तो अपनी खर्च की गयी राशि की भरपाई करना होता है. शासन में कुछ पद पर पदस्थापनाएं ऐसी होती हैं, जहां पदस्थ होने के लिए ज्यादा लेनदेन और मेहनत लगती है.  “तबादला विज्ञानियों” ने ऐसे पदों पर पदस्थापना के लिए हर महीने की रकम निर्धारित कर लेते हैं. यह शेयर अगर फेयर ढंग से चलता रहा तो जब तक चाहो बने रहो.



सरकार में नियुक्तियां, पदोन्नति और ट्रांसफर के लिए बोर्ड आयोग बने हुए हैं.  भर्तियों के लिए व्यवसायिक परीक्षा मंडल लोक सेवा आयोग जैसे संस्थान कार्य कर रहे हैं. अब केवल तबादला ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सभी कुछ खुला हुआ है. तबादले एक निर्धारित  नीति पर हों. निजी पसंदगी और नापसंदगी के आधार पर नहीं. हालात इतने खराब हो गये कि सर्वोच्च न्यायालय को भी हस्तक्षेप करना पड़ा. कैबिनेट सेक्रेटरी और डीजीपी जैसे पदों पर बार-बार तबादले न हों, इसलिए 2 साल न्यूनतम कार्यकाल निर्धारित किया गया है. निर्धारित सेवाकाल के विचार और सिद्धांत को हर स्तर पर लाने की जरूरत है. जैसे पदों पर भर्ती के लिए स्वतंत्र बोर्ड है, वैसे ही तबादलों के लिए स्वतंत्र बोर्ड या विभाग का गठन होना चाहिए. जिन पदों पर पदस्थापना होनी है, उनकी जानकारी विभाग दें और उनको सार्वजनिक कर अधिकारियो - कर्मचारियों से प्रस्ताव लाकर पारदर्शी ढंग से तबादले हों. तबादलों में बोलियाँ नहीं लगें. इसलिए जिन पदों पर जिन क्षेत्रों में पदस्थापना होना है, वहां परफोरमेंस के लिए जरूरी आधार पर परीक्षण के उद्देश्य से एक प्रश्न पत्र तैयार कर परीक्षा हो. उसके आधार पर पदस्थापना हो. वैसे यह कोई नेता सरकार नहीं करेगी, क्योंकि जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काटने का साहस कम लोगों में होता है.




सरकार तबादला नीति का ही पालन नहीं करती. पिछले सीजन में “कौन बनेगा करोड़पति” टीवी कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के सिपाही सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के सामने पहुंचा था. बातचीत में अमिताभ से उसने कहा कि उसकी पत्नी भी सिपाही है. दोनों अलग-अलग शहर में पदस्थ हैं. इसलिए जीवन में संकट का सामना कर रहा है. अमिताभ जी ने “कौन बनेगा करोड़पति” के मंच से ही मध्य प्रदेश सरकार से अनुरोध किया कि, पति और पत्नी को एक ही स्थान पर पदस्थ करें. बाद में सरकार ने पदस्थापना कर दी थी, लेकिन ऐसी परिस्थिति क्यों बनी ? तबादले पर नेताओं और पार्टियों के कारण ही परसेप्शन बनता है. ऐसा प्रयास हो कि केवल बयान के लिए बयान नहीं दिए जाएँ. सच हो, प्रमाण हो, तभी कुछ कहा जाए. पूरे राजनीतिक जगत को इस पर सचेत होना ज़रूरी है.



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