जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है, गर्भ के दौरान पिण्ड मे पांचवें माह मे आती है आत्मा.. दिनेश मालवीय

जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है, गर्भ के दौरान पिण्ड मे पांचवें माह मे आती है आत्मा.. दिनेश मालवीय
dineshहमारा भारत देश आध्यात्मिक ज्ञान मे सदा दुनिया का सिरमौर रहा है। यहाँ सिर्फ़ आयु मे बड़ा होने भर से कोई बड़ा नहीं हो जाता। जो ज्ञानवान है वह आयु मे छोटा होने पर भी समाज मे सबसे अधिक सम्मान पाता है। दो प्रकार के वृद्ध माने गये हैं - आयुृवृद्ध और ज्ञानवृद्ध। यहाँ ज्ञानवान बालक भी किसी वृद्ध का गुरु हो सकता है। पुत्र भी माता पिता को ज्ञान दे सकता है। इसका सबसे उत्तम उदाहरण कपिल मुनि हैं। सांख़्य योग के सबसे बड़े प्रवक्ता कपिलदेव ने बहुत कम आयु मे अपनी माँ को जीवन का परमज्ञान देकर उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया था।


शरीर के विकास की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है इसे भी जानेंगे। कपिल मुनि, ऋषि कर्दम के पुत्र थे। उनकी माता का नाम देवहुति था।  जब कपिलदेव गर्भ मे थे, तभी उनकी माता के चेहरे पर दिव्य तेज को देखकर उनके पिता कर्दम ऋषि को आभास हो गया था कि होने वाला पुत्र परमज्ञानी होगा। कपिल को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। कपिल का जन्म होने पर कर्दम ऋषि पत्नी की सहमति से तप करने वन मे चले गये। जाते समय उन्होंने पत्नी से कहा कि तुम्हें कोई भी संदेह होने पर उसका निवारण कपिल कर देंगे। कुछ समय बाद माता ने पुत्र कपिल से कहा कि अब मुझे किसी भी सांसारिक चीज़ की कामना नहीं है। मुझे ऐसा ज्ञान दो, जिससे माया का आवरण पूरी तरह मिट जाये।

कपिल मुनि कपिल देव भगवान
संतों के लक्षण


कपिल ने माता से कहा कि ज्ञान और मोक्ष का सबसे सरल तथा प्रभावी उपाय संतो की संगति है। माता ने संतों के लक्षण पूछे। कपिल ने बताया कि संतों को किसी के दुर्वचन कहे जाने पर कष्ट या क्रोध नहीं होता। उनके लिये निन्दा और स्तुति समान होती है। वे हर जीव मे परमात्मा का प्रकाश देखते हैं। किसी दुखी को देखकर द्रवित हो जाते हैं। सभी से मित्रता का भाव रखते है। वे हर क्षण ईश्वर का ही ध्यान करते हैं। जीवन मे हर घटना के साक्षी बने रहते हैं। घटनाओं से प्रभावित नहीं होते। सुख और दुख मे समान भाव रखते हैं।



सांख्य

कपिल ने सांख्य का उपदेश देते हुए जीवन का रहस्य समझाया। उन्होंने कहा कि आत्मा शरीर के सभी तत्वों से अलग है। जो लोग इंद्रियों के सुख को वास्तविक मानकर उनमे आसक्ति रखते हैं, वे अज्ञानी हैं। उस तत्व की पहचान करना चाहिये जिसके न रहने पर शरीर मिट्टी होकर सड़ने लगता है। कपिल ने सांख्य का उपदेश देते हुए बताया कि संसार के सभी बंधनों मे आसक्ति दुख का कारण है। मनुष्य को अपने अच्छे और बुरे कर्मों का फल मिले बिना नहीं रहता।


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भक्ति


भक्ति के बारे मे उन्होंने कहा इसके भेद बतलाये। जो व्यक्ति दूसरों का बुरा और ख़ुद का भला करने के लिये जप करता है, वह तामसी भक्ति है। जिसमे भगवान का नाम लेकर लोगों से धन, वस्त्र, मिष्ठान्न आदि लेकर उनका उपयोग स्वयं के लिये किया जाता है, वह राजसी भक्ति है। जो भक्ति सिर्फ मोक्ष प्राप्त करने के लीये की जाती है, वह सात्विक होती है। औथी भक्ति निर्गुण है, जिसमो मोक्ष की भी कामना नहीं की जाती। सभी कर्म ईश्वर को अर्पित कर किये जाते हैं।


शरीर की उत्पति और मृत्यु


कपिल ने माता की जिज्ञासा पर शरीर की उत्पत्ति और मृत्यु का वर्णन किया। स्त्री द्वारा गर्भ धारण करने के पाँचवें दिन उसके गर्भ मे पानी के समान बुलबुला उठता है। दसवें दिन बैर के समान गांठ पड़ जाती है। पंद्रहवें दिन गांठ मांस का पिण्ड बनकर कुछ लंबी और गोल हो जाती है। एक माह मे उसके हाथ, पांव और मस्तक के चिन्ह बनने शुरू हो जाते हैं। दूसरे माह मे उंगलियां बनती हैं। तीसरे माह मे चमड़ा और हड्डी का निर्माण होता है। चौथे माह मे शरीर मे रोयें तथा आंख, कान आदि इंद्रियां आकार लेती हैं। पांचवें माह मे जीवात्मा का प्रवेश हो जाता है। उसे भूग प्यास सताने लगती है। छठवें माह मे जीव का मस्तक नीचे और पांव ऊपर हो जाते हैं। इस अवस्था मे उसका जी काफी घबराने लगता है। सातवें माह मे पिछले अनेक जन्मों को और आठवें माह मे सौ जन्म पीछे के हाल याद आने लगते हैं। नवमे या दसवें माह मे वायु का वेग उसे बाहर निकाल देता है।


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जन्म के बाद वह अपने पूर्व जन्मों को भूल जाता है। निर्धारित आयु पूरी हो जाने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। जीवात्मा शरीर को छोड़ जाती है। उसे लेने आये यमदूत उसे ही दिखाई देते हैं, किसी दूसरे को नहीं। फिर जीव अपने कर्मों के अनुसार अगले जन्म मे जाता है। कपिल ने माता को और भी अनेक गूढ़ रहस्य बताये। इनमे नरकों के प्रकार, स्वर्ग, जीव की गति और मोक्ष आदि शामिल हैं। 



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