हिंदी का चीरहरण : यह ‘पिनाका’ ‘पिनाका’ क्या है! -दिनेश मालवीय

यह ‘पिनाका’ ‘पिनाका’ क्या है!

-दिनेश मालवीय

कुछ दिन पहले टेलीविजन के न्यूज चैनल पर एक खबर सुनते हुए मैं गुस्से में एंकर के लिए उल्टा-सीधा बोलने लगा. पास में बैठी धर्मपत्नी मेरे इस अचानक उबाल बार बहुत चकित हुयी. उसके कारण पूछने पर मैंने बताया कि तुमने अभी सुना नहीं कि न्यूज में क्या कहा गया? वह बोली कि मैंने ध्यान नहीं दिया, मेरा ध्यान तो मैथी छांटने में था. आप ही बताएँ कि एंकर ने ऐसा क्या बोल दिया? मैंने कहा कि वह कह रहा था कि, “डीआरडीओ द्वारा ‘पिनाका’ मिसाइल का सफल परीक्षण कर लिया गया.”

वह बोली कि यह तो ख़ुशी की बात है. मैंने कहा कि मुझे भी इस बात पर बहुत ख़ुशी हो रही है, लेकिन एंकर ने “पिनाक” को “पिनाका” क्यों कहा? क्या तुम नहीं जानतीं कि भगवान शिव के धनुष का नाम ‘पिनाक’ है और इसके नाम पर इस मिसाइल का नामकरण किया गया है? क्या हमारे पौराणिक नामों को भी इस तरह विकृत किया जाता रहेगा? वह बात को समझ गयी. मैं अक्सर इस तरह की विकृतियों पर तेष खा जाता हूँ. लेकिन उसने कहा कि इसमें बेचारे एंकर की क्या गलती है, जो आप उसके लिए उल्टा शीधा बोल रहे हैं. उसे तो डीआरडीओ ने यही नाम बताया होगा. बात भी सही थी. लेकिन मैंने कहा कि कम से कम समाचार वाचक को तो इसे पिनाक ही बोलना था. फिर सोचा कि वह ऐसी लिबर्टी कैसे ले सकता है? अगर उसे यही नाम दिया गया था, तो वह वही बोलेगा.

खैर, बात आयी-गयी हो गयी. लेकिन रात को सोते समय मैं इस विषय पर लगातार सोचता रहा. क्या डीआरडीओ वालों को शिवजी के धनुष का सही नाम पता नहीं होगा? यह सही है कि हिन्दी के कई शब्दों को जब रोमन में लिखा जाता है, तब उसमें ‘A’ जुड़ता है, तभी उसे सही माना जाता है. इसीके चलते राम का रामा, कृष्ण का कृष्णा और शिव का शिवा हो गया. बेचारे मिश्रजी मिश्राजी हो गये, विवेकानंद विवेकानंदा हो गये. ऐसे सैंकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं.

मैं भाषाविज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ और इस नाते बोलचाल की भाषा की ‘शुद्धता’ को लेकर कोई बहुत अधिक आग्रहशील भी नहीं हूँ. मैं जानता हूँ कि भाषा हमेशा कठिन से सरल की ओर जाती है. इसमें शब्द घिसकर नया रूप धारण कर लेते हैं. अनेक तत्सम शब्द तद्भव हो जाते हैं. श्रेष्ठी बेचारे सेठजी हो गये. पेंटालून पतलून हो गया, गेसलाइट आयल घासलेट तेल हो गया, वत्स का बच्चा, मयूर का मोर, चतुर्थ का चौथा, अष्ठम का आठ, सप्तम का सात, शत का सौ, प्रिय का पिया, वचन का बैन, अश्रु का आँसू, मूढ़ का मूर्ख, मृत्यु का मौत, रात्रि का रात, प्रस्तर का पत्थर हो गया. हज़ारों शब्द ऐसे हैं जो बोलने में कठिन थे. लोगों को जो बोलना सरल लगा वह उन्होंने बोल दिया वही चल पड़ा तो चल पड़ा.

मुझे इस बात में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिन्दी में दूसरी भाषाओं के शब्द क्यों बोले जाते हैं. यह विरोध तो वे लोग अधिक करते हैं, जो भाषा के इतिहास और उसकी प्रकृति को नहीं जानते. भाषाएँ कट्टरवादी नहीं होतीं. वे एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करती रहती हैं. हिन्दी में अगर अंग्रेजी के शब्द आ गये हैं, तो अंग्रेजी में भी हिन्दी के कई शब्द शामिल और मान्य हो गये हैं. अंग्रेज़ी शब्दकोशों के हर नए संस्करण में अच्छी-खासी संख्या में हिन्दी के शब्द जुड़ जाते हैं. रही उर्दू की बात तो उसके शब्दों के उपयोग के बिना तो हमारे अधकतर वाक्य ही पूरे नहीं होते. हाँ, यह बात अलग है कि बोलने वाले को यह पता नहीं होता कि यह शब्द उर्दू, फारसी या अरबी से आया है. बोलचाल की भाषा में तो भाषा मिश्रित किस्म की ही होती है, वरना आप शुद्ध हिन्दी में कोई बात कह कर देखिये, आपको और सुनने वाले दोनों को बहुत अटपटा लगेगा. उर्दू बोलने वाला भी निखालिस उर्दू बोलकर देख ले, उसे पता चल जाएगा कि वह किस तरह मजाक बन गया है. यह बात फिल्मों में मज़ाक का विषय बनती रही है.

बहरहाल, साहित्यिक भाषा की बात और है. साहित्यिक लेखक इसमें अपनी भाषा की शुद्धता के प्रति आग्रह रखते हैं. कुछ हद तक यह सही भी होता है, वरना भाषा की शुद्धता पूरी तरह लुप्त ही हो जायेगी, जो वांछनीय नहीं है. लेकिन बहुत अधिक तत्सम शब्दों के उपयोग वाली रचनाएँ आम पाठकों में लोकप्रिय नहीं हो पातीं. हालाकि साहित्य में उनके प्रयोग का सौन्दर्य अनूठा और आह्लादकारी होता है.

लेकिन बात ‘पिनाका’ से शुरू हुई थी. सेना में बड़े अफसर वास्तव में हिन्दी कम जानते हैं. सभी हिन्दीभाषी भी नहीं होते. वे ज्यादातर अंग्रेजी में ही पढ़ते-बोलते हैं. लेकिन भारतीय होने के नाते उनसे यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि कम से कम वे अपने देश की पौराणिक शब्दावली की तो ठीक समझ रखें. नहीं मालूम हो तो किसी जानकार से सलाह ली जा सकती है. अर्जुन को अर्जुना, द्रोण को द्रोणा, भीम को भीमा और भीष्म को भीष्मा तो नहीं बोलें. अधिकतर देश अपने शस्त्रों के नाम अपने ऐतिहासिक या पौराणिक नायकों के नाम पर रखते हैं. जो जिसे अपना आदर्श मानता है, उसके नाम पर शस्त्रों के नाम रखता है. हमारा पड़ौसी देश ‘गौरी’ और ‘गजनी’ को आदर्श मानता है, तो उसने भी अपनी मिसाइलों के नाम उन पर रखे हैं. हम भी यदि ऐसा करते हैं तो यह सर्वथा उचित है. लेकिन शस्त्रों के नाम रखने में तो नाम का सही उच्चारण और अर्थ तो समझा ही जाना चाहिए. वरना हमारी नयी पीढ़ियाँ भी इसी तरह पिनाक को पिनाका कहती रहेंगी और मुझ जैसे लोग टेलीविजन के एंकर को उल्टा सुलटा बोलकर अपनी नाराजगी और भड़ास निकलते रहेंगे.


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