योग क्या है(yog kya hai) ?  भारतीय दर्शन में योग और उसका वास्तविक उद्देश्य ?

 योग क्या है(yog kya hai)?  भारतीय दर्शन में योग और उसका वास्तविक उद्देश्य 

वर्तमान  समय  में  हम  सभी  ‘‘योग’’  शब्द  से  भली  भॅाति  परिचित  हैं।  चाहे बच्चा  हो,  जवान  हो,  वृद्ध  हो,  स्त्री  हो,  पुरूष  हो,  हर  उम्र  का  व्यक्ति  अपने  अनुसार  योग शब्द से कुछ ना कुछ अर्थ ग्रहण करता है। क्यांकि योग के महत्व इसके उपयोग से किसी ना किसी रूप में इन्कार नहीं किया जा सकता है, योग को हम सच्चे अर्थो में अपने जीवन में ग्रहण कर व्यवहारिक दृष्टि से इसे अपने लिए उपयोगी बना सके। इसके लिए बहुत ही आवश्यक है कि इसके सही अर्थ को जाने समझें। बिना इसके हम योग का जो उद्देश्य है उसे पूरा नहीं कर सकते है।

योग क्या है

योग  का अर्थ, परिभाषा, उद्धेश्य एवं महत्व को जानना। यदि हम योग शब्द को गहराई से जानने समझने, अनुभव करने का प्रयत्न करें तो हम पायेंगे कि कोई व्यक्ति अपने प्रति पुरी तरह सजग होकर अपने चित्त में संचित जन्म जन्मान्तर के जो कर्म संस्कार अर्थात् पाप - पु य  के  रुप  में  अब  तक  के  जन्मों  में  जो  भी  कर्म  हुए  है,  उन  सभी  कर्मों  का  क्षय  करके, भोग करके जब अपने आत्म स्वरुप में स्थिर हो जाता है, अर्थात् उसे यह बोध हो जाता है कि  मैं  पंचमहाभूतों  से  बना  यह  नष्ट  होने  वाला  शरीर  नहीं  हॅू,  अपितु  परमात्मा  का  अभिन्न अंश  आत्मा  हॅू।  इसे  ही  सच्चे  अर्थों  में  योग  कहा  जाता  है।  इसी  योग  को  योगियों  ने आचार्यों ने अलग - अलग ढ़ग से समझाने का प्रयास किया है।

आपके मन में विभिन्न प्रकार की जिज्ञासायें उत्पन्न होना स्वाभाविक है। जैसे कि -

इस योग शब्द की उत्पत्ति किस प्रकार से हुयी ?

इसे किस ढ़ग से परिभाषित किया गया है ?

क्या  योग  का  आघ्यात्मिक  महत्व  ही  है,  या  इसे  हम  अपनी  दिन  प्रतिदिन की जिन्दगी में भी अपना सकते है ?

योग  विद्या  के प्रणिता  कौन  है?  अर्थात्  सर्वप्रथम  किसके  द्वारा  इसका प्रतिपादन  किया  गया।  इत्यादि  आपकी  इन्ही  जिज्ञासाओं  के  समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है -तो आइये सबसे पहले हम योग क्या है ? इस विषय पर चर्चा करते है -

प्रिय पाठको प्रस्तुत लेख का अध्ययन करने के बाद आप -

        योग के अर्थ को भली भाॅति स्पष्ट कर सकेगे।

        योग विद्या के उद्धेश्य को स्पष्ट कर सकेगे।

        योग की विभिन्न परिभाषाओं का विश्लेषा कर सकेगे।

        व्यवहारिक जीवन में योग का क्या महत्व है ? इसका अध्ययन कर सकेगे।

योग का अर्थ योग शब्द  पर  विचार  करने पर  यह तथ्य सामने आता  है, कि  योग शब्द  संस्कृत के ‘युज’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है, जोड़ना अर्थात् किसी भी वस्तु से अपने को जोड़ना  या  किसी  कार्य  में  स्वयं  को  लगाना।  

(क) युज समाधौ-दिवादिगाीय,

(ख) युजिर योगे-रुधादिगाीय,

(ग) युजसंयमने-चुरादिगाीय,

(क) युज समाधौ-दिवादिगाीय   -  दिवादीगाीय  युज  धातु  का  अर्थ  है,  समाधि  । समाधि  का  प्रकृति  प्रत्यय  अर्थ  है,  सम्यक  स्थापन।  अर्थात्  जब  प्रगाढ़  संयोग  सुषुम्ना  में स्थिर ब्रह्नमनाड़ी से होता है। वह स्थिती समाधि की होती है। दूसरे अर्थ में युज समाधौ का अर्थ  है  -  समाघि  की  सिद्धि  के  लिए  जुड़ना।  या  समाधि  की  प्राप्ति  के  लिए  जो  भी साधनायें शास्त्रों में बताई गयी हैं, उन साधनाओ को अपने जीवन में अपनाना, ही योग का पहला अर्थ है।

(ख)  युजिर योगे-रुधादिगाीय  -  रुधादिगाीय युज धातु का अर्थ  है,  जुड़ना, जोडना मिलना, मेल करना। युजिर योगे का अर्थ है, संयोग करना। अर्थात् इस दुःख रुप संसार से वियोग तथा ईश्वर  से संयोग का नाम ही योग है। जिसका  वर्णन  श्रीमदभगवद्गीता में इस प्रकार किया गया है - ‘तं विद्याद् दुःख संयोग वियोग योग संज्ञितम्।’ - गीता 6/23

अर्थात्  इस  दुख  रुप  संसार  के  संयोग  से  रहित  होने  का  नाम  ही  योग  है।  वह साधन  जिसके  द्वारा  परमात्मा  के  साथ  ज्ञानपूर्वक  संयोग  है,  जीवात्मा  का।  इस  प्रकार  योग का अर्थ जीवात्मा का परमात्मा के साथ संयोग हैं।

(ग)  युजसंयमने-चुरादिगाीय  -  चुरादिगाीय  युज्  धातु  का  अर्थ  है,  संयमन्  अर्थात  मन का संयम या मन का नियमन। इस प्रकार युज् संयमने का अर्थ है, मन का नियमन करना ही योग है। मन को संयमित करना ही योग है, तथा यह मन को नियन्त्रित करने की विद्या योग ही है। इस प्रकार योग का अर्थ - योग साधनाओं को अपनाते हुए मन को नियन्त्रित कर, संयमित कर, आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है।

योग की परिभाषाए भारतीय  दर्शन  में  योग  विद्या  का  महत्वपूर्ण  स्थान  है।  यह  विद्या  सभी  विद्याओं  से  सर्वोपरि व  विशेष  स्थान  रखती  है।  योग  विद्या  से  सम्वन्धित  ज्ञान  सभी  भारतीय  ग्रन्थो  में  अनेक स्थानो  पर  देखने  को  मिलता  है।  वेद,  पुराण,  उपनिषद,  श्रीमद्भगवद्  गीता  आदि  प्राचीन ग्रन्थों  में  योग  विद्या  विद्यमान  है।  प्रिय  विद्यार्थियों  प्राचीन  ग्रन्थों  में  योग  विद्या  को  किस प्रकार परिभाषित किया गया है । आइये इसका हम अध्ययन करें -

योग सूत्र के प्रणिता महर्षि पतंजलि ने योग की निम्न परिभाषा दी है - ‘योगश्चितवृत्तिनिरोधः।’ - पा0 यो0 सूत्र 1/2

अर्थात्  चित्त  की  वृत्तियो  का  सर्वथा  अभाव  ही  योग  है।  चित्त  का  तात्पर्य  यहाॅ अन्तःकर ण  से  है।  ज्ञानेन्द्रियो  द्वारा  जब  विषयो  को  ग्रहण  किया  जाता  है।  ज्ञानेन्द्रियो  द्वारा अर्जित  ज्ञान  को  मन  आत्मा  तक  पहुॅचाता  हैं।  आत्मा  उसे  साक्षी  भाव से  देखता  है, वुद्धि  व अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस सम्पूण क्रिया में चित्त में जो प्रतिबिम्व बनता है, वही वृत्ति कहलाती है। चित्त हमारा दर्प ण की भाॅति होता है। अतः विषय  उसमें  आकर  प्रतिविबिम्व  होता  है।  अर्थात्  चित्त  विषयाकार  हो  जाता  है।  इस  चित्त को विषयाकार होने से रोकना ही योग है।

महर्षि व्यास के अनुसार योग - ‘योग समाधिः’।

महर्षि  व्यास  ने  योग  को  परिभाषित  करते  हुए  कहा  है,  योग  नाम  समाधि  का  है। जिसका  भाव  यह  है  कि  समाधि  द्वारा  जीवात्मा  उस  सत्-चित्-आनन्द  स्वरुप  ब्रहम  का साक्षात्कार करे और यही योग है।

श्री राम शर्मा आचार्य जी के अनुसार - ‘जीवन जीने की कला ही योग है।’ मनुस्मृति के अनुसार -

‘ध्यान योगेन सम्यश्यदगतिस्यान्तरामनः।’ - मनुस्मृति 16/731

ध्यान योग से भी योग आत्मा को जाना जा सकता है।अतः योगपराया ध्यान होना चाहिए।

कठोपनिषद  के  अनुसार  -  जब  चेतना  निश्चेष्ठ  मन  शान्त,  बुद्धि  स्थिर  हो  जाती  है,  ज्ञानी इस स्थिति को सर्वोच्च स्थिति मानते है। चेतना और मन के दृढ निश्चय को ही योग कहते है।

यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह।

बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमा गति।।

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम्।

अप्रमत्तस्दा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ।। कठोपनिषद-2/3/10-11

अर्थात् जब पाॅचा ज्ञानेन्द्रियाॅ मन के साथ स्थिर हो जाती है, और मन निश्चल बुद्धि के  साथ  आ  मिलता  है,  इस  अवस्था  को  परमगति  कहते  है।  इन्द्रियों  की  स्थिर  धारणा  ही योग  है।  जिसकी  इन्द्रियाॅ  स्थिर  हो  जाती  है,  उसमें  शुभ  संस्कारों  की  उत्पत्ति  और  अशुभ संस्कारों का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग की है।

सांख्यशास्त्र में योग की परिभाषा इस प्रकार दी है - ‘पुरूष प्रकृत्योतियोगेऽपि योग इत्यभिधीयते।’ - सांख्यशास्त्र अर्थात्  प्रकृति  -  पुरुष  का  प्रथृकत्व  स्थापित  कर,  अर्थात्  दोनो  का  वियोग  करके पुरुष के स्वरुप में स्थिर हो जाना योग है।

कैवल्योपनिषद के अनुसार -

‘श्रृद्धा भक्ति योगावदेहि।’

अर्थात् श्रृद्धा भक्ति और ध्यान के द्वारा आत्मा को जानना ही योग है।

याज्ञवल्यक स्मृति के अनुसार -

‘संयोगो योग इत्यक्तो जीवात्मा - परमात्मनो।’

अर्थात्  जीवात्मा  परमात्मा  के  मिलन  को  योग  कहते  है।  अज्ञानता  के  कार ा  यह जीवात्मा संसार चक्र में फंसा रहता है। ज्ञान के उदय होने पर   उसका परमात्मा से मिलन हो  जाता  है।  फलस्वरुप  उसके  सभी  दुःख  समाप्त  हो  जाते  है।  इस  प्रकार  आत्मा  परमात्मा के मिलन की स्थिति ही योग है।

अग्नि पुराा के अनुसार -

‘‘ब्रहम प्रकाशनम् ज्ञानं योगस्थ त्रैचित्तता।

चित्त वृत्ति निरोधश्चः जीवन ब्रहममात्मनो परः।।’’ -अग्नि पुराण 183/1-2

अर्थात्  ज्ञान  का  प्रकाश  पड़ने  पर  चित्त  ब्रहम  में  एकाग्र  हो  जाता  है।  जिससे  जीव का ब्रहम में मिलन हो जाता है। ब्रहम में चित्त की यह एकाग्रता ही योग है।

स्कन्ध पुराण के अनुसार -

‘‘जीवात्मा परमार्थोऽयमविभागः परमतपः सः एव परोयोगः समासा कथितस्तव।’’

अर्थात् जीवात्मा व परमात्मा का अलग - अलग  होना ही दुःख का कार ा है। और इस का अपृथक भाव ही योग है। एकत्व की स्थिति ही योग है।

लिंग पुराण के अनुसार -

‘योग निरोधो वृत्तेस्तु चितस्य द्विज सत्तमा।’

-लिंग पुराण 

अर्थात्  चित्त  की  सभी  वृत्तियों  का  निरोध  हो  जाना,  उसे   समाप्त  कर  देना  ही योग है। उसी से परमगति अर्थात् ब्रहम की प्राप्ति होती है।

 वैशेषिक दर्शन’ में योग को इस तरह से परिभाषित किया है -

‘तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः।’

-वैशेषिक सूत्र है।

अर्थात् मन आत्मा में स्थिर होने पर उसके (मन के काय का) अनारम्भ है, वह योग श्रीमद् भगवद्गीता के अनुसार - ‘‘योगस्थ कुरु कर्मािा संगत्यक्त्वा धनंजय। 

सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।’’ -गीता 2/48

अर्थात्  योग  में  स्थिर  हो  कर  कर्म  फल  का  त्याग  कर,  और  सिद्ध-असिद्ध  में  सम होकर कर्मों को कर ; यही समता ही योग है।

‘‘बुद्धि युक्तो जहाॅ तीहं उभय सुकृत दुष्कृते।

तस्याद्योगाय युज्जस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।’-गीता 2/50

अर्थात्  कर्मो  में  कुशलता  का  नाम  ही  योग  है।  कर्मों  की  कुशलता  का  तात्पर्य  यह है, कि हमे कर्म इस प्रकार से करने चहिए कि वे बन्धन का कारण ना बने। अनासक्त भाव से अपने कत्र्तव्य कर्मों का निर्वहन करना ही कर्म योग है।

तं विद्याय दुःख संयोग वियोगं योग संज्ञितम्।

स निश्चयेन योक्ताव्यो योगो ऽनिर्विणचेतसा।।

अर्थात् उस योग को उत्साह, श्रद्धा, धैर्य, से समाहित चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए। इस दुख रुप संसार के संयोग से रहित है, वह योग है।

महोपनिषद के अनुसार - मन के संवेगो पर नियन्त्रा ही योग है।

महर्षि अरविन्द के अनुसार - जीवन को बिना खोए भगवान की प्राप्ति योग है। 

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार - प्राचीन आर्ष ग्रन्थो का अध्ययन ही योग है।

गुरु ग्रन्थ साहिब के अनुसार - निःस्वार्थ भावना से कर्म करना ही सच्चे धर्म का पालन है, और यही वास्तविक योग है।

रागेय  राधव  अपनी  पुस्तक  ‘गोरखनाथ  और  उनका  युग’  में  कहा  है।  -  शिव  व  शक्ति  का मिलन को योग कहते है।

योग  वशिष्ठ  में  योग  को  इस  तरह  परिभाषित  किया  गया  है  -  संसार  सागर  से  पार  होने की युक्ति  का नाम ही योग है। महर्षि  वशिष्ठ  का कथन  है, कि  योग के द्वारा  मनुष्य  अपने वास्तविक स्वरुप सद्-चित्-आनन्द का अनुभव कर लेता है। -वशिष्ठ संहिता 6/1/13/3

महोपनिषद के अनुसार - ‘मनः प्रश्मनोपायो योग इत्याभिधीयते।’ - महो0 5/42

अर्थात्  मन  के  प्रशमन  का  उपाय  ही  योग  है।  मन  का  प्रशमन  अर्थात्  मन  का  रम जाना या स्थिर हो जाना ही योग है।
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Priyam Mishra



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