सनातन संस्कृति.. स्वास्थ्य होता क्या है? What Real Health Means and How You Can Achieve It?

स्वास्थ्य होता क्या है? 
What Real Health Means and How You Can Achieve It?
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कशिद् दुःख भाग्भवेत् ।।

स्वास्थ्यरक्षक

ओ3म् तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत श्रुणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश शरदः शतात् ।। -ऋग्वेद

हे जगत पिता, सर्व व्यापक, सर्वशक्तिमान, अनादि-अनन्त प्रभो ! आप सब कुछ देखने वाले, विद्वानों और उपासकों का हित करने वाले, शुद्ध और पत्र हैं। आपकी कृपा से हम ऐसे स्वस्थ रहें कि सौ वर्ष तक देख सकें, सौ वर्ष तक जीवित रह सकें, सौ वर्ष तक सुनते रह सकें, सौ वर्ष तक बोलते रह सकें । सौ वर्ष तक दीनता रहित और आत्मनिर्भर बने रह सकें और आपकी कृपा से यदि सम्भव हो सके तो सौ वर्ष से अधिक समय तक भी ऐसे ही स्वस्थ बने रहें।

Good health beyond the body | Soulveda

स्वास्थ्य होता क्या है? यानी स्वास्थ्य कहते किस हैं जिसकी हमें रक्षा करनी है या कि करनी चाहिए। 'स्वास्थ्य' शब्द बहुत उपयुक्त और सारगर्भित शब्द है। अंग्रेजी का शब्द Health (हेल्थ) स्वास्थ्य शब्द के पर्यायवाची अर्थ में प्रयोग किया जाता है लेकिन स्वास्थ्य का अर्थ सिर्फ Health नहीं होता जैसे अंग्रेजी के शब्द 'डिज़ीज़'(Disease) का अर्थ सिर्फ़ रोग नहीं होता। रोग के लिए अंग्रेजी का शब्द iIness अधिक उपयुक्त है। डिज़ीज़ शब्द अग्रेजी के Dis और Ease से मिल कर बना है जिसका शाब्दिक सही अर्थ बे-चैन होना है, असन्तुलित होना है विश्रामरहित और अस्वाभाविक होना है। इस स्थिति में विपरीत जो स्थिति होती यानी जिस स्थिति में चैन हो, बेचैनी न हो, मन और शरीर की स्थिति सन्तुलित हो असन्तुलित न हो, विश्राममय हो, विश्रामरहित न हो और स्वाभाविक हो अस्वाभावि न हो उसी स्थिति को 'स्वास्थ्य' कहते हैं क्योंकि स्वास्थ्य शब्द 'स्व' और 'अक्स्था से मिल कर बना है जैसे स्वभाव शब्द 'स्व' और 'भाव' से मिल कर बना है स्वास्थ्य और स्वभाव एक ही अर्थ रखते हैं यानी जैसा हमें होना चाहिए उस भाव या दशा म हमारा स्थित होना स्वभाव अथवा स्वास्थ्य कहा जाएगा और वैसा न हो अस्वाभाविक होने से अस्वास्थ्य' कहा जाएगा 

जब हमारी मानसिक या शारीरिक स्थिति अस्वाभाविक होती है तब हम किस प्रकार से बेचैन हो जाते हैं यानी जब मन के विचार और शरीर के त्रिदोष (वात पित कफ़) असन्तुलित होते हैं तब किस प्रकार से रोग उत्पन्न होते हैं? यदि हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति विश्राम की स्थिति में नहीं होती तो क्यों नहीं होती, और हमारे मन एवं शरीर की स्थिति स्वाभाविक यानी जैसी स्वस्थ होनी चाहिए वैसी नहीं होती तो इसके क्या कारण होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को नष्ट करके हमें अस्वस्थ यानी रोगी बना देते हैं? इन कारणों को समझना और इन्हें पैदा न होने देना ही स्वास्थ्य की रक्षा करना होता है, अपने मन और शरीर को रोग से बचा कर निरोग बनाये रखने के लिए आवश्यक एवं उचित प्रयत्न करना ही स्वास्थ्य रक्षा करना होता है । मन को स्वस्थ रखने के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को उचित आचार -विचार करना और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को उचित आहार-विहार करना कहा जाता है क्योंकि मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए उचित आचार-विचार तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए उचित आहार-विहार का पालन करना परम आवश्यक होता है ।

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हम जीवन में जो कुछ भी कार्य करते हैं वह शरीर के बल पर ही करते हैं और आगे भी शरीर स्वस्थ और सबल रख पाएंगे तो ही कर सकेंगे क्योंकि हमारे जीवन की यात्रा हम इस शरीर रूपी वाहन में बैठ कर ही करते हैं। शरीर रूपी वाहन जितना मजबूत और बढ़िया रहेगा उतनी ही हमारी जीवन यात्रा मजेदार और लम्बी होगी जैसे कमजोर और खटारा गाड़ी में यात्रा करना कष्ट पूर्ण होता है वैसे ही कमजोर और रोगी शरीर के कारण हमारी जीवन यात्रा भी नाना प्रकार के दुःखों एवं बाधाओं से भर जाती है। ऐसा न हो सके इसी के लिए हमें अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना होगी । और ऐसे प्रयत्न हमें इसी किशोर आयु से ही शुरू कर देने होंगे ताकि अभी से हमारा शरीर निरोग और बलवान रह सके और हमारी जीवनयात्रा शुरू से सही सही दिशा में शुरू की जा सके । इससे सब से बड़ा लाभ यह होगा कि अभी से हमारी आदतें, हमारी मनोवृत्ति, हमारे विचार और संस्कार वैसी स्थिति में दलने लगेंगे जैसी स्थिति स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए आवश्यक होती है।

एक कहावत है काया राखे धरम और पूंजी राखे व्यवहार । इसका अर्थ है कि यदि शरीर स्वस्थ और सशक्त होगा तो सभी कर्तव्यों का पालन किया जा सकेगा और पास में पूंजी होगी तो लेन देन के व्यवहार का पालन किया जा सकेगा । जैसे बिना पूंजी के ठीक से व्यवहार नहीं किया जा सकता वैसे ही बिना स्वास्थ्य के हम जीवन का ठीक से निर्वाह नहीं कर सकते। और यह स्वास्थ्य ऐसी वस्तु नहीं जो हम किसी से उधार मांग लें या बाज़ार से खरीद लें। बाज़ार में दवाइयां मिलती हैं स्वास्थ्य नहीं मिलता । चूंकि हमारे मन और शरीर को स्वाभाविक स्थिति में रखना ही स्वास्थ्य होता है इसलिए हमें 'स्वास्थ्य' को बनाये रखने के लिए मन,वचन,कर्म से निरन्तर रूप से प्रयत्नशील रहना होगा । इस प्रयत्नशीलता को ही स्वास्थ्य-रक्षा करना कहते हैं । स्वास्थ्य रक्षा करके ही हम निरोग रह सकते हैं। 

आयुर्वेद का कहना है-

हितकारी आहार करने वाला, काम कोध आदि मानसिक वेगों में लिप्त न रहने वाला,दान देने वाला (उदार हृदय), सबको समान दृष्टि से देखने वाला (पक्षपात रहित),सत्य बोलने वाला, सहनशील और विद्वानों के बताये निर्देशों का पालन करने वाला व्यक्ति निरोग रहता है। इसलिए हमें ऐसे प्रयत्न करने होंगे कि जो रोग अभी उत्पन्न नहीं हुए हैं वे उत्पन्न ही न हा क्योंकि बीमार पड़ कर इलाज करा कर फिर से स्वास्थ्य लाभ करने से तो यही अच्छा है कि हम बीमार पड़ने से बच जैसी कि अंग्रेजी में कहावत है- Prevention is better than cure अर्थात् इलाज कराने की अपेक्षा बीमार होने से बचना ही अच्छा है। नीति में भी कहा है- कीचड़ में पैर डाल कर फिर धोने से तो यही अच्छा है कि पैर कीचड़ में डाला ही न जाए (हितोपदेश)। बीमार पड़ने से बचने का प्रयास (Prevention) करना ही स्वास्थ्य की रक्षा करना है । 



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