क्या करें जब कोई अपना हो मानसिक बीमार

क्या करें जब कोई अपना हो मानसिक बीमार के लिए इमेज नतीजे

मानसिक रोगियों का पारंपरिक इलाज तांत्रिकों द्वारा किया जाता रहा है, परन्तु तांत्रिक द्वारा इलाज बहुत अमानवीय ढंग से किया जाता था,जिसमे रोगी को  अनेकों प्रकार कि शारीरिक यातनाओ से गुजरना पड़ता था. जैसे मार पीट करना या लोहे की गरम सलाखों से शरीर को दागना इत्यादि. तांत्रिक के पास कोई ज्ञान नहीं होता जिससे मानसिक रोग को ठीक किया जा सके. अतः इस अमानवीय व्यव्हार की यातनाओं से समाज को बचाना हम सब का कर्तव्य है.

जैसे जैसे मानवीय विकास तीव्र होता जा रहा है, इन्सान के लिए सुख सुविधाए बढती जा रही हैं.इन सुख सुविधाओं में शरीरिक सुविधाओं का लाभ अधिक मिला है, मानसिक श्रम ने शारीरिक श्रम का स्थान ले लिया है. क्योंकि बढती सुविधाओं को प्राप्त करने की चाहत में इन्सान कड़ी प्रतिद्वंद्विता के भंवर में फंस गया है, जिस कारण आज प्रत्येक इन्सान तनाव ग्रस्त रहने लगा है, और वह अनेक बार अवसाद और मानसिक विकारों  जैसी दुखद स्थितियों का सामना करने को मजबूर हो गया है.

सबसे दुखद पहलू यह है कि हमारा समाज कितना भी सभ्य हो गया हो अथवा अधुनकिता का दम भरता हो ,मानसिक कष्टों और अवसाद को उचित महत्त्व नहीं देता अथवा इन समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं होता. इसी कारण मानसिक अवसाद एवं मानसिक कष्ट झेल रहे व्यक्ति को उचित सहानुभूति प्राप्त नहीं हो पाती. कई बार उसे उपेक्षा और उपहासों का भी शिकार होना पड़ता है, जिससे उसके कष्ट एवं परेशानिया बढ़ जाती है. हमारा समाज प्रत्येक मानसिक रोग को पागलपन के रूप में देखता है,मानसिक रोग भी अन्य शारीरिक रोगों के रूप में ही आते हैं. पागलपन की स्थिति तो मानसिक रोग की एक अंतिम परिणति मानी जा सकती है,यद्यपि पागलपन का इलाज पूर्णतया संभव है.आवश्यकता है परिवार समय रहते, किसी भी प्रकार के मानसिक रोग को गंभीरता से ले और उसकी प्रारंभिक स्थिति में ही विशेषज्ञ  से परामर्श लें. और परिजन को किसी गम्भीर स्थिति में फंसने से बचाएं.
किसी भी शारीरिक रुग्णता में विशेषकर ऑपरेशन जैसी स्थितियों  में पूरा समाज औपचारिक रूप से उसको सहयोग देना अपना फ़र्ज़ समझता है.और ऐसे रिश्ते दार जो दस दस वर्ष तक भी मुलाकात भी नहीं कर पाते ऑपरेशन या गंभीर शारीरिक बीमारियों, जिसका अस्पताल के संरक्षण  में इलाज होता है, में दौड़े चले आते है तथा अपनी सहानुभूति प्रकट करते हैं. परन्तु यदि कोई व्यक्ति  मानसिक पीड़ा(रोग) या अवसाद कि स्थिति  से गुजर रहा  है तो उसे  अपने परिवार का सहयोग भी नहीं मिलता. कई बार   मानसिक रुग्णता कि स्थिति  में उसे तिरस्कार का सामना भी करना पड़ता है.

अभी कुछ समय पूर्व तक (देहाती क्षेत्रों में अब भी)मानसिक रोगियों को तांत्रिकों के हवाले कर दिया जाता क्योंकि सामाजिक मान्यता रही है, कोई भी व्यक्ति अनियमित व्यव्हार(मानसिक रोगी) भूत प्रेत अथवा देवी आगमन के कारण करता है, अतः इसका इलाज तांत्रिक ही कर सकता है. इन मान्यताओं के चलते उसका इलाज तांत्रिक द्वारा कराया जाता था. तांत्रिक द्वारा इलाज बहुत अमानवीय ढंग से किया जाता था,जिसमे उसे अनेकों प्रकार कि शारीरिक यातनाओ से गुजरना पड़ता था. जैसे मार पीट करना या लोहे की गरम सलाखों से शरीर को दागना इत्यादि. परिवार के सदस्य अज्ञानता के कारण निष्ठुरता से उसकी यातनाये देखते रहते थे. अनेक बार इतना अधिक प्रताडित किया जाता था जिसमे मरीज की मौत तक हो जाती थी. आज शिक्षा के प्रभाव से कुछ सोच बदली है. और तांत्रिकों में विश्वास लगभग काफी कम हो गया है. फिर भी मानसिक रोगियों के प्रति अभी भी व्यवहारिक सहयोग देखने को कम ही मिलता है.
मानसिक रोगी को  सामाजिक सहानुभूति प्राप्त न होने का मुख्य कारण है, अक्सर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति शरीरिक रूप से देखने में स्वस्थ लगता है. अतः यह समझना मुश्किल होता है कि शारीरिक तौर पर स्वस्थ्य दिखने वाला परिजन किसी रोग(मानसिक रोग) का  शिकार हो चुका है, और उसके मानसिक कष्ट कितने गहरे हैं? उसे कोई कष्ट हैं भी या नहीं?, हो सकता है यह उसकी आदत हो या नाटक करता हो, अपने परिजनों से सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अथवा अपने काम से, ड्यूटी से बचने के लिए ऐसा कर रहा हो, अर्थात उसकी बीमारी को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है. जिससे मानसिक रोगी की समस्याएं बढ़ जाती हैं.

दूसरा कारण-मानसिक कष्ट एवं मानसिक रोग इन्सान को धीमें जहर कि भांति  धीरे धीरे मारते हैं अतः इसका अस्तित्व अधिक समय तक रहता है. और इलाज भी अधिक समय लेता है. अतः उसे समाज उसके व्यक्तित्व में ढाल कर देखने लगता है और उसकी यह स्थिति  काफी समय तक बनी रहती है. और कभी कभी जीवन पर्यंत उसे कष्ट सहने को मजबूर होना पड़ता है. आवश्यकता है किसी भी परिजन की मानसिक अवस्था में आने वाले बदलाव को गंभीरता से समझा जाय और यदि कोई परिजन मानसिक समस्याओं से पीड़ित पाया जाय तो उसे पर्याप्त सहानुभूति प्रदान करते हुए आवश्यक चिकित्सा उपलब्ध करायी जाय. किसी भी मानसिक रोगी की प्राथमिक चिकित्सा के रूप में  उसे पूरे परिवार से सहानुभूति, प्यार और सहयोग मिले. परिवार का सहयोग ही उसे पागलपन की स्थिति तक पहुँचने से बचा सकता है.

यद्यपि मानसिक रोग विशषज्ञों एवं योग प्रशिक्षकों कि बढती संख्या ने इस समस्या से समाज को काफी राहत प्रदान की है. फिर भी अभी काफी बदलाव कि आवश्यकता है . जब तक मानवीय पहलू को समझते हुए गहराई से इस बारे में नहीं सोचा जायगा,मानसिक कष्ट ,अवसाद व विकार इन्सान को पागल खाने पहुंचाते रहेंगे. जो वास्तव में उन्नत मानव समाज पर कलंक है.

सत्यशील अग्रवाल


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