यूपी चुनाव पर किसान आंदोलन का क्या होगा प्रभाव, हल नहीं निकला तो चुनाव में आंदोलन की हवा निकल जाएगी.. सरयूसुत मिश्रा

यूपी चुनाव पर किसान आंदोलन का क्या होगा प्रभाव, हल नहीं निकला तो चुनाव में आंदोलन की हवा निकल जाएगी.. सरयूसुत मिश्रा

 

यूपी चुनाव की तैयारियों के बीच दिल्ली में चल रहा किसान आंदोलन भाजपा को परेशान कर रहा है. किसान आंदोलन भाजपा विरोध आंदोलन बन गया है. आंदोलनकारी भाजपा को अपना दुश्मन बताते हुए किसान महापंचायत में और आंदोलन स्थल पर तालियां बटोर रहे हैं. पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी किसान आंदोलनकारियों ने भाजपा के विरोध में काम किया था. भाजपा ने बंगाल में भले ही अपने आधार और विधायकों की संख्या को बढ़ा लिया हो, लेकिन माहौल के मुताबिक सफलता भाजपा को नहीं मिली थी. पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं. इनमें यूपी सबसे महत्वपूर्ण है. वैसे तो उत्तर भारत के तीनों राज्यों- यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में किसान आंदोलन का प्रभाव पड़ेगा, लेकिन भाजपा के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय उत्तर प्रदेश है.



पंजाब में तो कांग्रेस ने अपनी किरकिरी स्वयं करा ली है. कैप्टन अमरिंदर सिंह भले ही भाजपा में नहीं जा रहे हैं, लेकिन कैप्टन कांग्रेस को हराने और भाजपा को जिताने का माध्यम बनना चाहेंगे. इसी में उनका उज्जवल भविष्य हो सकता है. अब सबसे बड़े राज्य यूपी में किसान आंदोलन की चुनावी संभावनाओं पर गौर करते हैं. किसान आंदोलन का मुख्य केंद्र पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी यूपी बना हुआ है. वर्ष 2017 के चुनाव में पश्चिमी यूपी भाजपा के लिए बेस्ट साबित हुआ था. कुल 136 सीटों वाले पश्चिमी यूपी में भाजपा ने 120 सीटें जीती थीं. जाट बाहुल्य इलाके में बड़ी संख्या में जाट किसान ही आंदोलन से जुड़े हुए हैं. पश्चिमी यूपी में 20% करीब जाट और  करीब 30% मुसलमान हैं.



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उत्तरप्रदेश में 50 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जिन पर मुस्लिम-जाट का समीकरण सीट जीतने के लिए पर्याप्त है. मुसलमान तो भाजपा को हराने के लिए वोट करता है. जाटों के नाम पर “राष्ट्रीय लोक दल” इस क्षेत्र में सक्रिय है. “समाजवादी पार्टी” और “रालोद” का गठबंधन भी है. इस अंचल में दलित मतदाताओं की संख्या भी बहुत है. पश्चिमी यूपी में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की स्थिति भी बनी हुई है उत्तरप्रदेश में 2017 के चुनाव में जाट-मुस्लिम समीकरण ऐसा ही था, लेकिन हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का पूरा लाभ भाजपा को मिला था. पिछले चुनाव के बाद जातिगत समीकरण तो जैसे के तैसे हैं, लेकिन किसान आंदोलन ने जाट समुदाय में भाजपा के विरोध को मुखर कर दिया है. किसी का भी विरोध जब तक दबा- छुपा रहता है तब तक उसका प्रभाव आंकना मुश्किल होता है. लेकिन जब मुखर और खुला विरोध हो जाता है, तो उसका आकलन साफ दिखाई पड़ता है.


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सत्ताधारी दल का खुला विरोध करने वाली शक्तियों की नीयत और उद्देश्य पर सवाल उठने लगता है. जब कोई विरोध होता है तो लोग सवाल यह उठाते हैं कि  इसके पीछे विरोध करने  वाले का क्या लक्ष्य है. लोकतंत्र में विरोध की एक मर्यादा होती है. विरोध जब तक ही उसको लोकतांत्रिक स्वरूप का लाभ मिलता है. जैसे ही खुला विरोध होता है लोग विरोध करने वाले और जिस का विरोध हो रहा है उसके बीच बैठ जाते हैं. किसान आंदोलन की आज स्थिति ऐसी हो गई है कि वह अपनी मांगों से ज्यादा भाजपा के विरोध पर टिक गया है. दूसरा प्रश्न यह भी है कि जिन मुद्दों पर आंदोलन किया जा रहा है उन पर सरकार की नीतियों का किसान लगातार लाभ ले रहे हैं. चाहे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सोशल की खरीदी का प्रश्न हो या न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का प्रश्न हो. भाजपा की केंद्र सरकार ने हाल ही में एमएसपी की दरें बढ़ाई है और किसान उसका लाभ ले रहे हैं. पंजाब में भारतीयों के सिस्टम के कुचक्र को तोड़कर किसानों को सीधे खरीदी गई फसल की राशि देने की व्यवस्था प्रारंभ हो गई है और अंततः उसका लाभ किसान ही उठा रहे हैं.



भाजपा गन्ना किसानों के बकाया भुगतान के साथ ही गन्ना की कीमतें बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है. भाजपा ने गांव में छोटे-छोटे किसान चौपालों के माध्यम से किसानों से संवाद शुरू किया है. पश्चिमी यूपी के भाजपा के निर्वाचित विधायक सांसद एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं. किसान आंदोलन यूपी चुनाव के पहले खत्म भी हो सकता है. ऐसी संभावनाएं बनी हुई हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की केंद्रीय मंत्री अमित शाह से और एनएसए अजीत डोभाल से मुलाकात के पीछे किसान आंदोलन को समाप्त करने की रणनीति ही मानी जा रहा है. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी आंदोलन को खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. किसान आंदोलन का माहौल तो ऐसा दिख रहा है कि यूपी चुनाव पर उसका व्यापक असर होगा, लेकिन भाजपा की घर घर पहुंच कर रणनीति और काम आंदोलनकारियों के मंसूबों को सफल होने देगी, ऐसा संभावना नहीं है.


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किसान आंदोलन के लिए सहानुभूति लगभग समाप्त सी हो गई है. सर्वोच्च न्यायालय तो यहां तक कह रहा है कि आंदोलनकारी किसान असीमित समय के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग पर कब्जा करके नहीं रह सकते. दिल्लीवासियों को आन्दोलन से हो रही परेशानी के अलावा जनधन का भी नुकसान पहुंचा रही है. पश्चिमी यूपी को छोड़कर शेष प्रदेश में किसान आंदोलन की वैसी स्थिति नहीं है. यूपी के जो दूसरे राजनीतिक दल हैं, वह स्वयंभू रूप से किसान आंदोलन के समर्थन की बात करते हैं, लेकिन आंदोलनकारी किसानों से उनकी भी सहानुभूति नहीं लगती.
राजनीतिक दल तो भाजपा विरोधी आंदोलन को चुनाव में बुलाना चाहते हैं . उनकी मांगों और मुद्दों  के लिए उनका खुला समर्थन नहीं प्रतीत होता. 

यूपी चुनाव में किसान आंदोलन का प्रभाव तो पड़ेगा लेकिन इससे भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा, ऐसी स्थिति नहीं बन सकती. किसान आंदोलन समाप्त हो गया तो फिर तो भाजपा के लिए सोने में सुहागा हो जाएगा. किसान आंदोलन हठधर्मिता, अमर्यादित आचरण, आंदोलन की फंडिंग और दिल्ली में अराजकता फैलाने के लिए पहले से ही सवालों के घेरे में है. यूपी चुनाव आंदोलनकारी किसान नेताओं के सामने किसान आंदोलन के सम्मानजनक समापन का एक अवसर है. किसान नेता इस अवसर से चुके और भाजपा फिर से यूपी में सरकार बनाने में सफल हो गई तो लोकतांत्रिक आंदोलन के तथ्यों को ही ठेस पहुंचेगी.



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