अखंड रामायण पाठ कब और कैसे करें, पाठ का फल क्या है?

अखंड रामायण पाठ कब और कैसे करें, पाठ का फल क्या है?

Ramayan

अखण्ड रामायण करने कराने का अमोघ फल होता है । इसमें दो राय नहीं है । बशर्ते पाठ ठीक से किया जाय । पाठ खंडित न होने पाए ।

कहते हैं कि अखण्ड रामायण पाठ गोस्वामीजी के समय में ही होने लगा था । जो कि अब भी कहीं न कहीं होता ही रहता है । यह पाठ कुछ लोग पुण्य लाभ के लिए तो कुछ कुशल-मंगल अथवा अन्य किसी कामना की सिद्धि के लिए करते हैं ।

अखण्ड रामायण पाठ के अलावा कई भक्त प्रतिदिन नियम से पाठ करते हैं । चाहे रोज कुछ ही दोहें पढ़ें । कुछ लोग मासपारायण तो कुछ लोग नवाहपारायण पाठ भी करते हैं । यह भी बहुत फलदायी है ।

समय बदलने के साथ अखण्ड रामायण के करने-कराने के मूल स्वरूप में बहुत परिवर्तन आ गया है जो कि बहुत गलत है । और इसका ठीक फल भी नहीं मिलता ।

अखण्ड रामायण पाठ कराने के लिए किसी योग्य कर्मकांडी व्राह्मण को लाना चाहिए । जो आवश्यक पूजा सम्पन्न करा सके । और अपने उद्देश्य अथवा कामना के अनुरूप उचित सम्पुट का चयन करके अखण्ड रामायण का पाठ आरंभ कराना चाहिए । यह सामान्यतः चौबीस घंटे में पूरा हो जाता है । इसके बाद हवन, आरती, भजन और भोजन होना ही चाहिए ।

अखण्ड रामायण के दौरान सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक पाठ पूरा न हो जाय तब तक अनवरत पाठ चलना चाहिए । बीच में कोई रुकावट नहीं होना चाहिए । जहाँ पाठ चल रहा हो वहाँ अन्य कोई अनर्गल बात किसी को नहीं करना चाहिए और न ही पाठ करने वालों को पाठ के अलावा इधर-उधर कुछ बीच में बोलना चाहिए ।

आजकल देश-समाज में बहुत रंगरूट हो गए हैं । पाठ स्थल को रंगरूटों से बचाना चाहिए । इन्हें पाठ कहने की अनुमति नहीं देनी चाहिए । पाठ कहने, करने और कराने के वही अधिकारी हैं जिन्हें श्रीरामचरितमानस, भगवान श्रीराम और गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज में श्रद्धा और विश्वास हो ।

अक्सर देखने में आता हैं कि लोग अखण्ड पाठ का आयोजन करा लेते हैं । जबकि रामायण कहने वाले योग्य लोगों की व्यवस्था ही नहीं करते । जो कि बहुत महत्वपूर्ण है । ऐसे रंगरूट जो कभी श्रीरामचरितमानस नहीं पढ़ते, पाठ कहने के लिए आ जाते हैं । कई तो मुँह में पान या गुटका भरे रहते हैं और बोलने पर थूक गिरता रहता है । ऐसे लोग बहुत ही अशुद्ध पढ़ते है । जबकि पाठ शुद्ध होना चाहिए । ये लोग मनोरंजन के लिए आते हैं, इन्हें शुद्धता से कोई मतलब नहीं होता ।

कई लोग तो ऐसे होते हैं जिन्हें रखे गए सम्पुट का ध्यान ही नहीं रहता । ये एक बार कुछ तो दूसरी बार कुछ बोल देते हैं । जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए ।

जैसा श्रीरामचरितमानस में लिखा गया है बिल्कुल वैसा ही पढ़ना चाहिए । अपने मन से कुछ जोड़ना या घटाना नहीं चाहिए । यहाँ तक रामा, सियारामा आदि भी नहीं । यदि जरूरत होती तो गोस्वामीजी खुद जोड़ देते । उनके जैसा भक्त-संत इस कलियुग में पैदा नहीं हुआ है और न होगा । इसलिए ज्यादा दिखावा नहीं करना चाहिए । बिल्कुल स्पष्ट और शुद्ध पढ़ना चाहिए । होता तो यह कि लोग मनमर्जी कुछ भी जोड़ देते हैं । एक जगह तो मैंने सुना कि लोग जय अम्बे गौरी आदि भी जोड़ रहे थे ।

रंगरूट फ़िल्मी तर्ज पर कहने के लिए भी जोड़ते-घटाते हैं, तोड़-मरोड़ कर कहते हैं । यहाँ फ़िल्मी तर्ज की कोई जरूरत नहीं है । ऐसे लोगों को पहले से ही दूर कर देना चाहिए । एक बार एक लोग कह रहे थे कि हम लोग ऐसे तर्ज पर रामायण कह रहे थे कि लोग झूम गए । शहर की लड़कियाँ आई हुई थीं वे तो डांस करने लगीं । बड़ा आनंद आया ।

कुल मिलाकर यही कहना है कि यह ध्यान रखना चाहिए कि अखण्ड पाठ खंडित न होने पाए । रंगरूट न कहने पायें । पाठ बहुत ही स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए । इसके लिए पढ़ने वाले बीच-बीच में आराम करते रहें । बिना आराम किए कहने से अशुद्धता की सम्भावना बढ़ जाती है । प्रेम व भक्ति भाव से सीधा-सीधा पढ़ना चाहिए । ऐसा करने से अवश्य ही अभीष्ट फल प्रात होगा ।

डॉ. एस. के. पाण्डेय
Dr. S. K. PANDEY 


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