जब छोटे को ही त्यागा दाऊ ने


स्टोरी हाइलाइट्स

जब छोटे को ही त्यागा दाऊ ने------------------श्रीकृष्णार्पणमस्तु -22 when-chota-was-abandoned-tyu-sri-krishnanarpanamastu-22

जब छोटे को ही त्यागा दाऊ ने
                                                            श्रीकृष्णार्पणमस्तु -22
रमेश तिवारी
समय का सही उपयोग करने में प्रवीण थे। वे मनोविज्ञान के इस रहस्य को भी भलीभांति जानते थे कि व्यक्तियों तथा व्यक्तियों के समूहों का नेतृत्व कैसे किया जाता है। उनका सोच आकाश से व्यापक और समुद्र से भी गहरा था। स्यमन्तक मणि प्रकरण को ही लें! श्रीकृष्ण ने पत्नी सत्यभामा को ही जानकारी का केन्द्र बनाकर अपने ससुर सत्राजित की हत्या की गुत्थी सुलझा ली। उन्होंने यादव शासन के स्तम्भ अक्रूर की संदिग्ध सक्रियता को दंडित किया। बडे़ (दाऊ) और छोटे (कृष्ण) के मध्य कुछ समय के लिये भ्रमवश ढीले हुए प्रेम के तारों को शीध्र ही कस लिया। 

दाऊ को मनाने के लिए श्री कृष्ण ने इमोशनल कार्ड चला। वे निष्कपट बलराम की भावनाओं और प्रेम को समझते थे। प्रेम के इन सुरीले तारों को धन और सम्पत्ति के कारण औरों की तरह टूटने नहीं दिया। इस रोचक कथा को विस्तार से जान लेते हैं। कभी परछाई भी साथ छोड़ सकती है! शायद कभी नहीं। किंतु इस मणि ने तो प्राणाधिक प्रिय बलराम को भी छोटे से दूर कर दिया। परन्तु! छलिया और रहस्य लीला में प्रवीण कृष्ण ने बलराम का मानसिक शोषण करने में भी कोई कसर नहीं छोडी़। समय हो, कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति, मित्र, शत्रु अथवा और उपयोगी लगने वाले किसी भी स्तर के व्यक्ति का उनसे अच्छा उपयोग कोई भी नहीं कर सका। परन्तु यह सब काम धर्म, धारणाओं और मर्यादाओं की सीमा में ही किया।


द्वारिका का प्रभाव शाली मंत्री और अपने श्वसुर का हत्यारा शतधन्वा भी तो श्रीकृष्ण का रक्त संबंधी था। किंतु जैसे ही कृष्ण को गुप्त सूत्रों से सूचना मिली कि शतधन्वा शूरसेन देश में है - श्रीकृष्ण, दाऊ, और सेनापति सत्यजित सहित चतुरंगिणी सेना लेकर चढा़ई करने जा पहुंचे। शतधन्वा ने श्रीकृष्ण का काशी की सीमा पर भारी मुकाबला किया। किंतु.! इस युद्ध में शतधन्वा तो मारा ही गया, किंतु उसके साथ हरावल दस्ता बनकर श्रीकृष्ण से युद्ध कर रहे काशी नरेश सुबाहू की भी उसने राजनैतिक हत्या करवा दी। यही नहीं श्रीकृष्ण ने काशीराज की भागती हुई सेना को प्रयाग तक खदेडा़! 

फिर श्रीकृष्ण,नगर में घुस गये। राजा को दंडित कर समुचित कर भी प्राप्त किया। किंतु भविष्य के लिये कडी़ चेतावनी देकर छोड़ भी दिया! किंतु यही प्रयाग भूमि पर ही एक अप्रिय घटना भी घटी! दो शरीर और एक आत्मा कृष्ण, बलराम में मतभेद हो गये। वह भी इस सीमा तक कि बलराम ने कृष्ण को बुरा भला कहते कहते स्वार्थी और मतलबी कहकर नाता ही तोड़ लिया। काशीराज को दंडित करने के पश्चात दाऊ ने सहजता में कृष्ण से कहा - छोटे! वह मणि मुझको भी तो दिखा दे। उनकी जिज्ञासा स्वाभाविक थी। 

यद्यपि दाऊ का कृष्ण की ही तरह धन, सम्पत्ति की ओर कभी आकर्षण ही नहीं था। किंतु सहज जिज्ञासा वश वे बोले-छोटे! जिस मणि ने यादवों में भूकम्प सा ला दिया। हम लोग यहां तक आये। युद्ध किया। मैं भी तो देखूं.! आखिर वह मणि है कैसी? कृष्ण ने लाख समझाया। बड़े भैया वह मणि तो दुबारा चोरी होने के बाद मैने भी नहीं देखी। अभी हमको मिली ही नहीं है। परन्तु शीध्रकोपी और शीध्रतोषी दाऊ जिद पर अड़ गये। नहीं छोटे मणि तो बताना ही पड़ेगी। वह मान ही नही रहे थे। 

कृष्ण ने कहा - दाऊ, मुझको भी मणि से कोई लगाव अथवा लोभ नहीं है। मणि अभी तक हमको मिली ही नहीँ है। वह तो काका अक्रूर के पास है। अंततः क्रोधित दाऊ ने कहा ने अपनी विशाल गदा कांधे पर रखी और क्रोधित हो कर यह कहते हुए युद्ध के शिविर त्याग मणि तू रखले छोटे। मैँ तो जा रहा हूँ। इस प्रकार नाराज होकर दाऊ अपनी गदा कँधे पर रखकर शिविर से यह कहते हुए- 'छोटे मणि तू ही रखले' निकल गये। उनके पीछे सेना के उनके समर्थक योद्धा भी चल दिये। दाऊ जनकपुर (मिथिला) चले गये। इधर कृष्ण भी बिना बड़े भाई के द्वारिका लौट आये।

रुक्मणि और दाऊ की पत्नी रेवती को जब यह बात पता चली। वे सब दुखी हो गयींं। रेवती ने रुक्मणी को सांत्वना दी। वे कहीं नहीं जायेंगे। शीध्र ही लौट आयेंगे। छोटे भैया के बिना वे रह ही नहीं सकते। जन्म से लेकर अब तक यह प्रथम अवसर था जबकि दोनों अविभक्त आत्मायें अलग हुई हों। उस विक्रमी मणि ने दोनों भाइयों में तीव्र मनभेद उत्पन्न कर दिया। अब तक मणि की खोज में प्राणपण से जुटे कृष्ण को एक बार फिर से स्वय को निर्दोष प्रमाणित करने की सबसे बडी़ चुनौती उपस्थित थी। 

इसी बीच कृष्ण को प्राग्जोतेश्वर (आसाम) के राजा भौमासुर द्वारा स्त्रियों के शोषण की शिकायत मिली। उन्होंने सुधर्मा सभा का आयोजन किया। सबकी अनुमति ली। चतुरंग दल सेना को साथ लिया और आसाम के लिए निकल पड़े। भौमासुर (नरकासुर) के वध की कथा हम पहले ही बता चुके हैं। इस बीच कृष्ण ने अनेक पराक्रम किये। आसाम से ही वे उद्धव को लेकर अमरनाथ के दर्शन के लिए निकल गये। अभी तक स्यमन्तक मणि तो मिली ही नहीं है। बलराम कब लौटेंगे, अक्रूर का क्या हुआ। वे कहां हैँ ? 

आज की कथा बस यहीं तक। तो मिलते हैं। तब तक विदा। 

                                                  धन्यवाद।