स्त्री कब “पुरुष” बन जाती है? वेद में स्त्रियों को लेकर कही गयी ये बड़ी बात… P अतुल विनोद 

स्त्री कब “पुरुष” बन जाती है? वेद में स्त्रियों को लेकर कही गयी ये बड़ी बात… P Atul Vinod 

ऋग्वेद का एक श्लोक अचानक नज़रों के सामने आया इस श्लोक में स्त्रियों को लेकर एक बड़ी बात कही गयी है| 

ॐ स्त्रियः सतीस्ता उ मे पुंस आहुः,पश्यदक्षण्वान्न विचेतदन्धः।

कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत,यस्ता विजानात् स पितुष्पिता सत्॥

(ऋग्वेद संहिता, मण्डल १, सूक्त १६४, ऋक् १६)

महिलाओं की समाज में लम्बे समय तक उपेक्षा हुयी लेकिन … भारतीय धर्म दर्शन में महिलाओं को उच्च स्थान दिया गया है| यहाँ नारी को पूजा के योग्य बताया गया| लेकिन नराधम पुरुष ने उसकी कोमलता का गलत फ़ायदा उठाया, इसीलिए मानव जाति इसका परिणाम भोग रही है| पुरुष और महिला की बराबरी की बात बेमानी है.. प्राकृतिक संरचना में डिफ़रेंस की वजह से साफ़ है की दोनों अलग अलग भूमिका के लिए बनाये गए हैं| पुरुष महिलाओं की बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि उसे सन्तान को 9 माह तक पेट में रखने की शक्ति हासिल नहीं है| बच्चा पैदा हो जाए तब भी पुरुष उसका पोषण नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास बच्चे के प्राकृतिक पोषण के लिए दूध पैदा करने की क्षमता नहीं| बच्चे को बाप की  गोद में वो सुकून नही मिल सकता जो माँ के आँचल में मिलता है क्योंकि बाप की छाती में वो अहसास नहीं| 


ईश्वर ने स्त्री को निश्चित ही बड़े प्रयोजन से बनाया है| ईश्वर ने स्त्री को ही सृजन का आधार बनाया है| उसकी वाणी में कोमलता इसलिए दी ताकि बच्चा कठोर आवाज से डरे न … शरीर ऐसा बनाया कि बच्चे के लिए वही गोद, रजाई, रसोई, संगीत, आराम बन जाए| स्त्री की संरचना एक मानव को जन्म देने की ईश्वर की महान तैयारी है| जब माता को इतना महान बनाया गया तो उसे पुरुष की बराबरी करने की ज़रूरत क्या? पुरुष की तरह कठोर बन कर वो प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ हो जाती है| बराबरी करने का भाव  पुरुषों के कारण पैदा हुआ| यदि पुरुष नारी की कोमलता का सम्मान करते| उसे कुदरत से मिले रूप, रंग, अंग का स्रजनात्मक महत्व समझते तो नारी पुरुषों की बराबरी का क्यों सोचती? वेद का ये सूक्त कहता है कि नारी को पुरुष की बराबरी करने के लिए श्रम करने की ज़रूरत नही| 

“ॐ स्त्रियः सतीस्ता उ मे पुंस आहुः,पश्यदक्षण्वान्न विचेतदन्धः”

यानि नारी ब्रम्ह तत्व में स्थापित(सती,समाना) हो जाए, तत्व ज्ञान प्राप्त कर ले तो वो पुरुष ही है| यहाँ एक बात और साबित हो जाती है कि वेद ने नारी को ब्रह्मपद और तत्वज्ञान का अधिकारी बताया है| ये ऋचा कहती है कि जो उस “तत्व” को नहीं जानता वो अँधा है|  जो “तत्व” को देखता और जानता है वही नेत्रवाला है| तत्व को देखना और जानना कोई बड़ी बात नहीं| क्यूंकि तत्व से हमारा नित्य सम्बन्ध है| जिसके हम अंश हैं, जिसके हम अंग हैं, उससे हमारी दूरी नही है, बस दिखाई देती है, अज्ञानता के कारण| एक पर्दा है इस पर्दे को यदि एक “बच्चा” भी हटा दे तो ये ऋचा उस बच्चे को “पिता” कहती है| ऐसा पुत्र पिता का भी पिता हो जाता है| 

“कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत,

यस्ता विजानात् स पितुष्पिता सत्”

वेद ने इस एक छोटी सी ऋचा में गूढ़ बात कह दी| जो अपने पूर्ण स्वरूप को जान ले वो सबसे बड़ा है, चाहे भौतिक रूप से वो नारी हो या बच्चा| जैसे हमारे शरीर का एक सेल .. कोशिका … भूल जाए कि वो हमारा ही हिस्सा है, वो इस शरीर रुपी समुद्र की एक बूँद है, और वो दूसरी बूँद को छोटा मानने लगे? वो खुद को अलग देखेगी, या तो वो दूसरी बूँद से श्रेष्ठ समझेगी या बहुत छोटा कण समझेगी, लेकिन यदि इस शरीर का हिस्सा मानेगी तो स्वयम वृहद स्वरुप होगी और दूसरी बूंद को भी वही मानेगी जो खुद है| ऐसे ही हम उस परम का एक “सेल”(बूँद,कण) हैं लेकिन खुद को अलग मानने के कारण बड़ा, छोटा या संकुचित समझ रहे हैं| बस ज्ञान हो जाए तो न मैं छोटा न वो| 

स्त्री और पुरुष दोनों ही उस “महादेव” के सेल्स हैं भूमिका अलग है लेकिन बराबर हैं| ऐसे ही बच्चा भी बराबर ही है शरीर से छोटा लेकिन उसी का अंश इसलिए उसका भी अपमान नही करना| 


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