जब अंग्रेजों ने शोषण का एक और उदाहरण प्रस्तुत किया…. भाग 4

भारत की आज़ादी की वो कहानी जो हर भारतीय को पढना चाहिए.. भाग 4

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अकाल ने अंग्रेजी शासन के शोषक स्वरूप को प्रकट करने के लिए और साक्ष्य उपलब्ध कराये। बारम्बार पड़ने वाले अकाल के विरुद्ध एक संभव बचाव के लिए भारतवासी चाहते थे कि शासन सिंचाई के लिए ज्यादा धन उपलब्ध कराये। इसके विरुद्ध शासन रेलवे को ज्यादा महत्व देता रहा। यह कार्य वाणिज्यिक और ऋण नीति को ध्यान में रखकर किया गया था। यह ध्यान देने की बात है कि रेलवे ने भारतीय बाजार को खोलने में सहायता दी और साम्राज्य की बेहतर सुरक्षा में योगदान दिया।

अकाल के दौरान देश से खाद्यान निर्यात करने की इजाजत नहीं दिये जाने के संबंध में भारतीयों की सलाह को भी शासन ने नहीं सुना। स्पष्टतः वे देख सकते थे कि जब भारतवासी खाद्यान्न पूर्ति की कमी के कारण मर रहे है तब भी अंग्रेजों को खाद्यान्न प्रदाय किये जाने की आवश्यकता थी।

इस तरह अंग्रेजी शासन की शोषक सच्चाई बहुतेरे तरीकों से उजागर हुई। वास्तव में उसे एक शब्द के द्वारा प्रकट किया जाने लगा। यह शब्द अंग्रेजी था ड्रेन जिसका मतलब है-वहा देना या सम्पत्तिहीन बना देना। ड्रेन शब्द सामान्य बोलचाल की भाषा में जब आ गया तब सामान्य लोगों को भी इस शासन की जटिल प्रक्रिया के संबंध में कुछ जानकारी होने लगी ड्रेन शब्द को प्रचलित करने से जुड़ा हुआ नाम है: दादाभाई नौरोजी का, जो कि भारत के भीष्म पितामह कहे जाते थे, उन्होंने ढेर से आँकड़े एकत्र कर यह प्रदर्शित किया कि भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के बाद भारत का निर्यात हिस्से से उसका आयात ही ज्यादा रहा है। भारत इस अधिक निर्यात से लाभ पा सकता था यदि उसे उसका भुगतान किया जाता। परन्तु यह नहीं किया गया। इस तरीके से हर साल भारत के साधन ब्रिटेन को बहा दिये जाते थे और इसके बदले में भारत को समान राशि नहीं मिलती थी। इस तरीके की सुविचारित लूट के बाद तो दुनिया का सबसे धनी देश भी अस्तित्व में बना नहीं रह सकता था। यह एक निर्दयता थी कि भारत जैसे गरीब देश को इस तरह से और ज्यादा गरीब बनाया जाए।

भारतीय और अंग्रेजों के हितों के बीच बुनियादी टकराव है: यह जान लेने के बाद राष्ट्रीय चेतना का उदय होना एक स्वाभाविक परिणाम था। राष्ट्रीय भावना, जातिगत भेदभाव महसूस करने के कारण भी मजबूत हुई। चाहे कितने ही बड़े ओहदे या वर्ग का भारतीय हो वह कभी भी इस खतरे से मुक्त नहीं था कि उसे यूरोपीय लोगों के इस आक्रामक घमण्ड भावना का शिकार न होना पड़ेगा कि वह शोषक जाति के है भारतीय समाज के निम्नतर लोगों पर यूरोपियों द्वारा कभी भी हमला किया जा सकता था और इन निम्नतर लोगों की महिलाये उत्पीड़न के खतरे का शिकार होती थीं। इस तरह के मामले न्यायालय में लाये भी जाते तो बिरले मामलों को छोड़कर यूरोपीय अपराधी दण्ड पाने से बच निकलते। वह इस बात पर जोर देते कि यह उनका अधिकार है कि उनके मामले की सुनवाई यूरोपीय न्यायाधीश या जूरी द्वारा की जाए। जहाँ तक भारतीय समाज के मध्य वर्गीय और ऊपरी वर्गों का सवाल है, उन्हें विभिन्न तरीको से जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता। उदाहरण के लिए उन्हें रेल के डिब्बे, होटल या क्लब से सिर्फ इसलिए निकाल बाहर कर दिया जाता कि किसी यूरोपीय ने उन्हें निकाल बाहर करने का निर्णय लिया है। 1857 के बाद के वर्षों में राष्ट्रीय चेतना के विकास से राजनीतिक रूप से जागरूक भारतीयों ने ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस करना शुरू कर दी जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके और शासकों से कुछ रियायत दिला सके। यह एक सरल काम नहीं था। प्रारंभ में बम्बई (मुंबई), कलकत्ता (कोलकाता), मद्रास(चेन्नई) और पुणे में राजनीतिक संघ स्थापित किये गये। परंतु उनकी अपील और सक्रियता का स्वरूप बहुत करके क्षेत्रीय था परंतु ऐसे मौके भी आए थे जब अखिल भारतीय स्तर पर एकजुट कार्रवाई की कोशिश की गई।


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