जब चन्द्र भगवान शिव के आभूषण बने 

जब चंद्रमा भगवान शिव के आभूषण बने

समुद्र मंथन के पश्चात् अमृत वितरण के समय राहु भी भेष बदलकर देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। जैसे ही दैत्य राहु ने अमृत पान किया तो चंद्रमा और सूर्य ने विष्णु को सूचना दे दी। तब भगवान विष्णु ने विकराल शरीर वाले राहु का मस्तक काट डाला।

 

तत्पश्चात् कई लाख मुख्य दैत्य गर्जते तथा बल-पराक्रम वाले देवताओं को युद्ध के लिए ललकारते हुए आगे बढ़े। महाकाय, महाबली, राहु, चंद्रमा और इन्द्र के पीछे दौड़ा तथा वह समस्त देवताओं पर ग्रास लगाता जा रहा था। राहु यद्यपि एक ही था किंतु अपने मयावी ज्ञान के कारण सर्वत्र पहुँचा हुआ दिखाई दे रहा था। राहु के भय के कारण सभी देवता चंद्रमा को अकेला छोड़ कर चले गये। देवगण ज्यों ही स्वर्गलोक में पहुँचे, त्यों ही राहु भी महान वेग से जाकर देवों के सामने खड़ा हो गया। चंद्रमा के चुगली करने के कारण राहु का क्रोध चंद्रमा पर अधिक था और वह चंद्रमा को निगल जाना चाहता था। यह देख चंद्रमा ने भय से व्याकुल होकर भगवान शिव की शरण में जाने का विचार किया और वह मन ही मन शिव जी के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप तथा श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने लगा- ‘देवेश! परमदयालु आप ही हमारे रक्षक हो, हे भोलेनाथ! मुझे इस घोर संकट से उबारें। हे पार्वतीपते! मैं आपकी शरण में हूँ। मेरी रक्षा करें।

भयभीत चंद्रमा द्वारा विनम्रता पूर्वक स्तुति करने पर सबका कल्याण करने वाले भगवान सदाशिव वहीं पर प्रकट हो गये और चंद्रमा से बोले – ‘डरो मत। तुम्हारी राहु से रक्षा हम करेंगे। यह कहकर शिवजी ने चंद्रमा को अपने जटा-जूट के ऊपर रख लिया। तभी से चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर श्वेत कमल पुष्प की भाँति शोभा पा रहा है एवं पृथ्वी पर मन्द-मन्द प्रकाश दे रहा हैं।



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