जब वासुदेव का संहार करने निकले वासुदेव: 2 वासुदेवों का भयंकर युद्ध 

जब वासुदेव का संहार करने निकले वासुदेव: 2 वासुदेवों का भयंकर युद्ध 
वासुदेव नामक एक राजा को वहां के अज्ञानी लोग वासुदेव कृष्ण मानकर पूजा-स्तुति करते और उससे कहते- “आपने वासुदेव रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण किया है."

यह सब देख कर पौण्ड्रक्वंशीय वासुदेव भी आत्म-विस्मृत होकर यह मानने लगा कि सचमुच, मैंने वासुदेव रूप से ही इस पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया है. फिर तो उसने भगवान विष्णु के समान ही अपना वेश बना लिया, उन्हीं की तरह उसने समस्त चिह्न धारण कर लिये, जब इससे भी उसका मन नहीं भरा तो अहंकार में आकर उसने द्वारका में श्रीकृष्ण के पास अपने एक दूत द्वारा संदेश भेजा- "अरे मूढ़ा अपने वासुदेव नाम को छोड़ दो. मेरे जितने भी चिह्न हैं, सभी को छोड़ दो. और यदि तुम्हें जीने की इच्छा है तो मेरी शरण में आ जाओ. इस दुष्कृत्य के लिए मैं तुम्हें क्षमा कर दूंगा."

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दूत ने जाकर श्रीकृष्ण से यह बात कही. तब श्रीकृष्ण ने मुस्करा कर कहा- "दूत! तुम मेरी ओर से पौण्ड्रक से जाकर यह कहो कि मैंने तुम्हारे कथन का सही-सही भाव समझ लिया है, तुम्हें जो करना है सो करो, मैं अपने चिह्न और वेष धारण कर तुम्हारे नगर में आऊंगा और निश्चय ही अपने चिह्न सुदर्शन चक्र को तुम्हारे ऊपर छोडूंगा. और तुमने आज्ञा करते हुए मुझे जो कहा है, मैं उसे अवश्य पालन करूंगा, कल मैं तुम्हारे पास अवश्य आऊंगा. पौण्डक मैं तुम्हारी शरण में आकर वही उपाय करूंगा जिससे फिर कभी तुमसे मुझे कोई भय न रहे." दूत! तुम जाकर ये सारी बातें उससे कहो."

पौण्डक का दूत श्रीकृष्ण का संदेश लेकर चला गया. दूसरे दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गरुड़ का स्मरण किया, स्मरण करते ही गरुड़ तुरंत उपस्थित हो गया. श्रीकृष्ण उस पर सवार होकर पौण्ड्रक की राजधानी की ओर चल पड़े, पौण्ड्रक पर श्रीकृष्ण के आक्रमण का समाचार सुन कर उसका मित्र काशी नरेश उसकी सहायता के लिए आ पहुंचा, काशी नरेश की सेना लेकर पौण्ड्रक युद्ध करने के लिए श्रीकृष्ण के सामने आ खड़ा हुआ.

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श्रीकृष्ण ने दूर से ही पौण्डक को हाथ में चक्र, गदा, साई धनुष और पद्म लिये एक सुंदर रथ पर बैठे देखा, उसके कंठ में वैजयंतीमाला, शरीर में पीतांबर, गरुडरचित ध्वजा और वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न था. पौण्ड्रक को अनेक प्रकार के रत्नों से सुसज्जित किरीट और कुंडल धारण किये देख कर श्रीकृष्ण गंभीर भाव से हंसने लगे. फिर उन्होंने पौण्ड्रक से युद्ध आरंभ कर दिया. 

कुछ ही देर में श्रीकृष्ण ने अपने बाणों, गदा और चक्र से पौण्ड्रक की सारी सेना को नष्ट कर दिया. उन्होंने देखते ही देखते काशिराज की सेना को भी यमलोक भेज दिया. इसके बाद उन्होंने पौण्ड्रक से कहा- “पौण्ड्रक! तुमने अपने दूत द्वारा मुझसे कहलवाया था कि मेरे चिह्नों को छोड़ दो. अतः अब मैं तुम्हारी उस आज्ञा का पालन करता हूं. देखो! मैंने अपना यह सुदर्शन चक्र छोड़ दिया, ये लो यह गदा भी तुम्हारे ऊपर छोड़ दी और यह गरुड़ भी छोड़ देता हूं जो तुम्हारी ध्वजा पर आरूढ़ हो सके."

सुदर्शन चक्र ने पौण्ड्रक को विदीर्ण कर डाला, गदा ने उसे नीचे गिरा दिया और गरुड़ ने उसकी ध्वजा तोड़ डाली. यह देख कर संपूर्ण सेना में हाहाकार मच गया. तब अपने मित्र का बदला लेने के लिए काशी नरेश श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगा. श्रीकृष्ण ने अपना एक ही बाण छोड़ कर उसका सिर काट लिया तथा उस सिर को काशी में फेंक दिया. इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण पौण्ड्रक तथा उसके मित्र काशी नरेश का वध करके द्वारका लौट आये.

उधर काशी में राजा का सिर गिरा देख कर सारी प्रजा आश्चर्य करने लगी. जब उसके पुत्र को यह जानकारी मिली कि उसके पिता का वध श्रीकृष्ण ने किया है तो उसने अपने पुरोहितों से परामर्श लेकर भगवान शंकर की तपस्या की. उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने उससे वर मांगने के लिए कहा तो वह बोला- "हे भगवन्! आप हम पर कृपा करें, मेरे पिता का वध करने वाले कृष्ण का नाश करने के लिए आपकी कृपा से अग्नि से कृत्या उत्पन्न हो. (मेरे वध के लिए मेरे पिता के मारने वाले कृष्ण के पास कृत्या उत्पन्न हो ऐसा अर्थ भी किया जाता है). 

भगवान शिव वैसा ही वरदान देकर अंतर्धान हो गये. वरदान के परिणामस्वरूप अग्नि का ही विनाश करने वाली कृत्या उत्पन्न हुई. उसका कराल मुख ज्वालामालाओं से पूर्ण तथा उसके केश अग्निशिखा के समान दीप्तिमान और ताम्रवर्ण थे. वह क्रोधपूर्वक 'कृष्ण! कृष्ण' कहती हुई द्वारका पहुंची.

जब श्रीकृष्ण समझ गये कि भगवान शिव की उपासना कर काशिराज के पुत्र ने ही महाकृत्या उत्पन्न की है तो उन्होंने अपने चक्र को आज्ञा दी- "इस अग्निज्वालामयी जटाओंवाली भयंकर कृत्या को मार डालो.” कहने के साथ ही उन्होंने अपना चक्र छोड़ दिया.

चक्र ने तत्काल कृत्या का पीछा किया. उस चक्र के तेज से दग्ध होकर छिन्न-भिन्न होती हुई कृत्या अत्यंत वेग से भागने लगी. सुदर्शन भी उतने ही वेग से उसका पीछा करने लगा. भागते-भागते कृत्या काशी पहुंची. तब कृत्या को बचाने के लिए काशी-नरेश की सारी सेना चक्र के सम्मुख आ डटी. तब चक्र अपने तेज से सारी सेना को दग्ध कर कृत्या सहित सारी काशी को जलाने लगा.

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जो काशी राजा, प्रजा और सेवकों से परिपूर्ण थी; जो घोड़े, हाथी और मनुष्यों से भरी हुई थी, जो संपूर्ण गोष्ठ और कोशों से युक्त थी और देवताओं के लिए भी दुदर्शनीय थी उस काशी को उस सुदर्शन चक्र ने उसके गृह, कोट और चबूतरों में अग्नि की ज्वालाएं प्रकट कर जला डाला. अंत में, वह चक्र लौट कर भगवान के पास चला आया.

वीणा 

"वेद अमृत"


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