विशेष: हनुमान भक्त ओबामा ने बचपन में यहाँ सुनी रामायण-महाभारत, एक ऐसा मुल्क जिसका धर्म तो इस्लाम है पर संस्कृति है रामायण – महाभारत

हनुमान भक्त ओबामा ने बचपन में यहाँ सुनी रामायण महाभारत: एक ऐसा मुल्क जिसका धर्म तो इस्लाम है पर संस्कृति है रामायण – महाभारत

Barack Obama spent childhood years listening to Ramayana and Mahabharata

मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में नागरिक अच्छा  इंसान बनने के लिए रामायण- महाभारत पढ़ते हैं

इसके पात्र वहां की स्कूली  एजुकेशन का भी अभिन्न हिस्सा हैं|

रामायण-महाभारत सुनकर कहाँ बीता है बराक ओबामा का बचपन?

Here's what Barack Obama wrote about Ramayana-Mahabharata book

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा (Barack Obama) रामायण-महाभारत के मुरीद हैं| बराक ने अपनी किताब में खुलासा किया है कि उनका बचपन रामायण और महाभारत के महाकाव्य सुनकर बीता है|

दरअसल 6 से  10  साल तक की उम्र  उन्होंने जकार्ता, इंडोनेशिया में अपनी माता और इंडोनेशियाई सौतेले पिता के संग बिताया।  यहीं उन्होंने रामायण और महाभारत सुनी|

आखिर क्या वजह है कि मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में रामायण और महाभारत इतनी प्रचलित है? इस पर आगे चर्चा करेंगे|

आमतौर पर मुस्लिम बहुल देशों में अन्य धर्मों की किताबें बहुत ज्यादा पढ़ी सुनी नहीं जाती|  कई कट्टरपंथी देशों में तो अन्य धर्मों की किताबों पर अघोषित प्रतिबंध है|  इसके बावजूद भी इंडोनेशिया में रामायण और महाभारत न सिर्फ प्रचलित है बल्कि इनके पात्र भी काफी लोकप्रिय हैं| बराक ओबामा ने अपनी किताब में  भारत के प्रति एक अलग जज्बे का जिक्र किया है|

अपने बचपन के दिनों में में इंडोनेशिया में रहते हुए हिंदू कथाओं रामायण और महाभारत को सुना| इसी वजह से बराक ओबामा हनुमान भक्त बन गए|  अमेरिका के राष्ट्रपति रहते जब उनसे पूछा गया कि वे अपनी जेब में क्या-क्या रखते हैं? तब उन्होंने कई  वस्तुएं निकालीं। ओबामा की जेब से  राम(RAMA)भक्त बजरंगबली की मूर्ति निकली थी।  ओबामा ने कहा जब भी वो परेशान या थका हुआ महसूस करते हैं तो हनुमानजी से मदद मांगते हैं। बराक का कहना है कि वह 2010 में बतौर  प्रेसिडेंट की यात्रा से पहले कभी  इंडिया नहीं आए थे, लेकिन इस  कंट्री ने हमेशा मेरी  इमैजिनेशन में एक ख़ास स्थान रखा था|

हम आपको बता दें इंडोनेशिया मुस्लिम देश है।  ऐसा होने के बावजूद वहां महाभारत के पात्र  प्रसिद्ध हैं। शादी विवाह जैसे शुभ कार्यो में महाभारत का मंचन किया जाता है।  यहां पर लोग प्राचीन काल से पांडवों को योद्धा के रूप में पूजते हैं। वहां  महाभारत और रामायण के इन योद्धाओं के मंदिर स्थापित हैं।

न्यूज़ पुराण के लिए प्रख्यात विडियो जर्नलिस्ट प्रवीण पाटौद ने यहाँ के फोटोग्राफ्स लिए 

इंडोनेसिया के  बीच जावा द्वीप में ही समुद्र  लेवल से 6500 फुट  ऊंचाई पर दिएंग का पठार है। यह समतल पठार  है जो 8000 फुट लंबा और 2500 फुट चौड़ा है। चारों ओर  खूबसूरत पहाड़ियों की  सीरीज है। ऐसे  खूबसूरत, रमणीय स्थान पर यवद्वीप के सबसे प्राचीन मंदिर  स्थापित हैं।  बताया जाता है कलियुग की 39वीं शती में इन मंदिरों का निर्माण हुआ। ये मंदिर पांडवों के मंदिर से  प्रसिद्ध हैं। यहां कुल आठ मंदिर हैं। मंदिर के  पास ही शिव, दुर्गा, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु व आदि देवताओं की मूर्तियां हैं। जानकारों के अनुसार सभी मंदिर गुप्तकालीन हैं। खास बात यह है कि मैदान के बायीं ओर भीम का तो दायीं ओर अर्जुन का मंदिर खड़ा है। सामने युधिष्ठिर का मंदिर  मौजूद है। नकुल  और सहदेव के मंदिर के साथ चंडी श्रीखंडी, चंडी घटोत्कक्ष व चंडी द्वारावती के मंदिर  स्थापित हैं। मंदिरों के अलंकरण  बेहद सुंदर व कलात्मक हैं। यहां के लोग अर्जुन को  महान योद्धा के रूप में पूजते थे।  कहा जाता है कि अर्जुन यहां अपने हथियारों को रखते थे। यहां कहीं-कहीं राख की तह मितली हैं जिसमें आज भी कई बार सोने के आभूषण मिलते हैं।

न्यूज़ पुराण के लिए प्रख्यात विडियो जर्नलिस्ट प्रवीण पटौद ने यहाँ के फोटोग्राफ्स लिए 

इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देश महाभारत को अपनी परंपरा में शामिल किए हैं लेकिन यह दुर्भाग्य है कि भारत में ऐसा नहीं है|

इंडोनेशियाई राष्ट्रपति जोको विडोडो का कहना है कि “हमारे बीच सदियों से सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहे हैं। रामायण और महाभारत इंडोनेशिया में बहुत लोकप्रिय हैं।” इंडोनेशिया में महाभारत की कथा काफ़ी प्रचलित है|

इंडोनेशिया की महाभारत भारत में प्रचलित महाभारत से थोड़ी सी परिवर्तित है,शिखंडी भारत में कुछ भी रहा हो, लेकिन इंडोनेशिया के जावा द्वीप पहुंचते पहुंचते शिखंडी एक औरत हो गया| अगर जावा की सदियों से प्रचलित महाभारत कथा पर भरोसा करें तो द्रौपदी धर्मराज युधिष्ठिर की पत्नी है, न कि पांच पांडव भाइयों की|शकुनी को वहां भी एक बुरे पात्र के रूप में देखा जाता है| हाँ भीम का पुत्र घटोत्कच बहुत लोकप्रिय है|” बाकी महाभारत वैसी ही है, उतनी ही लोकप्रिय है जितनी भारत में|


इंडोनेशिया के बाली द्वीप में रामायण कथा बोलबाला है तो जावा तो महाभारत के लिए समर्पित है| बस, रमजान माह  को छोड़ कर पूरे वर्ष महाभारत कथा का मंचन होता रहता है| ख़ास बात ये है कि जावा में रामायण का मंचन साल में 20 बार होता है तो महाभारत का कोई 100 बार|”

महाभारत और रामायण वहाँ घर-घर में है| हाँ ये इस्लामिक देश है, मगर लोग बहुत उदार है| बहुत सहिष्णु है|”

इंडोनेशिया के नब्बे प्रतिशत निवासी मुसलमान हैं, फिर भी उनकी संस्कृति पर रामायण  का गहरा असर दिखाई देता है। फादर कामिल-बुल्के १९८२ में  लिखते हैं, ‘पैंतीस  साल  पूर्व मेरे एक दोस्त ने जावा के किसी गाँव में एक मुस्लिम  टीचर को रामायण पढ़ते देखकर पूछा था कि आप रामायण क्यों पढ़ते है?  जवाब मिला, ‘मैं और अच्छा  व्यक्ति बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ।

रामायण काकावीन की रचना कावी भाषा/लैंग्वेज में हुई है। यह जावा की प्राचीन शास्रीय भाषा/लैंग्वेज है। यहां काकावीन का मतलब महाकाव्य है। कावी भाषा में कई महाकाव्यों का सृजन हुआ है।उनमें रामायण काकावीन का स्थान सर्वोपरि है।

रामायण का कावीन छब्बीस अध्यायों में विभक्त एक वृहद ग्रंथ है, जिसमें महाराज दशरथ को विश्वरंजन की संज्ञा से विभूषित किया गया है और उन्हें शैव मतावलंबी कहा गया है। इस रचना का प्रारंभ राम(RAMA) के जन्म से होता है। विश्वामित्र के साथ राम(RAMA) और लक्ष्मण(LAXMAN) के गमन के समय अष्टनेम ॠषि उनकी मंगल कामना करते हैं और दशरथ के राज प्रसाद में हिंदेशिया का वाद्य यंत्र गामलान बजने लगता है।

विश्वामित्र के साथ राम(RAMA) और लक्ष्मण(LAXMAN) के यात्रा-क्रम में हिंदेशिया की प्रकृति का भव्य चित्रण हुआ है।

विश्वामित्र आश्रम में दोनों राजकुमारों को अस्र-शस्र एवं ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा प्रदान की जाती है और ताड़का वध के बाद विष्णु का अवतार मान कर उनकी वंदना की जाती है।इस महाकाव्य राम सीता विवाह का वर्णन बहुत छोटे रूप में है। इसके अनुसार देवी सीता(SITA) का जिस समय जन्म हुआ था, उस समय पहले से ही उनके हाथ में एक धनुष था। वह भगवान शिव का धनुष था और उसी से त्रिपुर राक्षस का संहार हुआ था।

रामायण काकावीन में परशुराम(RAMA) का आगमन विवाह के बाद अयोध्या(AYODHYA) लौटने के समय वन प्रदेश में होता है। उनका शरीर ताल वृक्ष के समान लंबा है। वे धनुभर्ंग की चर्चा किये बिना उन्हें अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए ललकारते हैं, किंतु राम(RAMA) के प्रभाव से वे परास्त होकर लौट जाते हैं। इस महाकाव्य में श्री राम(RAMA) के अतिरिक्त उनके अनेय किसी भाई के विवाह की चर्चा नहीं हुई है।

अयोध्या(AYODHYA)कांड की घटनाओं की गति इस रचना में बहुत तीव्र है। राम(RAMA) राज्यभिषेक की तैयारी, कैकेयी कोप, राम(RAMA) वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु और भरत के अयोध्या(AYODHYA) आगमन की घटनाएँ यहाँ पलक झपकते ही समाप्त हो जाती हैं। अयोध्या(AYODHYA) लौटने पर जब भरत को जानकारी मिलती है कि उनकी माता कैकेयी के कारण भीषण परिस्थिति उत्पन्न हुई, तब वे उस पर क्रोधित होते है। फिर, वे नागरिकों और गुरुजनों को बुलाकर चंद्रोदय के पूर्व पिता का श्राद्ध करने के बाद सदल-बल श्री राम(RAMA) की खोज में वन जाते हैं।

मार्ग में गंगा-यमुना के संगम पर भारद्वाज आश्रम में उनका बढ़िया स्वागत होता है। दूसरे दिन एक पवित्र सरोवर मिलता है जिनका नाम मंदाकिनी है। उसी स्थल पर उन्हें एक नग्न तपस्वी से भेंट होती है जिनसे उन्हें श्रीराम(RAMA) के निवास स्थान की पूरी जानकारी मिलती है। यात्रा के अंतिम चरण में उनकी भेंट राम(RAMA), लक्ष्मण(LAXMAN) और सीता(SITA) से होती है। अयोध्या(AYODHYA)कांड की घटनाओं के बीच मंथरा और निषाद राज की अनुपस्थिति निश्चय ही बहुत खटकती है।

अयोध्या(AYODHYA) लौटने के पूर्व श्रीराम(RAMA) भरत को अपनी चरण पादुका देते हैं और उन्हें शासन संचालन और लोक कल्याण से सम्बन्धित लंबा उपदेश देते हैं। इस उपदेश में लोक कल्याण छिपा है| श्रीराम(RAMA) के उपदेश का सारांश यह है कि राजा की योग्यता और शक्ति की गरिमा प्रजा के कष्टों का निवारण कर उनका प्रेमपूर्वक पालन करने में निहित है।

भरत की अयोध्या(AYODHYA) वापसी के बाद श्रीराम(RAMA) कुछ समय महर्षि अत्रि के सत्संग में बिता कर दंडक वन की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विराध वध के बाद महर्षि सरभंग से उनकी भेंट होती है। वे योगबल से अपने शरीर को भंग कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। उन्हीं के पराम(RAMA)र्श से वे सुतीक्ष्ण के आश्रम के निकट पर्णकुटी बना कर रहने लगते हैं और तपस्वियों की रक्षा में संलग्न रहते हैं।

रामायण का कावीन में शूपंणखा प्रकरण से सीता(SITA) हरण तक की घटनाओं का वर्णन वाल्मीकीय परंपरा के अनुसार हुआ है। ॠष्यसूक पर्वत की ओर जाने के क्रम में श्रीराम(RAMA) की भेंट तपस्विनी शबरी से होती है। उसने पेड़ की छाल से अपने शरीर को ढक रखा है। उसका रंग काला है। वह श्रीराम(RAMA) को मधु और फल खाने के लिए देती है। वह कहती है कि रुद्रदेव ने जब उसको शाप दिया था, उस समय वे लिंग रुप में थे। विष्णु उस समय मधुपायी की अवस्था में थे। उन्होंने बाराह रुप धारण किया हुआ था। उसके बाद उन्होंने देवी पृथ्वी से विवाह कर लिया। फिर वे बाराह रुप में प्रकट हुए और एक पर्वत पर जाकर मोतियों की माला खाने लगे। तदुपरांत उस बाराह की मृत्यु हो गयी। उसके मृत शरीर को हम लोगों ने खा लिया। इसी कारण हम सबका शरीर नीलवर्ण का हो गया।१ श्रीराम(RAMA) के स्पर्श से वह शाप मुक्त हो गयी। सीता(SITA) की प्राप्ति हेतु वह उन्हें सुग्रीव(SUGREEV) से मित्रता करने की सलाह देकर लुप्त हो गयी।

सुग्रीव(SUGREEV) मिलन और बालिवध की घटनाओं का वर्णन वाल्मीकीय परंपरा के अनुसार हुआ है।

सीता(SITA)न्वेषण और राम(RAMA)-रावण(RAVAN) युद्ध का इस महाकाव्य में बहुत विस्तृत वर्णन हुआ है। रावण(RAVAN) वध और विभीषण के राज्याभिषेक के बाद श्रीराम(RAMA) ‘मेघदूत’ के यक्ष की तरह हनुमान से काले-काले बादलों को भेदकर आकाश मार्ग से अयोध्या(AYODHYA) जाने का आग्रह करते हैं।

वे कहते हैं कि समुद्र पार करने पर उन्हें महेंद्र पर्वत के दर्शन होंगे। उत्तर दिशा की ओर जाते हुए वे मलयगिरि का अवलोकन करेंगे। उसका सौंदर्य मनोहारी एवं चित्ताकर्षक होगा उसके निकट ही उत्तर दिशा में विंध्याचल है।

वहाँ किष्किंधा पर्वतमाला का सौंदर्य दर्शनीय है। मार्ग में सघन और भयानक दंडक वन मिलेगा जिसमें लक्ष्मण(LAXMAN) के साथ उन्होंने प्रवेश किया था। घने वृक्ष की शाखाओं में लक्ष्मण(LAXMAN) की गर्दन बार-बार उलझ जाती थी। इसी प्रकार चित्रकूट से अयोध्या(AYODHYA) तक के सारे घटना स्थलों तथा नदियों का विस्तृत वर्णन हुआ है। यक्ष की तरह वे माता कौशल्या और भरत से लंका विजय के साथ अपने आगमन का संदेश देने के लिए कहते हैं।

राम(RAMA) राज्योभिषेक के बाद महाकवि राम(RAMA) कथा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं। उनकी मान्यता है कि राम(RAMA) चरित्र जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है। राम(RAMA) के महान आदर्श का अनुकरण जनजीवन में हो, इसी उद्देश्य से इस महाकाव्य की रचना की गयी है। राम(RAMA) के जनानुराग की चरण धूलि के रुप में यह कथा संसार की महानतम पवित्र कथाओं में एक है। इस रचना के अंत में महाकवि योगीश्वर अपनी विनम्रता का परिचय देते हुए उत्तम विचार वाले सभी विद्वानों से क्षमा याचना करते हैं।

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