महान कहलाने का अधिकारी कौन है?

आजकल पेड-न्यूज़ का क्रेज बहुत बढ़ गया है। धन देकर किसी प्रचार एजेन्सी से कोई व्यक्ति यह सेवा ले सकता है। कुछ धनवान व्यवसायिकों ने इस काम के लिए निजी मीडिया हाउस बना रखे हैं। पेड-न्यूज़ तो पेड-न्यूज़ है। इस न्यूज़ की सेवाएं लेने वाले और देने वाले आपस में एक करार से बंधे होते हैं। ऐसी ख़बरों में तथ्यों और शब्दों के प्रयोग ग्राहक के हितों को ध्यान में रख किया जाता है। प्रचारित खबर से होने वाले लाभ अथवा हानि से प्रचार-एजेंसी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है। कई बार तो इस प्रकार की खबरों की सत्यता संदिग्ध होती है। ऐसे लेखन से जुड़े लोग अपने ग्राहक को महिमा-मंडित करने में अति श्योक्ति का सहारा लेते हैं। अतिश्योक्ति के लिए एक शब्द है-’महान’। इस शब्द से वे रातो-रात साधारण मानव को असाधारण कोटि का बना देते हैं।

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प्रचार-तंत्र से बने महान लेखकों, महान कवियों, महान नेताओं, महान अभिनेताओं, महान नायकों, महान पुरुषों महान संतों से हमारा समाज भरा पड़ा है। चारों ओर महानता के खूब झंडे गड़े हैं। प्रश्न उठता है कि किसी व्यक्ति की महानता को नापने की कसौटी क्या है? आदमी अपने गुणों से महान बनता है ... अथवा छद्म प्रचार से? क्या अखबारों में अथवा टीवी चैनलों पर बार-बार नाम प्रचारित होने से कोई इंसान महान कहलाने का अधिकारी हो जाता है? ओसामा बिन लादेन का प्रचार माध्यमों में खूब नाम उछला था... किन्तु क्या वह महान कहलाने का अधिकारी बन सका था? सही अर्थों में सभ्य समाज में महान कहलाने का अधिकारी वही है. जिसके कार्य ’बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ हों।
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बलशाली होने से कोई...........बड़ा नहीं बन जाता।
धन-दौलत से नहीं बड़प्पन का किंचित भी नाता॥
बड़े वही इंसान कि जो... करते सब पर उपकार हैं।
हम सब एक तरह के पंछी जग करते गुलजार हैं॥
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डॉ. डंडा लखनवी

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