मेरा इष्ट कौन है ? मैं कैसे अपने इष्ट को जानू ? क्या सबके इष्टदेव हैं एक ?

मेरा इष्ट कौन है ? मैं कैसे अपने इष्ट को जानू ? क्या सबके इष्टदेव हैं एक ?
एक ऋषि थे। मध्याह्न-संध्या से निवृत्त होकर भोजन करने बैठे। तभी एक याचक भिक्षुक कहीं से आ गया। वह दो दिन से भूखा था। उसने जब ऋषि को भोजन करते देखा तो उसकी भूख भी प्रबल हो उठी। उसने विनम्र भाव से भोजन की याचना की। ऋषि के पास अपना पेट भरने के लिये ही कम था, उसके मन में दूसरों के प्रति पीड़ा को समझने का भाव भी कम था, सो उन्होंने देने से मना कर दिया।

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भिक्षुक ने कहा, 'देव! आहार न सही, आप कृपा करके मुझे कुछ ज्ञान ही देने की कृपा करें। मैं दो दिन का भूखा हूं। शरीर कमजोर हो चला है। इसलिये मैं अधिक देर यहाँ खड़ा न रह सकूंगा। आप भोजन करें, उसके साथ ही मेरी कुछ जिज्ञासाओं का समाधान करते चलें तो बड़ी कृपा होगी।'



ऋषि राजी हो गये। भिक्षुक ने अति नम्रतापूर्वक पूछा, 'देव! आप किस देवता की उपासना करते हैं ?' उन्होंने उत्तर दिया- 'मैं उन देवता की उपासना करता हूँ, जिन्हें हम सब प्राण कहते हैं। उन्हीं के कारण यह जगत अस्तित्व में है।' भिक्षुक ने अगला प्रश्न पूछा- 'यह प्राण क्या है और आप उसकी कैसे उपासना करते हैं ? मैं इस बारे में अधिक गहराई से जानता नहीं हूँ, कृपया स्पष्ट करें।'



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कुछ रुककर उन्होंने भिक्षुक को बताया, 'प्राण सर्वव्यापक है। वह एक ही सब में उपस्थित रहता है। हम जो कुछ करते हैं, इसी इष्टदेव के लिये करते हैं और इसी की कृपा से करते हैं।'भिक्षुक मुस्कराने लगा और कहा, 'तब तो आपका इष्टदेव मेरे भीतर भी व्याप्त है और वही इस समय भिक्षुक बनकर आपके सम्मुख खड़ा है। ऐसे में आप अपने ही इष्टदेव का अपमान कैसे कर सकते हैं ? कृपया इसे स्पष्ट करें।'  

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ऋषि का ग्रास हाथों में ही रुक गया। वे गम्भीर चिंतन में डूब गये। उन्हें लगा कि जो कुछ भी भिक्षुक ने कहा है वह बिलकुल सत्य है। वह इस सत्य से अनजान कैसे रह गया। उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ। अपनी भूल को सुधारते हुए उन्होंने भिक्षुक से क्षमायाचना की और बचे हुए शेष भोजन को भिक्षुक के हाथ में देते हुए वे बोले, 'अब मैं समझ गया हूं, तुम्हीं इष्टदेव हो, आओ इस भोजन को मिलकर खाओ।' भिक्षुक और ऋषि ने मिलकर भोजन किया। उस समय ऋषि को भोजन करने में अपने इष्टदेव को प्रत्यक्ष में देख लिया था। 



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इष्ट देव दरअसल हमारी भावनाओं में छिपे हुए हैं| इष्ट देव को ढूंढने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है| अदृश्य रूप से हमारे इष्ट हमारे साथ मौजूद हैं| दरअसल जब हमने जन्म लिया था तभी हमारे इष्ट तय कर दिए गए थे| जीवात्मा जगत में मौजूद उच्च स्तरीय आत्माएं हमारे आत्मिक प्रियजन जो चेतना की उत्कृष्ट अवस्था में है वही हमारे मार्गदर्शक बनाए जाते हैं| वही हमारे इष्ट हैं| उन्हें पूजने की जरूरत नहीं है बस उन्हें दिल से पुकारने की जरूरत है वह हमेशा हमारे साथ हैं|


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