शिवजी के नंदी के कान में मनोकामना क्यों कही जाती है -दिनेश मालवीय

शिवजी के नंदी के कान में मनोकामना क्यों कही जाती है
नंदी शिव को इतने प्रिय क्यों हैं

शिवजी से नंदी को अनेक वरदान प्राप्त हैं

उज्जैन में नंदी की खड़ी मुद्रा में विषम में एकमात्र प्रतिमा

-दिनेश मालवीय

dineshहम सभी ने देखा होगा कि देवाधिदेव भगवान् शिव के हर मंदिर में उनकी लिंग विग्रह के सामने नंदी की प्रतिमा अनिवार्य रूप से होती है. हम देखते हैं कि लोग शिवजी के दर्शन करने जाने से पहले उनके वाहन नंदी के चरणस्पर्श करते हैं और उनके कान में अपनी मनोकामना कहते हैं. यह बड़े आश्चर्य की बात लगती है कि सीधे भगवान् भोलेनाथ से अपनी मनोकामना सीधे नहीं कहकर उसे नंदी के माध्यम से उन तक पहुँचाया जाता है. नंदी की पूजा के बिना शिवजी की पूजा अधूरी मानी जाती है. नंदी धर्म के प्रतीक हैं नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक भी हैं.

इस विडियो में हम भोलेनाथ के वाहन नंदी के विषय में चर्चा करेंगे. नंदी भगवान् शिव को बहुत प्रिय हैं. हमारे धर्म में हर महत्वपूर्ण बात और घटना के पीछे कोई कथा होती है. हमारे धर्म में सभी देवताओं की विशेष पूजा के दिन भी निर्धारित है. शिवजी की पूजा के लिए सोमवार का दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. कहते हैं कि सोमवार को शिवजी की सच्चे मन से पूजा करने पर कष्टों से मुक्ति मिलती है और मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. शिवजी की पूजा में कुछ बहुत सामग्री और विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती. उनका स्वाभाव इतना भोले है कि वह भक्त की भावना भर से प्रसन्न होकर उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरा कर देते हैं. इसीलिए उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है. उनके भोलेपन का अनेक दैत्यों ने अनुचित लाभ भी उठाया है, लेकिन उनका स्वभाव कभी नहीं बदला.

शिवजी 
पुराणों के अनुसार शिलाद नाम के एक महान ऋषि थे. वह ब्रहमचारी तो थे, लेकिन उन्हें  यह डर सताने लगा कि उनकी मृत्यु के बाद उनका वंश समाप्त हो जाएगा. उन्होंने संतान की कामना से भगवान् शिव की आराधना की. भोलेनाथ ने उनके तप से प्रसन्न होकर उनको पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दे दिया.

दूसरे ही दिन ऋषि को खेत में हल चलाते हुए एक बहुत सुन्दर शिशु मिला, जिसका जन्म कुछ ही देर पहले हुआ था. शिलाद्जी बच्चे को आश्रम ले आये. उन्होंने शिशु का नाम नंदी रखा. उन्होंने शिशु का पिता के समान उसका पालन-पोषण किया. उसे शिक्षा दी. कुछ वर्ष बाद मित्र और वरुण नाम के दो ऋषि  उनके आश्रम में पधारे. उन्होंने शिलाद ऋषि को बताया कि शिशु की आयु बहुत कम है और वह बहुत कम उम्र में मर जाएगा. यह जानकार नंदी ने अपनी लम्बी आयु के लिए वन में जाकर शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की.  भगवान् शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया कि तुम अजर-अमर रहोगे, तुम्हें मृत्यु का भय नहीं होगा और कोई भी दुःख कभी तुमको नहीं सताय्गा. नन्दी ने वरदान माँगा कि वह हमेशा उनके सानिध्य में रहे. शिवजी ने उसे बैल का चेहरा देकर अपना गण बना लिया. उन्होंने उसे अपना वाहन भी बना लिया. इसी पर सवार होकर शिवजी तीनों लोकों का भ्रमण करते हैं.

शिवजी 
शिवजी

देवताओं और असुरों द्वारा समुद्रमंथन किया गया, जिसमें अन्य चीजो के साथ विष भी निकला. नंदी ने भी स्वामीभक्ति के वशीभूत उस विश का पान किया था. इसके बाद से वह शिवजी के सबसे प्रिय हो गये. उन्होंने नंदी को अपना सबसे बड़ा भक्त होने की प्रतिष्ठा दी.शिवजी ने माता पार्वती की सम्मति से सभी गणों, गणेशों और वेदों की उपस्थिति में नंदी का अभिषेक करवाया. नंदी का विवाह मारुतों की पुत्री सुयशा के साथ हुआ.

शिवजी ने नंदी को वरदान दिया कि जो भी भक्त तुम्हारे कान में अपनी मनोकामना व्यक्त करेगा, उसे मैं अवश्य पूरी करूँगा.

shivji nandi
भगवान् शिव के के साथ नंदी के इतने अन्तरंग और घनिष्ट सम्बन्ध के कारण ही शिवजी के मंदिर में उनके विग्रह के सामने नंदी की प्रतिमा अवश्य प्रतिष्ठित की जाती है. शिवजी तो हमेशा ध्यान में मग्न रहते हैं. उनकी अखंड समाधि लगी रहती है. नंदी यह सुनिश्चित करते हैं कि शिवजी के ध्यान में किसी भी तरह की बाधा नहीं पड़े. इसलिए भक्तों की मनोकामना नंदी ही उन तक पहुंचाते हैं.

नंदी हर जगह शिवजी के समक्ष हमेशा बैठी मुई मुद्रा में रहते हैं. उज्जैन में एक मात्र मंदिर है, जहाँ नंदी खाड़ी हुयी मुद्रा में मिलते हैं. इसके पीछे भी एक बड़ी सुन्दर कथा है. यह प्रतिमा भगवान् श्रीकृष्ण की पाठशाला संदीपनी आश्रम मंदिर के परिसर में स्थित पिंडेश्वर शिव मंदिर में है. मान्यता है कि जब श्रीकृष्ण आश्रम में आये तो उन्होंने उज्जैन के राजा भगवान् श्रीमहाकालेश्वर उनसे मिलने पधारे. तब गुरु के सम्मान में नंदी खड़े हो गये.

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