शुभ कार्य मध्यमा अँगुली से ही क्यों! -दिनेश मालवीय

शुभ कार्य मध्यमा अँगुली से ही क्यों!

-दिनेश मालवीय

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों और अन्य ज्ञानवान बुजुर्गों ने जीवन में प्रत्येक कार्य के लिए कुछ विधि-निषेध निर्धारित किये हैं. किसी भी कार्य में जब नियमों और कायदों का पालन किया जाता है, तभी उसके वांछित परिणाम मिलते हैं. ऐसा ही एक नियम यह बताया गया है कि शुभ कर करते समय मध्यमा अँगुली का ही प्रयोग करना चाहिए.

आजकल बहुत बौद्धिक लोग इस पर सवाल उठा सकते हैं कि शुभ कार्य किसी भी अँगुली से किया जाए तो क्या हर्ज है? लेकिन वे ऐसा इसलिए कह सकते हैं, क्योंकि उन्हें इसके पीछे के विज्ञान का पता नहीं है.

इसका कारण यह है कि मध्यमा अँगुली की नस का ह्रदय से सीधा सम्बन्ध है. ह्रदय को सात्विक भावों से भावित करने के लिए ही यह विधान किया गया है. इससे ह्रदय में स्थित ईश्वर को प्रसन्न होते हैं. अन्य सात्विक कार्य भी इसी अँगुली से किये जाते हैं.

इसके विपरीत तमोगुणी कार्यों में तर्जनी अँगुली का प्रयोग किया जाता है. जब हम किसी बालक का तर्जन करते हैं अर्थात डाँटते हैं, तो उसे तर्जना अँगुली दिखाते हैं. इसीलिए इसका यह नाम पड़ा है. हर अँगुली के साथ ही हर पदार्थ का भी अलग-अलग प्रभाव होता है. विभिन्न पदार्थों की माला भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि के लिए भिन्न-भिन्न पदार्थों की माला का विधान किया गया है. विभिन्न कार्यों की सिद्धि के लिए अलग- अलग अँगुलियों से माला फेरने का विधान है. इन सबके पीछे कोई विज्ञान है. लेकिन सात्विक कार्यों के लिए सिर्फ मध्यमा अँगुली के उपयोग का ही विधान है.

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