तीर्थयात्रा क्यों करें?क्या इससे होता है कुछ लाभ?

किसी भी विषय में हमेशा दो तरह की अलग-अलग धारणाएं होती हैं. प्रसंग और सन्दर्भ के अनुसार दोनों धारणाएं अपनी-अपनी जगह सही होती हैं. हाँ, इतना जरूर है कि पूरे और सही सन्दर्भ में न समझे जाने पर किसी एक धारणा को ही लोग पकड़ कर बैठ जाते हैं.

तीर्थयात्रा को लेकर भी हमेशा से दो विचार रहे हैं. कुछ लोग मानते हैं कि जीवन में यथासंभव अधिक से अधिक तीर्थ-स्थलों पर जाना चाहिए. इसके विपरीत यह कहावत भी खूब चलती आ रही है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा. यानी मन को पवित्र रखो तो ख़ुद में ही तीर्थ है.

आइये, हम तीर्थयात्रा क्यों और कैसे की जाये और इसके क्या फल होते हैं, इस पर चर्चा करते हैं. तीर्थ दो तरह के होते हैं-स्वाभाविक और मानव द्वारा निर्मित. गरमी की वजह से होने वाली बीमारियों से राहत पाने के लिए जो स्थान ठंडे क्षेत्र में हैं, उन्हें स्वाभाविक तीर्थ कहा जाता है. इसके अलावा भूमि के अद्भुत प्रभाव से जिस जगह क्रोध आदि मानसिक रोगों को दूर करने में मदद मिले, उन्हें भी स्वाभाविक तीर्थ कहा जाता है.

 

जो स्थान शांत हैं और जो लम्बे समय तक महापुरुषों द्वारा साधना के कारण पवित्र हो गये हैं, उन्हें मानव-निर्मित तीर्थ कहा जाता है. आधुनिक भौतिक विज्ञान भी इस बात को मानता है कि जिस जागे पर लम्बे समय अच्छे और बुरे कार्य किये जाते हैं या अच्छे और बुरे शब्द बोले जाते हैं, उस पर उनका असर होता है. वहाँ जाने वाले लोगों को वे उसी तरह प्रभावित भी करते हैं.

क्यों जाना चाहिये तीर्थ-यात्रा पर

ज़िन्दगी के खटराग में उलझे व्यक्ति के जीवन में जड़ता और नीरसता आने लगती है. वह गोरखधंधे में ही उलझकर रह जाता है. उसे कुछ समय के लिए इससे दूर रहकर कुछ नया देखने और अनुभव करने की इच्छा होती है. तीर्थ स्थानों पर जाकर उसे एक नया वातावरण और परिवेश मिलता है. ये स्थान प्राकृतिक कारणों और लम्बे समय तक पवित्र लोगों की साधना के कारण मन की शांति और शारीरिक स्वास्थ्य की ददृष्टि से भी बहुत फायदेमंद होते हैं. वहाँ आत्मिक शांति और चेतना को ऊँचा उठाने में तो मदद मिलती ही है, साथ ही राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता, प्राकृतिक सौन्दर्य और विभिन्न जीवनशैलियों को देखने का मौका मिलता है. भारत में चारों दिशाओं में चार सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं- बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वरम और द्वारका धाम. इन जगहों पर पवित्र साधु-संतों के दर्शन होते हैं और यात्री को भगवान का भजन करने तथा अच्छे कर्म करने की प्रेरणा भी मिलती है. प्राचीन मंदिरों में दर्शन-प्रशाद का लाभ भी मिलता है. इसलिए व्यक्ति को अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय निकाल कर समय-समय पर तीर्थ-सेवन अवश्य करना चाहिए.

क्या है तीर्थ-यात्रा का सही तरीका? मुंडन क्यों?

सिर्फ ट्रेन या बस में तीर्थ-स्थान पर चले जाना और वहाँ रहना ही पर्याप्त नहीं है. तीर्थयात्रा के लिए हमारे बुजुर्गों और संतों ने कुछ तरीके बताये हैं, जिनका पालन करके ही हम तीर्थयात्रा का पूरा फायदा ले सकते हैं. तीर्थयात्रा के दौरान मन ही मन ज्यादा से ज्यादा भगवान के नाम या गुरुमंत्र का जाप करते रहना चाहिए. मन को दुनियादारी की बातों से दूर रखा जाए.

कहते हैं कि मनुष्य के पाप उसके बालों पर आकर ठहर जाते हैं, लिहाजा तीर्थयात्रा में मुंडन का विधान किया गया है. मुंडन करवाते समय ऐसा भाव रखना चाहिए कि मेरे सब पाप बालों के साथ निकल रहे हैं.

तीर्थयात्रा के दौरान ज्यादा से ज्यादा सरलता और सादगी से रहना चाहिए. पैसे का लोभ न कर दान-धर्म खुलकर करना चाहिए. किसीसे मान-सम्मान पाने की इच्छा नहीं रखना चाहिए. सांसारिक जीवन में कई कारणों से कभी-कभी झूठ भले ही बोलना पड़ता है, लेकिन तीर्थयात्रा में बिलकुल झूठ न बोलें. किसीसे कडवे वचन न कहें. अपमान होने पर भी कोई प्रतिक्रिया न देकर अपमान करने वाले को मन से क्षमा कर दें. किसी भी तरह के व्यसन से परहेज करें. पण्डे-पुजारियों पर किसी भी कारण से नाराज न हों. उनके व्यवहार में कोई दोष भी लगे तो यह मानें कि आपने धैर्य की परीक्षा के लिए यह ईश्वर की इच्छा से हो रहा है. भक्तों की पंक्ति में लगकर ही दर्शन करें. सबकुछ ईश्वर को निवेदित करके ग्रहण करें. तीर्थ में किसी भी पाप से बचना चाहिए. तीर्थस्थल पर किये गये पाप हजारों गुना बुरा परिणाम देते हैं. इन नियमों को अपनाने से तीर्थयात्रा का भरपूर फल मिलेगा.

इसके अलावा, तीर्थयात्रा में आपने जिस आचरण और नियमों को अपनाया हो, लौटकर अपने जीवन में भी उसका यथासंभव पालन करें. पुराने ज़माने में तीर्थयात्रा से लौटकर लोगों का जीवन बदल जाता था. आज ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि तीर्थयात्रा पर्यटन की तरह की जाती है. तीर्थ में जितने कष्ट उठाये जाते हैं, उतना ही मन पवित्र होता है, जो जीवन का परम लक्ष्य है.

इसलिए जीवन की व्यस्तताओं से समय निकाल कर तीर्थ-सेवन ज़रूर करें. इसके लिए बुढ़ापे का इंतज़ार न करें. यह धारणा गलत है कि तीर्थयात्रा तो बुढ़ापे का काम है. कठौती में गंगा वाली बात किसी अलग सन्दर्भ में सही है. लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि तीर्थयात्रा नहीं की जाए.

 


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