अयोध्या भारत की राजधानी क्यों?

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मैंने कुछ दिन पहले अयोध्या जी को भारत की राजधानी बनाने की बात कही थी| कल फिर मैंने यही बात कही| मिश्रित प्रतिक्रियाएं मिलीं| मेरा यह विचार मस्तिष्क का आकस्मिक स्फुरण था लेकिन विचारणीय लगा| इस कल्पना के पीछे कुछ ऐतिहासिक, भावनात्मक तथ्यों का मजबूत आधार है|

श्रवण कुमार अपने माता-पिता को घुमाते हुये एक जगह रात्रि विश्राम के लिए रुके| अक्समात वे वहां अपने माता-पिता से दुर्वाद करने लगे| उनके माता-पिता भी श्रवण कुमार के इस आचरण से भौचक्के थे| प्रातः जब चलने लगे तो श्रवण कुमार ने पिता के कहने से वहां की मिट्टी साथ रख ली| अगले रात्रि विश्राम तक श्रवण कुमार का व्यवहार स्वाभाविक था| उनके पिता ने विगत रात्रि के व्यवहार की उनको याद दिलायी लेकिन श्रवण ने अनभिज्ञता व्यक्त की| उनके पिता ने पिछले स्थान की मिट्टी जमीन पर बिछवा कर श्रवण से उस पर खड़े होने को कहा| खड़े होते ही श्रवण अपने माता-पिता से दुर्वाद करने लगे| ये था भूमि का प्रभाव|

अयोध्या हजारों वर्ष तक इक्ष्वाकु वंश की राजधानी रही जिसमें एक से एक प्रतापी त्यागी, तपस्वी, भगीरथ और राम जैसे कालजयी राजा हुये, वशिष्ठ वाल्मीकि, जाबाल जैसे विद्वान हुये| इसके विपरीत इन्द्रप्रस्थ जैसी विलासिता पूर्ण राजधानी द्यूतक्रीड़ा प्रेमी राजुपुरुषों के कारण भीषण युद्ध महाभारत की आधारशिला बनी| यहां जिसने भी राज्य किया वह खूनी संघर्षों, उठापटक का शिकार बना| सैकड़ों राजे रजवाड़े आये लेकिन स्थायी, सुखी नहीं हुये| खुद मुगल जब तक आगरा में रहे महफूज रहे लेकिन दिल्ली में सिमट गये| अंग्रेजों की भी यही कहानी रही और पिछले 70वर्षों से हमारा देश क्षुद्र स्वार्थी, टुच्चे लोगों की साक्षी है| आज की दिल्ली विसंगतियों बिडंबनाओं का समुच्चय है| जो दिखाई दे रहा है वह अशांति, संघर्ष है| यही राजधानी विभाजन की गवाह है और यही राजधानी आगामी विभाजन की रूपरेखा रच रही है|

कहां त्यागी, संयमी, तपस्वी, प्रतापी राजाओं की राजधानी| जहां रामराज्य साकार हुआ| जिसकी कल्पना और इच्छा हर शासक करता है और कहां द्यूत छल, छिद्र स्वार्थ, अय्याशी,धोखा,हत्या अनाचार की धरती दिल्ली| ये जन्म से अभिशप्त है| लाक्षागृह से जान बचाकर लौटे पांडवों ने खाण्डव वन को जलाकर इन्द्रप्रस्थ की रचना की| आग से निकला इन्द्रप्रस्थ ,आग से निकली द्रौपदी उसकी पटरानी आग से तिलमिलाना इन्द्रप्रस्थ| बनाया जिसे उस मय राक्षस ने खांडव वन जिसका निवास था और अपने जले हुये निवास पर दूसरे का महल कोई प्रसन्न होकर तो करेगा नहीं| उसकी बददुआयें भी उसमें लगी थीं जो आज भी दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले के साथ पूरे देश को जला रही हैं,जलायेंगी| एक और बात --अयोध्या सूर्य की पहली किरण के साथ सिर्फ भारत नहीं पूरे विश्व की राजधानी बनी और बनाया स्वयं मनु ने, लाखों वर्षों की पुष्पित पल्लवित मानवता की जन्मस्थली| पूरे विश्व की आदि राजधानी अयोध्या|

इन विचारों के आलोक में इस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है| यदि राम जैसा कोई दूसरा राजा नहीं हुआ तो अयोध्या जैसी दूसरी कोई राजधानी भी नहीं हुई| यदि रामराज्य आना है तो अयोध्या जी को राजधानी होना है| ये राम की अवतरण और लीलास्थली है| यहीं बैठकर हम विश्वगुरु थे| फिर जब राम का कोई अंश यहां बैठेगा हम फिर विश्वगुरु होंगें |


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