तुलसी का इतना महत्त्व क्यों? -दिनेश मालवीय

तुलसी का इतना महत्त्व क्यों?

-दिनेश मालवीय

अक्सर हमारे पूर्वजों की व्यवहारिक समझ पर बहुत आश्चर्य होता है. उन्होंने हमारे लिए गुणकारी चीजों को धर्म-अनुष्ठान और पूजा से इस तरह अभिन्न रूप से जोड़ दिया है, कि हम सहज ही उनका उपयोग कर लाभ लेते रहते हैं. हमें पता भी नहीं चलता कि इन चीजों के उपयोग से हमें क्या लाभ हो   रहे हैं. ऎसी ही वस्तुओं में तुलसी भी शामिल है.

पौराणिक कथाओं के माध्यम से यह बात जन-जन के मन में प्रतिष्ठित कर दी गयी कि तुलसी के बिना भगवान का भोग अधूरा है. विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण, स्कंदपुराण, देवीभागवत आदि में तुलसी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक कथाएं मिलती हैं. आप मंदिरों में जाइए, वहाँ आपको जो  चरणामृत दिया जाता है, उसमें तुलसी मिली होती है. स्कंदपुराण और पद्मपुराण के अनुसार जिस घर में तुलसी का पौधा होता है, वह घर तीर्थ के समान होता है. देवप्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी के साथ शालग्राम के विवाह का अनुष्ठान किया जाता है.

आखिर ऐसा क्यों किया गया? तुलसी का इतना अधिक महत्त्व क्यों है कि उसे विष्णुप्रिया तक कहा गया है. इसके गुणों पर विचार करने पर हमारे पूर्वजों की समझ और ज्ञान के प्रति हमारा सिर सहज ही श्रद्धा से झुक जाता है.

आयुर्वेद के अनुसार लगभग सभी बीमारियों में आवश्यकता के अनुसार तुलसी का यथाविधि प्रयोग किया जा सकता है. मकरध्वज या तुलसी औषधियों में प्रमुख हैं. तुलसी लगभग बाइस प्रकार की होती हैं. लेकिन इनमें मुख्य कृष्ण तुलसी, श्वेत तुलसी, गंध तुलसी, राम तुलसी, वन तुलसी, बिल्वगंध तुलसी और बर्बरी तुलसी प्रमुख हैं.

तुलसी को सभी रोगों की हरने वाली कहा गया है. इसी कारण हर घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाने का सुझाव दिया गया है. इसकी गंध से मलेरिया के मच्छर नहीं आते. इसके पौधे में तेज विद्युत् शक्ति होती है, जो पौधे के चारों तरफ दो सौ गज तक रहती है. यह पित्तनाशक है. शुक्ल और कृष्ण दोनों तुलसी गुणों में समान हैं. इसी कारण तुलसी की माला भी पहनी जाती है.

तुलसी को परम पवित्र पौधों में शामिल कर इसके पत्ते तोड़ने की भी विधि बतायी गयी है. यदि तुलसी के पत्ते को तोड़ा जाए तो उसकी मंजरी और पास के पत्ते तोडना चाहिए, जिससे पौधे में अच्छी वृद्धि हो. यदि पत्त्तों में छेड़ दिखाई देने लगें तो कंडों की राख का कीटनाशक औषधियों के रूप में प्रयोग किया जा सकता है. इसके पत्तों को दांतों से चबाने का निषेध है, क्योंकि इसमें पारा होने के कारण दंतशूल हो जाता है. इसे निगला जाना चाहिए.

तुलसी शारीरिक व्याधियों में तो लाभदायक है ही, यह मनुष्य के आतंरिक भावों और विचारों पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है. ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि तुलसी की पत्तियों का दही या छाछ के साथ सेवन करने से वजन कम होता है और चर्बी घटती है. थकान भी मिटती है. रक्तगण भी बढ़ते हैं. ब्लडप्रेशर और पाचनतंत्र के नियमन में भी तुलसी का प्रयोग लाभदायक होता है. मानसिक रोगियों को भी इसके प्रयोग से राहत मिलती है. भूख कम लगती हो या कब्ज रहता हो या फिर गैस कीई शिकायत हो तो तुलसी का सेवन बहुत उपयोगी है.

बच्चों को सूर्य-नमस्कार करवाने के साथ तुलसीपत्र देने से उनकी बुद्धि प्रखर होती है. हर रोज खाली पेट पानी के साथ तुलसी की पांच -सात पत्तियों का सेवन करने से बल, तेज और याददाश्त बढ़ती है. तुलसी के काढ़े में थोड़ी शक्कर मिलाकर पीने से फुर्ती आती है और थकावट दूर होती है. तुलसी की पत्तियों को नीबू के रसे में पीसकर लगाने से दाद-खाज मिट जाती है.

तुलसी के बारे में तो किताबें भी लिखी गयी हैं, लेकिन फिर भी उसके सभी गुणों को पूरी तरह नहीं लिखा जा सका है. फिर अधिक जानने की जरूरत भी क्या है? बस अपने घर के आँगन में और यदि आँगन न हो तो वरांडे में तुलसी का पौधा लगाइए. सुबह शाम इसमें जल दीजिये. शाम को तुलसी के पास दिया जलाइये औ इसकी परिक्रमा कीजिए. आपके बिना जाने ही इससे आपको बहुत से लाभ मिल जायेंगे.


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