श्रीकृष्ण मनोहारी क्यों हैं? क्या है जीवन की शास्वत सच्चाई

श्रीकृष्ण मनोहारी क्यों हैं? क्या है जीवन की शास्वत सच्चाई



जन्म के साथ शिशु की खिलखिलाहट से जीवन की कहानी शुरू होती है और मृत्युपर्यंत समाप्त हो जाती है। जन्म मृत्यु को घटनाएं प्रायः प्रत्येक व्यक्ति देखता है, परंतु जीवन और मृत्यु को शाश्वत सच्चाई को जानने का अंकुर किसी-किसी में फूटता है। राजकुमार सिद्धार्थ ने जीवन की सच्चाई को समझा था, अंकुर का प्रादुर्भाव उनके जीवन में हुआ था, उनका जीवन प्रस्फुटित हुआ था।



राजकुमार सिद्धार्थ ने जब एक धनुष की तरह झुकी कमर वाले वृद्ध को देखा तो उन्होंने पूछा, यह व्यक्ति ऐसा क्यों है? सारथी ने उसे समझाया, राजकुमार सभी व्यक्ति जब बुढ़ापे की तरफ बढ़ते हैं तो ऐसे ही हो जाते हैं। एक बार एक लाश को ले जाते देखा फिर पूछा. यह व्यक्ति पर क्यों गया? अब इसका क्या होगा? सारथी ने समझाया, महाराज! सभी को मरना पड़ता है और इसके बाद शरीर को जला दिया जाता है। यह शरीर जलकर राख हो जाता है।

इन सब बातों को सुनने जानने के बाद पूर्वार्जित एवं पुरुषव्याधि के कारण इस व्यक्ति को वैराग्य हुआ घर त्याग दिया और विश्व में गौतम बुद्ध के नाम से विख्यात हुए।

न्यायकारी परमात्मा के नियमों में एक शाश्वत नियम जन्म मरण का भी है। क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण मनाहारी क्यों है? वह सबको क्यों भाते और खुद अर्जुन के सारथी बनकर अपनी इस बात को प्रमाणित करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन ! जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होती है, यह अटूट सत्य है, शाश्वत नियम है। इसीलिए तुम्हें मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए।

जन्म और मृत्यु की परिभाषा ऋषि कुछ इस प्रकार से करते है- शरीर के साथ आत्मा के संयोग का नाम जन्म और आत्मा का शरीर से वियोग का नाम मृत्यु है।

मनुष्य के जीवन में कई बार मौत आती है। विघटन आदि होते रहते हैं। केवल विघटन का नाम ही मृत्यु नहीं है। भर्तृहरि ने अपयश को मृत्यु माना है। अपयशो यद्यस्ति कि मृत्युना' अर्थात जब अपयश, अपमान, बेइज्जती हो तो मृत्यु की आवश्यकता अपयश स्वतः मृत्यु ही है।

महात्मा विदुर ने अधिक बोलना त्याग का अभाव, क्रोध करना अपना ही पेट पाने की चिंता, मित्र से द्रोह करना और गुणों में दोष देखने की आदत को साक्षात मृत्यु कहा

वेद में तो कहा गया है कि आपस में ही लड़ना मृत्यु को गले में डालना है। जीवन में कर्तव्य से मुख मोड़ लेना भी मृत्यु हो है। मनुष्य को मत्ये कहा जाता है, क्योंकि वह मरण धर्म है। मरण मृत्यु एक प्रकार से परमात्मा द बरदान है, क्योंकि जब यौवन को बहार से बुढ़ापे का पतझड़ आकर टकराता है तब संपूर्ण शरीर शिथिल हो जाता है। आंखों के सामने कोहरा सा छा जाता है। किसी को पहचानने में धोखा होने लगता है। हाथ पांव कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। इस अवस्था में मृत्यु द्वारा ही सुंदर नवीन शरीर मिलता है। यह भी बात कि बुढ़ापे की दुरावस्था को प्राप्त व्यक्ति को शरीर का मोह छूटना कठिन सा रहता है।

शंकराचार्य जी ने 'मोहमुदुगर' में ठीक ही कहा है। 

अंग गलितं, पलित मुंडं, दशन विहीनं जातं तुम्।। वृद्धो याति गृहीत्वा दंड, तदपि न मुच्चति आशापिंडम्।।

इसका सीधा सा मतलब यह कि अब प्रत्येक अंग गलि हो जाता है। सिर के बाल श्वेत हो जाते हैं, मुख दांतों से विहीन हो जाता है, जब बुढ़ापे का सहारा केवल एक डंडा रह जाता है, तब भी शरीर के प्रति जीवन के प्रति आशा बनी रहती है। यह सबसे बड़ा आश्चर्य माना गया है। पक्ष " के प्रश्न का उत्तर देते हुए युधिष्ठिर ने कहा था कि दिन प्रतिदिन श्मशान की तरफ मनुष्या को जाते देखकर जो यह सोचते हैं कि हमें यहीं रहना है, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है।

शास्त्र का तो शाश्वत सिद्धांत है कि जिनका संयोग हुआ है उनका वियोग भी होगा। जो दुखी हैं ये सुखी भी होंगे, जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु भी अवश्यंभावी है। इस सिद्धांत में कभी कोई फेरबदल नहीं होगा।

श्रीकृष्ण गीता (11/8) में उद्घोष करते हैं, हे पार्थ! तू मुझे अपने चर्म चक्षुओं द्वारा नहीं देख सकता। अतः मैं मुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूं, जिससे तू मेरे योग ऐश्वर्य युक्त स्वरूप का साक्षात् दर्शन कर पाएगा यह दिव्य चक्षु हमारे आध्यात्मिक हृदय अर्थात भृकुटि के मध्य स्थित है। केवल कृष्ण सदृश पूर्ण सतगुरु ही इस नेत्र को प्रकट कर सकते है। गुरुवाणी में भी इस तथ्य की स्पष्ट गूंज है 'सतिगुरि मिलिए दिच दिसटि होई।'

सुधांशु महाराज कहते हैं सतगुरु प्रदत्त इस दिव्य दृष्टि से एक शिष्य अपने अंतःकरण में ही परमात्मा तत्व का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है। उसके दिव्य स्वरूप का स्पष्ट दर्शन कर पाता है। फिर ईश्वर भ्रामक नहीं रहता, अपितु परम सत्य बनकर जीवन में अधिष्ठित होता है। अतः ब्रह्मशान (दिव्य दृष्टि द्वारा ब्रह्म का साक्षात्कार करना ही नास्तिकता का अमोघ उपचार है।

श्रीकृष्ण मनोहारी क्यों है?

वह सबको क्यों भाते हैं?

क्योंकि श्रीकृष्ण केवल कर्म करने का ही आहवान करते हैं और खुद अर्जुन के

सारथी बैनकर अपनी इस बात को प्रमाणित

करते हैं। कि हे अर्जुन! जिसका जन्म हुआ है

मृत्यु अवश्य होती हैं। यह अटूट सत्य नियम है।

इसीलिए तुम्हें मृत्यु पर शोक नहीं करना

चाहिए।
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