सुख की खोज मानव की सबसे बड़ी भूल क्यूँ है? P अतुल विनोद 

सुख की खोज मानव की सबसे बड़ी भूल क्यूँ है? P अतुल विनोद 

संसार में यही सबसे पुराना उपदेश है कि— यहाँ भोगसुख का अन्वेषण वृथा है। 

इस संसार में सुख का भोग सबसे बड़ा भ्रम है| यही हमारे सनातन धर्म का संदेश है| ऐसा क्यों कहा गया है किस सुख की चाह करना और  उसे हासिल करने के लिए पुरुषार्थ,खोज, तलाश, मेहनत, मशक्कत करना व्यर्थ है? 

दरअसल  सुख तलाश करने से नहीं मिल सकता| आप दुनिया में जिन लोगों को सुखी मानते हैं उनसे पूछिए? 

happyक्या सुख उन्हें तलाश करने से मिला?  जवाब देने वाला यदि अपने जीवन को गहराई से देखेगा तो उसे पता चलेगा कि सुख उसे स्वाभाविक रूप से मिल गया| दरअसल ये मिला नहीं ये तो पहले से ही मौजूद था| वो तो गम हो जाता है गलत परवरिश और थ्योरीज़ के आवरण चढने से| गरीब की झोपड़ी में मौजूद बच्च  भी उतना ही हसता है जीतना अमीर के महल में| लेकिन बड़े होते होते उसे अहसास कराया जाता है की उसे सुखी के लिए चीज़े चाहिए| यदि उसे ये सिखाया जाता की बेटा सुख तो तुम्हे मिला ही हुआ है तुम चाहो तो इन चीज़ों को हासिल करो नही तो नहीं| लेकिन तुम चीज़ों को अपने सुख का आधार मत बनाना| ज़्यादातर मामलों में सुखी होने वाला व्यक्ति चीज़ों को आसानी से आकर्षित कर लेता है| ना भी करे तो वो तो यूँही सुखी है| 

जिसे हम सुख मिलने का साधन, माध्यम मानते हैं दरअसल वो सुखी होने से मिलने वाली चीजें हैं| बात कुछ अजीब सी लग रही है| हम सुखी रहने के लिए कार, घर, अच्छी नौकरी, बिजनेस पैसे की उम्मीद करते हैं|  हम सोचते हैं कि ये सब चीजें मिलेंगी तो हमें सुख मिलेगा|  लेकिन सच्चाई इसके उलट है| ये सब चीजें दो स्थितियों में मिलती है खुद को सुखी मानने से या  कर्म फल के सिद्धांत के अनुसार जीवन के सतत प्रवाह से| 

जब हम सुखी हो जाते हैं तो सुख के साथ हमें बाकी चीजें बहुत आसानी से मिल जाती हैं|  क्योंकि सुख के लिए हम इन चीजों के मोहताज नहीं हैं|  इसलिए हमारी नजर में इनकी कोई कीमत नहीं है जब हमारी नजर में उनकी कोई कीमत नहीं है तो ये हमें बिना मूल्य चुकाए मिल जाती हैं| जब हम दुखी होते हैं और इन चीजों के अभाव से परेशान होते हैं|  तो यह चीजें मिलने की वजाये और दूर चली जाती हैं|

हम सोचते हैं कि सुख के लिए यह चीजें जरूरी हैं… इसलिए हम इनके पीछे भागते हैं हम इनके पीछे जितना भागते हैं यह हम से उतना ही दूर होती चली जाती है|  क्योंकि हमारी नजर में इनका मूल्य बहुत ज्यादा है| सुख की कोई कीमत नहीं है सुख अनमोल है| और यदि हम यह मान ले कि एक बाइक या कार खरीदने से ही हमें सुख मिलेगा तो बाइक और कार की जो वास्तविक कीमत है हमारे लिए उसकी कीमत उससे भी कई गुना ज्यादा हो जाएगी| प्रकृति हमारी आमदनी को उन चीजों के खरीदने के स्तर से काफी कम देगी|

कुछ लोगों को यह साधन, संसाधन जीवन के प्रवाह में सहज रूप से प्राप्त हो जाते हैं| उन्हें तलाश करने की जरूरत नहीं है| वह पैदा ही ऐसे घर या माहौल में होते हैं जहां यह चीजें सहज सुलभ हैं| किसी को  कर्म-फल के नियम के चलते भोग विलास की चीज़े बिना कोशिश के मिलती रहती हैं| 

दोनों ही अवस्था में सुख की तलाश व्यर्थ है और सुख के लिए चीजों के पीछे भागना तो और ज्यादा मिथ्या है| मान लीजिए कि आपको कर्मफल के कारण यह चीजें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुयी|  तब आप इन चीजों के लिए  बहुत ज्यादा मत भागिये|अपना कर्म करते रहिए किसी न किसी दिन यह सारी चीजें आपको मिल जाएंगी| सुख चीजों के लिए होल्ड करके मत रखिए कि यह जब मिलेंगे तभी आप सुखी हो पाएंगे| सुखी होना तो आपके हाथ में है अपने आप को बेवजह के बाहरी दबाव, इच्छाओं और प्रतिबंधों से मुक्त कर दीजिए आपका सहज, सुखी, स्वरुप बाहर आ जाएगा| 

आपने अपने बच्चे को एक खिलौना दिया, उस बच्चे ने तभी एक और खिलौने को दिलाने की जिद पकड़ ली|वह रोने लगा| क्या आप उसे चुप कराने के लिए उसे दूसरा खिलौना भी दिला देंगे? शायद आप उसे चुप होने के लिए कहेंगे|  

आप उससे कहेंगे कि बेटा जो खिलौना आपको दिया गया है पहले उससे खेलो… जब यह टूट जाएगा तब आपको दूसरा दिलाया जाएगा| 

ऐसे ही भगवान हैं|भगवान कहते हैं कि जो चीजें आपको दी हुई है पहले आप उनसे सुखी हो जाईए|  जब आप जो मिला है उसके लिए कृतज्ञ हो जायेंगे| या आप सामान  न होने के बाद भी खुश रहना सीख जाएंगे तो फिर आपके पास चीजें अपने आप आने लगेंगी|यही ईश्वर का नियम है यदि आपने चीजों को सुख का आधार बनाया तो चीजें नहीं मिलेंगी| लेकिन यदि आपने सुख को अपना सहज स्वभाव बनाया तो चीजें अपने आप आपके पास आने लगेगी| 

परमात्मा की  नजर में चीजों का महत्व नहीं है|  परमात्मा चाहता है कि जो बेशकीमती जीवन हमे दिया है पहले उसको समझ लें| उसने हमे उतनी ही सांसे दी है जितनी दुनिया के किसी सबसे अमीर व्यक्ति को दी है|   उसने हमे पेट भरने के लिए भोजन, पानी और प्रकाश  कि उसी मात्रा में व्यवस्था की है जिस मात्रा में उसने दुनिया के किसी सबसे शक्तिशाली या धनवान व्यक्ति के लिए की है|  

पैसे के दम पर भले ही व्यक्ति टेस्ट को कम ज्यादा कर ले| लेकिन किसी अमीर व्यक्ति के शरीर और किसी मजदूर के शरीर में आप बहुत ज्यादा अंतर नहीं पाएंगे| हो सकता है कि मजदूर का शरीर ज्यादा स्वस्थ हो क्योंकि वह भोजन के रूप में ज्यादा नेचुरल आहार लेता है, उसे मेहनत करके पचाता है| वो ज्यादा प्रकाश ग्रहण करता है| वह खेतों, जंगलों में ज्यादा अच्छी ऑक्सीजन लेता है| इसलिए अमीरों  ज्यादा अच्छी तरह पोषित होता है|

जो चीजें जिंदगी के लिए सबसे महत्वपूर्ण है जैसे भोजन, पानी, प्रकाश, वायु, अग्नि| परमात्मा सबको बराबर मात्रा में देता है| और वह यही उम्मीद करता है कि इन चीजों की कीमत पहचान लो| इनके मिलने पर ही प्रसन्न, सुखी और कृतकृत्य हो जाओ| बाकी चीजें अपने आप में मिलने  लगेगी| 

व्यक्ति ध्यान समाधि भी लगता है तो वो सवितर्क होती है| वितर्क यानी इच्छा या प्रश्न और स का मतलब है साथ| उस गहन ध्यान में भी उसे कुछ पाने की इच्छा होती है| ज्यादातर सिद्धियां पाने की चाह| सिद्धि की इच्छा भी भोग के लिए होती है| सिद्धियों से व्यक्ति और ट्रैप हो जाता है| यदि वह इन सिद्धियों का प्रयोग करके साधनों को बढ़ाले तब भी सुखी नहीं हो सकेगा| आखिर में ये भोग और दुखी करेंगे| 

जो व्यक्ति जितना ज्यादा संसार बढ़ाता है उसकी तकलीफ भी वही जानता है| एक व्यक्ति बड़ी फैक्ट्री या कंपनी का मालिक है तो उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है वह उतना ही परतंत्र है उसके ऊपर एक नहीं अनेक परिवारों के पालन पोषण का जिम्मा होता है उसके कर्ज भी उतने ही बड़े होते हैं| उसे सबकुछ मेंटेन करने के लिए उतनी ही अशांति झेलनी पड़ती है| उसका पूरा जीवन बटोरने और फिर उसे सहेजने में लग जाता है| जो व्यक्ति इस बात को समझ लेता है वो मुक्त हो जाता है| प्रलोभन से मुक्त व्यक्ति ही मुक्त है|

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