क्या सभी कथित धर्म, मत, संप्रदाय खत्म करने से भारत समस्या मुक्त हो सकेगा?

अतुल विनोद

भारतीयों की परेशानी का कारण उनकी आस्था, धर्म, मत, संप्रदाय या पंथ से जुड़ाव नहीं है| बल्कि भारतीयों में थोड़ी बहुत एकता और सद्भावना के पीछे यही सब  है| इनकी शिक्षाएं लोगों को जोड़ने की कोशिश करती है| लेकिन इनके ठेकेदार लोगों को तोड़ने की कोशिश करते हैं| 

धर्म को खत्म नहीं किया जा सकता  हाँ धर्म के उपर चस्पा लेबल हटाए जा सकते हैं| धर्म कि बजाये धर्म का उपर चढ़े नाम खतरनाक हैं| धर्म अपने आपमें सम्पूर्ण है उसे किसी हिन्दू या मुस्लिम रुपी नाम कि ज़रूरत नहीं वह तो सनातन है | सम्प्रदायों को खत्म करके सबको मूल धर्म पर लाने से कुछ हद तक एक नई मानवीय क्रांति को जन्म दिया जा सकता है|

समस्या की  मूल वजह भारतीयों के अंतर में ज़मी  प्रवृत्तियां भी हैं| सदियों से भारतीयों ने जो गुलामी का दौर देखा है वह भारतीयों के जीन्स में रच बस गया है| पिछले 2000 साल में राजा, महाराजाओं, मुगलों, जमीदारों, पटेलों और रसूखदारों ने जिस तरह से भारतीय मानस का दमन किया है| मनमर्जी चलाई है| उससे अधिकांश भारतीयों के अंतरतम में इस तरह की भी हीनता,दमन,अतृप्ति के भाव जड़ें जमा चुके हैं| एक मानव में शरीर में उसकी कई पीढ़ियों के अनुभव व् संस्कार होते हैं| सदियों से महिलाये दमित होती रहीं,  दमन व हिंसा का शिकार स्त्री जब माँ बनी तो गर्भ में मौजूद शिशु में उसके भाव आना स्वाभाविक थे | मां की कोख से जो बच्चे पैदा हुये उनमें कई तरह की शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक विकृतियां देखी गई| जब मां अशांत नाखुश और दमित होगी तो बेटा भी उसी तरह का निकलेगा और यह सदियों से होता आया है| एक पीढी के बदल जाने से सदियों के संस्कार नहीं मिट सकते| 

राजा महाराजाओं के दमन, झगड़े, लूट, असमानता, ऊंच नीच, कुरीतियों  से आम नागरिकों का मानसिक स्वातंत्र दमित हुआ| बेईमानी, स्वार्थ, भ्रष्टाचार यह सब इसी की उपज है| लोग आत्म केंद्रित हैं, भले ही धर्म और आध्यात्म से जुड़ी हुई सामग्रियों का ढेर हो| लेकिन मूल रूप से ज़्यादातर भारतीयों की आत्मा कुंठित है| इसी वजह से जब भी उन्हें किसी पद पर बैठने का मौका मिलता है तो अपनी तात्कालिक खुशी के लिए जरूरत से ज्यादा धन संपदा बटोरने लगते हैं जिससे अन्य लोगों का हक छिनता है| 

गलती से कोई व्यक्ति ऊँचे पद पर बैठ गया तो अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए लोगों को बांटने,तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं होता| दरअसल उनकी अतृप्त वासनाएं ज्यादा से ज्यादा धन प्राप्त करके उस मौके का लाभ उठाकर हर तरह से संपन्न हो जाना चाहती है| यह भी एक वजह है जो भारत की परेशानी की जड़ है|

अशिक्षा की वजह से जिस तरह से जनसंख्या बढ़ी है वह चिंतनीय है| जनसंख्या वृद्धि लोगों में मौका मिलते ही झपट पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ा देती है| मौके कम है, असुरक्षा ज्यादा है| ऐसे में जिसे जहां जैसा भी फायदा दिखाई देता है, वह उस फायदे का इस्तेमाल करना चाहता है| इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है| 

देशभक्ति की बात करने वाले भारतीयों में देशभक्ति की भावना बहुत कम है| धर्म, पंथ, संप्रदाय को मानने वाले लोग धर्म की मूल शिक्षाओं से जुड़ने की बजाय धर्म के ठेकेदारों से जुड़ने में ज्यादा यकीन रखते हैं| उन्हें सन्देश नहीं आडम्बर से ज्यादा लगाव होता है| 

गीता और पुराणों की बात करने वाले लोग गीता को  पढ़ने और उसके आधार पर चलने में शायद ही यकीन रखते हो|  बुद्ध को मानने वाले लोग बुद्ध की मूर्ति को तो पूजते हैं, लेकिन बुद्ध की बातों को शायद नहीं मानते| इस्लाम को मानने वाले लोग खुद को मुसलमान तो कहते हैं लेकिन इस्लाम की शिक्षाऐं शायद ही अमल में लाते हों| इसी वजह से धर्म सिर्फ अलग-अलग गिरोहों का तमगा बनकर रह गये हैं|

आज सभी तरह के कथित धर्म, मत, संप्रदाय के आवरण से लोगों को मुक्त करके इनकी मूल शिक्षाओं से उन्हें जोड़ने की जरूरत है| दरअसल अपने अपने संप्रदाय को लोगों ने  अपनी पहचान बना लिया है| और इस पहचान को बचाने के लिए लोग लड़ रहे हैं| जबकि धर्म को किसी के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है| धर्म तो सदा सुरक्षित है| लेकिन लोग सोचते हैं कि वह धर्म को बचाकर बहुत बड़ा योगदान कर रहे हैं| धर्म तो बचा हुआ है| आप अपने आपको बचाइए, आप सिर्फ उसके रास्ते पर चल लीजिये इतना काफी है| 

प्रकृति की शिक्षाएं तो सनातन है वह कभी खत्म नहीं होगी| ईश्वर को मनुष्य के संरक्षण की जरूरत  नहीं है| धर्म को तथाकथित मानव निर्मित धार्मिक पहचान से खतरा पैदा हो गया है| कई स्तरों पर कार्य करना पड़ेगा तब भारत समस्याओं से मुक्त हो पाएगा|

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