रावण ,मधु का वध भी कर देगा क्या….रावण की त्रैलोक्य विजय -59

रावण ,मधु का वध भी कर देगा क्या...!

रावण की त्रैलोक्य विजय -59 

रमेश तिवारी 

रावण की कथा तो यूं ही अनवरत चलती रहेगी ,किंतु कुछ प्रश्नों,और प्रसंगों के साथ। शास्त्रों में लिखा है कि कामातुर और स्त्री प्रहसन में संलग्न व्यक्ति, स्त्री द्वारा ही अपमानित होता है। अथर्व वेद में लिखा है...! "काम जज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपुः पितरो न मर्तत्याः"-अर्थात काम सबसे पहले पैदा हुआ ! यहां दो प्रश्न हैं --कामातुर व्यक्ति का अपमान होता ही है। दूसरे काम सबसे बलवान है। रावण ने अपनी सगी बहन सूर्पणखा को इसीलिए विधवा बना दिया था क्योंकि वह अपने प्रेमी दैत्य विद्युत्जजिह्व के साथ भाग गयी थी। हालांकि वह अपने संकल्प के संबंध में रावण और मंदोदरी को बता चुकी थी। सूर्पणखा चेतावनी देकर लंका से भागी थी। किंतु मौसेरी बहन लंका से स्वमेव ही (अपहरण की आड़ में) भाग गई थी। दैत्य मधु अपनी शक्ति के बल पर कुंभीनसी को लेकर भागा था। विद्युज्जिह्व भी दैत्य (कालिकेय) सरदार था और मधु एक विशाल दैत्य परिवार का राजा था। दोनों दैत्यों की हैसियत में बहुत अंतर था।

देवलोक अभियान -2- पर जाने से पूर्व रावण बहुत कम समय के लिए ही लंका में रुक सका। अपह्रत स्त्रियों के श्राप, सूर्पणखा की आहों और कराहों, विभीषण के तानों तथा प्रजा की व्यंग मुस्कानों ने उस जैसे शक्तिपुंज को अंदर ही अंदर से झकझोर कर रख दिया था। कुंभीनसी के भाग जाने की घटना को अपनी नाक का प्रश्न बना कर रावण दैत्य मधु का वध करने को निकल तो गया! किंतु हुआ क्या! 

आगे देखते हैं। रावण के साथ, कुंभकर्ण, मेघनाद भी थे। चतुरंगिणी सेना सहित अत्याधुनिक अस्त्र,शस्त्र आदि भी। रावण की योजना थी कि पहले वह लंका से मथुरा पहुंचेगा।मधु के राज्य को रौंद डालेगा। मथुरा के मान का संपूर्ण मर्दन कर कुंभीनसी को भगाकर लंका की नाक काट लेने वाले मधु का शीश काट कर अपमान का बदला लेगा।और फिर यहीं से इंद्र पर विजय करने के लिए देवलोक निकल पडे़गा।मथुरा से लंका लौटने का कोई झंझट नहीं। इसी गुणा भाग में पड़े और सोच विचार में उलझे रावण के विमान पुष्पक ने मथुरा की धरती पर लैंड किया।


यह सुनकर मात्र कि मथुरा में महाबली रावण आ पहुंचा है, खलबली मच गई। मथुरा नगर में मानों आतंक का अंधियारा छा गया। हंसते, मुस्कुराते नगर में मातम पसर गया। दुर्ग का द्वार बंद कर दिया गया। काना फूंसी शुरु हो गई। और तभी,दुर्ग के बाहरी ओर से द्वार की अर्गला बजी। अर्गला की प्रथम खट, खट ने ही द्वारपाल को दुविधा में डाल दिया। शायद मथुरा पर मंडरा रहा काल,आज साक्षात स्वरूप में प्रकट हो गया है। दुर्ग के भीतरी पक्ष में गुमसुम खडे़ सैन्य अधिकारी,दुबकने लगे। तभी एक गर्जना ने मानो मथुरा को हिला डाला..! आवाज गूंजी -द्वार खोलो....! अब, कुंभीनसी को जैसे ही विश्वास हो गया कि यह तो रावण की आवाज़ है। वह तो कांपने लगी। अतिशय भय ने उसकी बुद्धि को सुन्न ही कर दिया। अब वह करे तो करे क्या..? सोच विचार करती हुई कुंभीनसी ने द्वार खोलने का आदेश दिया। फिर कुछ सोच विचार करने लगी। 

अब उसने भी निर्णय ले लिया। द्वार तो दुर्ग का खुला। किंतु! इस द्वार का संबंध तो सीधा सीधा कुँभीनसी के भाग्य द्वार से होकर मधु की मृत्यु के द्वार तक जाता था। एक द्वार से अनेक द्वारों का संबंध था। क्रोधित रावण ने चारों ओर दृष्टि दौडा़ई। दृश्य यह था कि रावण की दृष्टि जिस तरफ पड़ती। उधर भगदड़ मच जाती। रावण की भृकुटियों ने ही भय पैदा कर रखा था। उसकी टेढी़ भृकुटियां ही शत्रुपक्ष के मनोबल का मर्दन करने में पर्याप्त थी। भयभीत बहन कुंभीनसी से रहा नहीं गया। वह न केवल डरी हुई थी। बल्कि अपने भाई के अहंकार और आतताई स्वभाव को जानते हुए.. अपने सुहाग के प्रति सोच विचार कर रही थी। कुंभीनसी की अंतर्रात्मा ने कहा -पति को बचाना ही होगा। मधु के प्राणों पर आसन्न संकटों को टालना ही होगा! कुंभीनसी ने निर्णय लेने में देरी नहीं की।वह रोती, बिलखती, दोनों हाथों में अपनी साडी़ का पल्लू पकड़े हुए भागती चली आ रही थी। दुर्ग के द्वार पर जहाँ जलती सी लाल लाल आंखों वाला रावण खडा़ था। कुंभीनसी,लंका में जो कभी भाई की गोद में खेलती थी। जैसी कि वह दौड़,दौड़कर इसी भैया की टांगों पर चढ़कर, चौडी़ छाती पर लात जमाते हुए कंधों पर चढ़ जाती थी। भागती हुई, रावण के चरणों में गिर पड़ी। साडी़ का पल्लू पकड़ कर, अपने पति मधु के प्राणों की भीख मांगने लगी।

यहाँ देखना होगा कि जब दोनों ही बहनों ने प्रेम विवाह किये तो क्या रावण का व्यवहार भी दोनों बहनों के पतियों के साथ एक समान ही होता है अथवा नहीं। क्या विद्युज्जिह्व की तरह रावण मधु के भी टुकडे़ टुकडे़ कर देगा। मित्रो मथुरा से निकलने के बाद रावण देवलोक तो जाता है किंतु..! एक बार फिर अपनी कामुकता का शिकार होकर। किंतु इस बार की कामुकता का मूल्य कुछ अधिक ही चुकाना पड़ सकता है। रावण को!

आज बस यहीं तक। इन्हीं प्रसंगों,नवीन जानकारियों और रोचक कथानकों के साथ मिलते हैं कल 

धन्यवाद।


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