क्या भारत में फिर आएगा तीसरे मोर्चे का वजूद, 1977 की तरह तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद तेज़ : अतुल पाठक

क्या भारत में फिर आएगा तीसरे मोर्चे का वजूद, 1977 की तरह तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद तेज़..अतुल पाठक
मोदी सरकार को गिराने तीसरे मोर्चे को अस्तित्व में लाने की कोशिश| तीसरा मोर्चा भारत की राजनीति का एक विलक्षण स्वरुप है| मूल रूप से भारत दो ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को प्रश्रय देता रहा है| लेकिन समय-समय पर कुछ दलों ने इकट्ठे होकर एक सशक्त थर्ड फ्रंट बनाने में सफलता हासिल की| थर्ड फ्रंट कई बार सफल हुए और कई बार असफल| तीसरे मोर्चे ने केंद्र और राज्यों में सरकारें बनाई| लंबे समय तक सरकार नहीं चला पाने के कारण इसके ऊपर सवाल भी खड़े होते रहे|

देश में एक बार फिर थर्ड फ्रंट के गठन की कवायद शुरू हुई है|  हालांकि  शुरुआत से ही थर्ड फ्रंट के सफलता को लेकर सवाल उठने लगे हैं|सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस थर्ड फ्रंट में कांग्रेस शामिल होगी? और यदि कांग्रेस थर्ड फ्रंट में शामिल होती है तो क्या वह शरद पवार, ममता बनर्जी या अन्य किसी छोटे दल के नेता को थर्ड फ्रंट के लीडर के तौर पर स्वीकार करेगी|एक सवाल यह भी उठता है कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक कांग्रेस क्या अपनी पहली और दूसरी स्थिति को छोड़ तीसरे मुकाम पर आना पसंद करेगी?और यदि कांग्रेस थर्ड फ्रंट में शामिल होती है तो क्या यह मान लिया जाएगा कि कांग्रेस ने अपनी दूसरी पोजीशन से खुद ही नीचे आना स्वीकार कर लिया है?थर्ड फ्रंट में उन सभी दलों को साथ में लाने की कोशिशें की जा रही है जो कभी एक दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी रहे हैं|  सोनिया गांधी का विरोध करने वाले नेता सोनिया गांधी के साथ आएंगे या उन विरोधियों के साथ सोनिया गांधी जाएंगे|सपा बसपा सहित तमाम दल के क्षेत्र के नीचे किसी एक नेता को अपना लीडर मानकर चुनाव लड़ पाएंगे?  इन्हीं सब सवालों के साथ थर्ड फ्रंट की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है|


पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोक दल सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला 1977 की तरह तीसरा मोर्चा बनाने मिशन पर निकल पड़े हैं उनकी अलग अलग राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं से बातचीत हो रही है| इसमें बीजेपी शामिल नहीं है|

इतिहास को देखें मोरारजी देसाई के नेतृत्व में 1977 में कांग्रेस के खिलाफ जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार अस्तित्व में आई| जनता पार्टी रूपी इस कुनबे में खांटी कांग्रेसी मोरारजी देसाई, मधु लिमये, राजनारायण, जॉर्ज फर्नांडीस, मधु दंडवते जैसे समाजवादी, संघ परिवार के अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख, 1967 में कांग्रेस से बगावत कर अलग हो चुके चौधरी चरण सिंह, आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के खिलाफ बगावत का झंडा उठाने वाले चंद्रशेखर, मोहन धारिया, रामधन और कृष्णकांत की युवा तुर्क चौकड़ी भी शामिल थी। जगजीवन राम और हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे कांग्रेसी भी इसमें आ मिले थे|

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इस मोर्चे ने सरकार बनाई 24 मार्च 1977 को मोरारजी मंत्रिमंडल ने शपथ ली। आपातकाल के दुर्भाग्यपूर्ण कालखंड की प्रसव पीड़ा से 1977 में जिस नए गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे का जन्म हुआ उसने 1980 आते-आते दम तोड़ दिया। जनता पार्टी में शामिल विभिन्न घटक दलों के नेताओं ने अपनी आपसी कलह से इंदिरा गांधी के फिर से सत्ता में लौटने का रास्ता क्लियर कर दिया। एक प्रयोग का अंत हो गया।  

1990 के आसपास तीसरे मोर्चे के रूप में विश्वनाथ प्रताप सिंह, देवीलाल, जॉर्ज फर्नांडिस और चंद्रशेखर जैसे नेता सामने आए| चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने|

1996 में जब अटल सरकार अल्पमत में आ गई, तो तीसरा मोर्चा बन गया। कांग्रेस और सीपीएम ने बाहर से इस मोर्चे का समर्थन किया जबकि सीपीआई सरकार में शामिल हो गई और एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में तीसरे मोर्चे ने केंद्र में सरकार बनाई लेकिन देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार की स्थापना हुई। फिर तीसरे मोर्चे ने इंद्र कुमार गुजराल को देश का प्रधान मंत्री बनाया, लेकिन गुजराल की सरकार भी अधिक समय तक नहीं चली| 

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, तेलुगू देशम आदि ने मिलकर तीसरे मोर्चे का गठन किया| ये मोर्चा कुछ ख़ास नहीं कर पाया| मोदी लहर सब पर भारी थी| एक बार फिर ये कवायद हो रही है। बीजेपी को छोड़कर सभी पार्टी के नेताओं को इसके लिए निमंत्रण दिया जाएगा।

2024 के संसदीय चुनावों में भाजपा को हराने के लिए विपक्षी दलों ने पहले ही रैलियां शुरू कर दी है। पिछले महीने ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 18 पार्टियों की बैठक बुलाई थी. यह बैठक भाजपा के खिलाफ विपक्ष को रैली करने के लिए आयोजित की गई थी। इसी सिलसिले में अब पूर्व उप प्रधानमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल की संस्थापक दिवंगत देवीलाल का जन्मदिन 25 सितंबर को मनाया जाना तय है.

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देवीलाल के बेटे और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने समारोह के लिए भाजपा-कांग्रेस गठबंधन में शामिल पार्टी नेताओं से मुलाकात की। समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा और सिरोमणि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल ने समारोह में शामिल होने का वादा किया है. इसके अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला के भी भाग लेने की उम्मीद है।

तीसरा मोर्चा छोटे राजनीतिक दलों का एक सामूहिक संगठन है जो अकेले राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में नहीं आ सकता है, लेकिन सामूहिक रूप से केंद्र की राजनीति में प्रवेश करना चाहता है|

तीसरे मोर्चे की मांग तब सामने आई जब 1989 में कम सीटों के साथ जनता दल की सरकार बनी और सरकार बचाने के लिए वाम और भाजपा दोनों ने इसका समर्थन किया। उस समय वाम दलों का मुख्य लक्ष्य कांग्रेस थी और उनका एकमात्र लक्ष्य कांग्रेस को सत्ता से हटाना था, लेकिन समय के साथ, राजनीति बदल गई और तीसरा मोर्चा कांग्रेस बनाम भाजपा बन गया, जिसके कारण शरद यादव, जॉर्ज फर्नांडीस आदि साथी भाजपा में शामिल हो गए। यहां खास बात यह है कि तीसरे मोर्चे की राजनीति, जिसे वामपंथियों ने शुरू किया था, को कांग्रेस और भाजपा ने अपनाया और एनडीए और यूपीए का गठन किया। 

तीसरे मोर्चे के स्वरूप और क्षमता के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। राजनीति में सब कुछ संभव है क्योंकि राजनीति अंतहीन समझौतों और संभावनाओं का खेल है। 

अतुल पाठक

 

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