मोहम्मद रफ़ी ने जब धर्मगुरुओं के कहने पर छोड़ दिया था गाना..  

जब धर्म के ठेकेदारों ने बंद कराया मोहम्मद रफ़ी का गाना, दिला दिया फिल्म इंडस्ट्री से संन्यास..
मोहम्मद रफ़ी ने कथित धर्मगुरुओं के कहने पर छोड़ दिया था गाना| तालिबानी संस्कृति इस्लाम के नाम पर फोटो खिचाने, बाल कटाने, महिलाओं के पढने, अकेले निकलने, मूर्ती पूजा करने, सहशिक्षा जैसी कई बातों की विरोधी है| 


कई बार ये सोच प्रतिभाओं के दमन का कारण बन जाती है| 

भारत में इसी तरह की सोच रखने वाले कुछ धर्म के ठेकेदारों ने हिन्दुस्तान की गायकी की सबसे बड़ी प्रतिभा मोहम्मद रफी के गले को दबाने में सफलता हासिल कर ली थी| उन्हें धर्म के नाम पर गाना गाने से रोक दिया गया, रफी साहब को कला जगत से दूरी बनानी पड़ी|

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क्या आप जानते हैं कि मोहम्मद रफी ने कुछ मौलवियों के कहने पर सुरों की दुनिया से रुखसत ले ली थी? जी मोहम्मद रफी ने कला जगत को अपने धर्म के लिए छोड़ दिया था| मोहम्मद रफी ने हज से लौटने के बाद गाना बंद कर दिया था। 

आपको याद ही होगा कि विनोद खन्ना ओशो रजनीश के भक्त थे, एक समय वह आया जब विनोद खन्ना ने ओशो सन्यासी बनने के लिए फिल्मी दुनिया को तब विदा कर दिया जब वह अपने कैरियर में ऊंचाइयों पर थे| कुछ ऐसा ही मोहम्मद रफी के साथ भी हुआ।

महान गायक मोहम्मद रफी ने भी फिल्मों में गाना बंद कर दिया था जब वह अपने करियर की ऊंचाई पर थे। बाद में उन्होंने महसूस किया कि फिल्मों में गाने में कुछ भी गलत नहीं है।

यह उस समय की बात है जब रफ़ी साहब हज पर गए थे और उनसे कहा गया था, "तुम हजयात्री बन गए, अब तुम्हें गाना बंद कर देना चाहिए।" रफ़ी साहब का मन नहीं था लेकिन धर्म के ठेकेदारों के तर्कों ने उन्हें गायकी छोड़ने पर मजबूर कर दिया| जब रफ़ी ने गाना बंद किया तब उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी|

रफ़ी की दीवानगी लोगों के सिर चढ़ कर बोल रही थी| बहुत से लोगों को यह घटना अब याद नहीं है, कुछ लोग इसे अफवाह मानते हैं और कई लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं है। वे इस बात से अनजान थे कि मोहम्मद रफ़ी ने धर्म के लिए गाना छोड़ दिया था। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने अपना विचार बदल दिया और सभी ने राहत की सांस ली।

रफी साहब 1971 में जब हज पर गए तो वहां से लौटने के बाद उन्होंने मौलवियों के कहने पर गाना बंद कर दिया| हज से लौटकर कई महीने तक मोहम्मद रफ़ी ने किसी गाने की रिकॉर्डिंग नहीं की थी. उन्हें मौलवियों ने कहा था कि हज के बाद नाचने गाने की अनुमति हमारे दीन धर्म में नहीं है, इसलिए आप अब गाना-गुनगुनाना बंद कर दीजिए."

उनके गायन को रोकने से गुजारा करना मुश्किल हो गया। उनके भाइयों ने कहा, 'तुम्हारा गला ही तुम्हारे रोजगार का जरिया है, तुम ना तो अब कोई नौकरी कर सकते हो ना कोई धंधा| बस इतना ही अल्लाह ने तुम्हें दिया है।’

नौशाद ने भी उन्हें समझाया कि यह गाना छोड़ कर ग़लत कर रहे हो. रफी तुम ईमानदारी का पेशा कर रहे हो, किसी का दिल नहीं दुखा रहे. यह भी एक तरह की इबादत है. अब बहुत हो गया, अब गीत गाना शुरू कर दो. तब रफ़ी साहब ने फिर से गाना शुरू कर दिया." इस बात की तस्दीक उनके बेटे ने भी की| 

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1944 में की थी। गायकी में अपनी वापसी के बाद क़रीब 8 साल तक वह लगातार गीत गाते रहे. साल 1971 में जब मोहम्मद रफ़ी हज पर गए थे तब उनकी पहचान देश के सर्वाधिक लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ प्लेबैक सिंगर के रूप में हो गई थी.

हज से वापसी के बाद रफ़ी ने फिर से फ़िल्मों में गाना शुरू किया, इसके भी उन्होंने एक से बढ़कर एक शानदार गीत अपने श्रोताओं को दिए.

 

 

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