नारी शिक्षा…. पतिव्रता महात्म्य

नारी शिक्षा, पतिव्रता महात्म्य

 

Womenseducation-patriotism-03

अत: मान ही जिनका धन है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को उचित है कि वे घर में स्त्री  को गृह-लक्ष्मी समझकर सदा उनका आदर करें। जो लोग केवल वैराग्य मार्ग का सहारा ले स्त्रियों के गुणों को छोड़कर सिर्फ उनके दोषों का वर्णन करते हैं, वे दुर्जन हैं-ऐसा मेरे मन का अनुमान है। वे दोष-वाक्य उनके मुख से सद्भावना से प्रेरित होकर नहीं निकले हैं।'

पतिव्रता के तेज का अवलोकन करके सबको तपाने वाले सूर्यदेव स्वयं सन्तप्त हो उठते हैं, दूसरों को जलाने वाले अग्निदेव भी स्वयं ही जलने लगते हैं तथा त्रिभुवन के सम्पूर्ण तेज काँप उठते हैं।

संसार में वह माता धन्य है, वह पिता धन्य है तथा वह भाग्यवान् पति धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री विराजती है। पतिव्रता स्त्री के पुण्य से उसके पिता, माता और पति–इन तीनों के कुलों की तीन-तीन पीढ़ियाँ स्वर्ग लोक में जाकर सुख भोगती हैं। पतिव्रता के चरण जहाँ-जहाँ धरती का स्पर्श करता है,वह स्थान तीर्थ भूमि की भाँति मान्य है। वहाँ भूमि पर कोई भार नहीं रहता, वह स्थान परम पावन हो जाता है।

सूर्य भी डरते-डरते ही अपनी किरणों से पतिव्रता को स्पर्श करते हैं। चन्द्रमा और गन्धर्व आदि अपनेको पवित्र करने के लिये ही उसका स्पर्श करते हैं और किसी भाव से नहीं। जल सदा पतिव्रता देवीके चरण-स्पर्श की अभिलाषा रखता है। वह जानता है कि 'गायत्री के द्वारा जो हमारे पाप का नाश होता है, उसमें उस देवी का पातिव्रत्य ही कारण है।
पातिव्रत्य के बल से ही वह हमारे पापों का नाश करती है। क्या घर-घर में अपने रूप और लावण्य पर गर्व करने वाली नारियाँ नहीं हैं। परन्तु पतिव्रता स्त्री भगवान विश्वेश्वर की भक्ति से ही प्राप्त होती है। गृहस्थ-आश्रम का मूल भार्या है, सुखका मूल कारण भार्या है। धर्म-फलकी प्राप्ति तथा सन्तानकी वृद्धिका भी भार्या ही कारण है।

Womenseducation-patriotism-02भार्या से लोक और पर लोक दोनों पर विजय प्राप्त होती है। घर में भार्या के होने से ही देवताओं, पितरों और अतिथियों की तृप्ति होती है। वास्तव में गृहस्थ उसी को समझना चाहिये जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। जैसे गंगा में स्नान करने से शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रता का दर्शन करके सम्पूर्ण गृह पवित्र हो जाता है।

(वराहमिहिर कृत बृहत्संहिता) पतिव्रता का पति सब पातकों से मुक्त हो जाता है। वह सब कर्मो का बंधन से रहित हो सती पत्नीके साथ भगवान विष्णु के धाम में आनंद का अनुभव करता है। पृथ्वी पर जितने तीर्थ हैं, वे सब सती-साध्वी स्त्री के चरणों में लोटते हैं।

तपस्वी जनों का सारा तप, व्रत करने वालों के व्रत का सम्पूर्ण फल तथा दाताओं के दान का भी समस्त फल मिलकर जितना होता है, वह सब पतिव्रता देवियों में व्याप्त रहता है।

साक्षात् भगवान् नारायण, भगवान् शिव, जगद्विधाता ब्रह्माजी तथा सम्पूर्ण देवता और महर्षि भी पतिव्रता सदा डरते रहते हैं।

पतिव्रता की चरणधूलि पड़ने से पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती । पतिव्रता को मस्तक झुकाने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। महा पुण्यवती पतिव्रता स्त्री सदा अपने तेज से तीनों लोकोंको क्षणभर में भस्म कर डालने की शक्ति रखती है।

पतिव्रता का पति तथा उसका पुत्र-ये दोनों सदा निर्भय रहते हैं। उन्हें देवताओं और यम से भी किंचित् भय नहीं होता। जो सौ जन्मोंसे उत्तम पुण्यका संचय करते आ रहे हैं, उन्हीं के घरमें पतिव्रता कन्या जन्म लेती है। पतिव्रता को जन्म देनेवाली माता परम पवित्र है तथा उसके पिता भी जीवन्मुक्त हैं।

समस्त लोकों की रचना करनेवाले विधाता ने कहीं भी स्त्रियों के सिवा दूसरा कोई ऐसा रत्न नहीं उत्पन्न किया है, जो देखने, सुनने तथा स्पर्श और स्मरण करनेपर भी मनुष्य को आनन्द प्रदान करनेवाला हो।

उन्हीं के लिये धर्म और अर्थ का संग्रह होता है। पुत्र विषयक सुख उन्हीं से प्राप्त होता है।


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