बधियाकरण का अजब आदेश वापस, गजब नौकरशाही का गजब कारनामा.. सरयूसुत मिश्रा


स्टोरी हाइलाइट्स

अजब मध्यप्रदेश में सरकारी फरमान भी गजब होते हैं. एक  तरफ सरकार गौ कैबिनेट बनाकर गोवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए...

बधियाकरण का अजब आदेश वापस, गजब नौकरशाही का गजब कारनामा.. सरयूसुत मिश्रा अजब मध्यप्रदेश में सरकारी फरमान भी गजब होते हैं. एक तरफ सरकार गौ कैबिनेट बनाकर गोवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए जमीन-आसमान एक कर रही है, दूसरी तरफ एक सरकारी फरमान ने जनता को चौंका दिया है कि सरकार अब सांडों का भी वधियाकरण करेगी. ये सांड सरकार की नजर में “निकृष्ट” मतलब “अनुपयोगी” हैं . सवाल यह उठता है कि सांड की उपयोगिता क्या है और इन्हें अनुपयोगी कब माना जाएगा ? सामान्य समझ यही है कि सांड में जब प्रजनन क्षमता नहीं होती तो वह अनुपयोगी माना जाता है. जब सांड प्रजनन क्षमता हो चुका है, तो फिर उसके बधियाकरण करने की आवश्यकता क्या है और उस पर इतनी बड़ी राशि खर्च करने की क्या जरूरत है ? सांडों के बधियाकरण के लिए कलेक्टरों को आदेश जारी किया गया है. इसके तहत 12 लाख सांडों का बधियाकरण होना है . इसके लिए 12 करोड रुपए का बजट भी आवंटित कर दिया गया है. इस सरकारी आदेश ने बधियाकरण के  प्रयासों को सार्वजनिक कर दिया है. वैसे तो हर सरकारी आदेश किसी न किसी को किसी न किसी तरह से बधियाकरण करता है. चाहे सांड हो चाहे जनता हो, चाहे कुपोषण हो चाहे कोई भी सरकारी अभियान हो, वह कभी भी पूरी तरह से सफल नहीं होता. अभियान के लिए  निर्धारित पैसे भले ही खर्च हो जाएं, लेकिन अभियान का लक्ष्य कभी पूरा नहीं होता. सांडों को इसी सरकारी चाल से राहत महसूस हो सकती है कि शायद पैसे की बंदरबांट उनके बधियाकरण के नाम पर हो जाए, लेकिन वे बधिया होने से बच जाएँ. सरकारी आदेश में लिखा है कि गांव में जितने निकृष्ट सांड हों उनकी नसबंदी की जाए. प्रश्न यह है कि जब सांड प्रजनन के योग्य ही नहीं है तो फिर उसके बधियाकरण का क्या कोई मतलब है ? मध्यप्रदेश में गोवंश को हमेशा प्राथमिकता दी जाती है. गौशाला का निर्माण और गोपालकों को सुविधाएं मध्य प्रदेश सरकार देती है. सांडों को भी गोवंश में सरकार ने ही शामिल किया है. सांड का मतलब है खुला. गांव में सांड हमेशा खुला घूमता है. सांड के बधियाकरण के आदेश से ऐसा संदेश जा रहा है कि सांडों को पाला जाता है. सांडों का एक प्रक्रिया के तहत बधियाकरण हमेशा होता रहा होगा, लेकिन बधियाकरण के लिए अभियान तो शायद पहली बार शुरू किया जा रहा है. मध्यप्रदेश में गोवंश के संरक्षण एवं संवर्धन को कितनी प्राथमिकता दी गई है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश में अलग से गठित हाउ केबिनेट की गई है गोवंश के मुद्दों पर निर्णय लेकर क्रियान्वित करना सुनिश्चित करती है. सांडों के बधियाकरण के सरकारी आदेश से बवाल मचा है. यहां तक कि सत्ताधारी दल के नेता ही इसका विरोध कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि यह मामला गौ कैबिनेट में नहीं गया होगा. सवाल यह भी है कि बिना गौ कैबिनेट के विचार किए इस तरह का आदेश कैसे जारी हो सकता है ? जो भी चीज नुकसान कर रही है उस को नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन गोवंश के प्रजनन को नियंत्रित करने के प्रयासों के राजनीतिक नुकसान भी हो सकते हैं. गोवंश प्रदेश में चुनावी मुद्दा बनता रहा है. कमलनाथ सरकार ने अपने घोषणा पत्र में गौशालाओं के निर्माण और गोवंश की संवर्धन का वायदा किया था.  उनकी सरकार ने गौशालाओं के निर्माण की प्रक्रिया को अपनी पार्टी के सॉफ्ट हिंदुत्व के रूप में प्रचारित करने का भी प्रयास किया. यह आदेश जारी होने में निश्चित ही कहीं ना कहीं कोई गलती हुई है. या तो अंग्रेजी से हिंदी ट्रांसलेशन करते समय गलती की गई है या सांडों की क्वालिटी ठीक रखने के लिए इस अभियान को चालू करने का आदेश निकाला गया है. लेकिन आदेश में इस तरह की बात परिलक्षित नहीं हो रही है. ऐसा इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि सांड तो रहेंगे. जितने पशु केंद्र हैं वहां पर उच्च गुणवत्ता के सांड रखे जाते हैं और गोपालक हमेशा गोवंश में प्रजनन के लिए पशु केंद्रों का प्रयोग करते हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सांडों के बधियाकरण के इस आदेश को वापस ले लिया है, जो साफ़ बताता है कि नौकरशाही द्वारा बगैर सोचे समझे इस तरह का आदेश जारी किया गया था. यह कोई पहला मामला नहीं है जब नौकरशाही ने पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. नौकरशाही को जमीनी हकीकत का अंदाजा नहीं होता और वह तो बजट की उपलब्धता और उसके उपयोग की कागजी योजना तैयार कर उन पर क्रियान्वयन प्रारंभ कर देते हैं जो बड़े राजनीतिक विवाद के रूप में कई बार सामने आता है. मुख्यमंत्री स्वयं यह कह चुके हैं कि भोपाल में बैठे अफसर तो जैसा दिखाते हैं अगर उस पर भरोसा कर लिया जाए तो बड़ी समस्याएं पैदा हो जाएंगे. अफसर जो बताते हैं जमीन पर वैसे दिखाई नहीं देता, इसलिए सच वही है जो जमीन पर दिखाई देता है. इस मामले में भी जमीनी हकीकत सामने आ गई है और अंततः आदेश वापस हो गया है.