क्या आप ऐसी मौत मरना चाहेंगे, कोरोना का यह चेहरा कितना क्रूर और भयानक है: -दिनेश मालवीय

क्या आप ऐसी मौत मरना चाहेंगे

कोरोना का यह चेहरा कितना  क्रूर और  भयानक है

वो हो रहा है, जिसकी कल्पना तक नहीं थी

परिजन मृतक का चेहरा तक नहीं देख पा रहे

-दिनेश मालवीय
भारत ही नहीं दुनिया में कहीं किसी की मौत होने पर पूरा परिवार शोक में डूब जाता है. मौत का दुःख तो यह सोचकर कम हो जाता है कि यह जीवन का अंतिम और अकाट्य सत्य है. हर किसीकी यही नियति है. लेकिन हर परिवार अपने-अपने धार्मिक रीति-रिवाज़ के अनुसार विधि-विधान से मरने वाले का अंतिम संस्कार कर कुछ संतुष्टि प्राप्त करता है. विधि-विधान से अंतिम संस्कार करने को परिवार और संतानों का परम कर्तव्य माना जाता है.

इसके अलावा, मरने वाले के अंतिम दर्शन के लिए दूर-दूर  से नाते-रिश्तेदार और बच्चे आते हैं. लम्बे समय तक उनके आने का इंतज़ार किया जाता है. प्रियजन मृतक के चेहरे की एक झलक देखकर ही खुद को धन्य महसूस करते हैं.

लेकिन कोरोना महामारी ने लोगों को अपने इस कर्तव्य को पूरा करने से भी वंचित कर दिया है. कोरोना से मरने वाले व्यक्ति को पीपीई किट में लपेटकर अस्पताल से सीधे शमशान ले जाकर सरकारी कर्मचारी ही उसका अंतिम संस्कार कर देते हैं. . मृतक के परिवार जन वहाँ उपस्थित होते हुए भी उसका चेहरा तक नहीं देख पाते . यह उनके लिए अपने परिजन की मौत से भी बड़ा दुःख होता है. उनको  जीवन भर इसका पछतावा रहेगा.

Covid Death
ऎसी अनेक घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनमें लोग विदेश में रहने वाले किसी परिजन की कोरोना से मौत हो जाने पर उसके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पा रहे हैं. वे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को ऑनलाइन देखकर ही संतोष कर रहे हैं. कैसा दुर्भाग्य है कि उनके पास पैसा भी है और वे अपने परिजन के अंतिम संस्कार में शामिल होने जाने के लिए पूरी तरह समर्थ भी हैं, लेकिन न तो वहाँ जाने की सुविधा है और न इज़ाजत.

इस सन्दर्भ में एक और प्रश्न उठता है. धर्म ग्रंथ कहते हैं कि मरने वाले का यदि विधि-विधान से अंतिम संस्कार नहीं किया जाए, तो उसे सद्गति नहीं मिलती. इस तरह कोरोना से मरने वालों की क्या गति होगी?

इस महामारी का एक और बहुत दुखद पहलू यह है कि लोगों के पास इलाज कराने के लिए पैसा और सारी सुविधाएँ भी हैं, लेकिन अनेक लोग हैं जिन्हें इलाज नहीं मिल पा रहा. अस्पतालों में चिकित्सा सेवाएं चरमरा गयी हैं. सरकार के अधिकारियों तक को यह स्वीकार करना पड़ रहा है. कोरोना से होने वाली मौतों को लेकर भी स्थिति बिलकुल स्पष्ट नहीं है. एक तरफ शमशानों में अंतिम संस्कार करने के लिए लाइन लगी है, वहीँ दूसरी तरफ आधिकारिक बयानों के अनुसार इतनी मौतें नहीं हो रही हैं. खैर, ऐसा तो हमेशा से होता रहा है. कोई भी सरकार हो, आपदा से मरने वाले लोगों की संख्या कम से कम बताने की कोशिश करती है. इस सम्बन्ध में दिए जाने वाले सरकारी आंकड़े हमेशा अविश्वसनीय रहे हैं. भोपाल में गेस त्रासदी हो या लातूर में भूकम्प या कोई कोई अन्य आपदा, हमेशा आंकड़ों की बाजीगरी की जाती रही है.

हालाकि इस महामारी के फैलने के लिए पूरी तरह सरकार को दोषी ठहराना उचित नहीं है, क्योंकि लोग भी इससे बचने के लिए बतायी जा रही सावधानियों को ठीक से नहीं अपना रहे. लाख प्रचार और अन्य कोशिशों के बाबजूद बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो न तो मास्क लगा रहे हैं और न सामाजिक दूरी का पालन कर रहे हैं.

ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि वे मरने से भले ही नहीं डरते हों, लेकिन उनके कारण दूसरों के लिए मौत का ख़तरा पैदा हो रहा है. वे खुद तो मरेंगे ही दूसरों को भी मारेंगे.

वैसे मौत तो अटल है,आज नहीं तो कल आनी ही है, लेकिन ऐसे लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या वो ऐसी मौत मरना चाहेंगे कि उनके परिजन तक उनका मुंह नहीं देख सकें और उनका विधि-विधान से अंतिम संस्कार तक नहीं कर सकें.


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